एक कटोरा पानी, एक मुट्ठी दाना गर्मियों में पक्षियों की ज़िंदगी का ठिकाना

तपती दोपहर में जब धरती अंगारों की दहकती है और आसमान से आग बरसती महसूस होती है, तब सबसे ज्यादा संकट, उन नन्हे परिंदों पर आता है, जिनकी चहचाहट हमारी सुबहों को जीवन देती है। पानी की एक बूंद और दाने की एक मुट्ठी उनके लिए सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच का फासला बन जाती है। इसलिए अगर हम इन बेरहम गर्मियों में अपने घर की छत, आंगन या खिड़की पर एक कटोरा पानी का भरकर रख दें और उसी जगह एक मुट्ठी दाना डालें तो यह नन्हे परिंदों को ज़िंदगी की राहत देगा। यह छोटा सा प्रयास उनके लिए सुरक्षित ठिकाना और ज़िंदगी का सहारा बन सकता है। 
इस साल अप्रैल में ही गर्मी ने बहुत सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। ऐसे में सोचा जा सकता है कि मई में क्या हाल होगा? शहरों की सड़कों से लेकर गांव के खुले आकाश तक पक्षियों के लिए संकट ही संकट पसरा है। देखने में आया है कि पिछले कुछ सालों से गर्मियों में तापमान में लगातार हो रही वृद्धि पक्षियों के प्राकृतिक जीवन चक्र को बाधित किया है। पहले जहां 38 से 40 डिग्री का तापमान मई के आखिरी दिनों में हुआ करता था, वहीं अब यह अप्रैल के पहले सप्ताह का तापमान है बल्कि इस साल तो अप्रैल के पहले सप्ताह में देश में कहीं-कहीं तापमान 42 से 44 डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुंच गया था। जब गर्मी इतनी ज्यादा पड़ती है तो छोटे पक्षियों के लिए यह विशेषकर चुनौती बन जाती है। उनके लिए सुरक्षित आश्रय और पानी की जबर्दस्त किल्लत हो जाती है। पक्षियों का शरीर छोटा और बेहद संवेदनशील होता है, इससे वे तापमान में हल्के बदलाव से भी प्रभावित होते हैं। गर्मियों में जब जलस्रोत सूखने लगते हैं, तो उन्हें पानी की तलाश में दूर-दूर तक उड़ान भरनी पड़ती है। इस दौरान उनकी ऊर्जा तेजी से खत्म होती है और कई बार पानी की तलाश में ही वो हीट स्ट्रोक का शिकार हो जाते हैं।
शहरी क्षेत्रों में स्थिति और गंभीर है। कंक्रीट के जंगलों में न तो पेड़ों की छाया बची है और न ही प्राकृतिक जलस्रोत। यही कारण है कि कबूतर, गौरैय्या, मैना जैसे आम पक्षी भी अब पानी के लिए तरसने लगे हैं। कई रिपोर्ट्स में यह सामने आया है कि हर साल गर्मियों में उत्तर भारत से दक्षिण भारत तक हजारों पक्षी सिर्फ प्यास और अत्यधिक गर्मी के कारण दम तोड़ देते हैं। तेजी से हो रहे शहरीकरण के कारण लगातार पेड़ कट रहे हैं। ये पेड़ केवल ऑक्सीजन नहीं देते बल्कि पक्षियों के लिए भोजन और आशियाना भी होते हैं। पुराने पेड़ जिनमें पक्षी पहले घोसले बनाया करते थे, अब नहीं लगाये जा रहे। सड़कों के किनारे अब इमारती लकड़ी वाले पेड़ लगाये जाते हैं, जिसका असर यह होता है कि सड़क किनारे पेड़ होने के बावजूद उसमें पक्षी अपना घोसला नहीं बना पाते और न ही राहगीरों को उनसे कोई छाया मिलती है। यही कारण है कि शहरों में विशेषकर रहने वाली गौरैय्या और बुलबुल जैसी पक्षियों की हाल के सालों में काफी ज्यादा संख्या कम हुई है। क्योंकि पानी और आश्रय की कमी से इंसानों की तरह पक्षी भी लू का शिकार हो जाते हैं। 
क्योंकि अत्यधिक गर्मी में उनका शरीर तापमान नियंत्रित नहीं कर पाता, जिससे वह अचानक गिर जाते हैं। कई बार लोग इसे सामान्य घटना समझकर नज़रअंदाज कर देते हैं, जबकि यह गंभीर पर्यावरणीय संकेत होते हैं। इसलिए अपनी जिम्मेदारी समझते हुए हम सबको गर्मियों में अपने घरों, अपने आंगनों, खेतों, छतों और मुडेरों यानी जहां भी संभव हो, एक कटोरा पानी और एक मुट्ठी दाने का इंतजाम पक्षियों के लिए करना ही चाहिए। इससे इनकी जान भी बचायी जा सकती है और हमें इससे, किसी की जान बचाने की खुशी भी भरपूर मिलेगी, जिससे कई तरह के तनाव और लाइफस्टाइल समस्याओं से हम मुक्त रहेंगे। सरकार और पर्यावरण संगठन इस संबंध में हालांकि कई तरह के प्रयास कर रहे हैं, पक्षी बचाओ जैसे अभियान लोगों को जागरुक कर रहे हैं, लेकिन यह सिर्फ सरकार और मुट्ठीभर गैर-सरकारी संगठनों के प्रयासों से नहीं होगा। 
हम जानते हैं जैसे ही गर्मियों में पारा 40 डिग्री के पार पहुंचता है, शहरी क्षेत्रों में 70 प्रतिशत जलस्रोत सूख जाते हैं। इसीलिए पिछले कई सालों से हर साल विशेषकर मई से लेकर जून तक देशभर में हजारों पक्षी हीट स्ट्रोक या लू से मरते पाये गये हैं। ऐसे में हम अगर अपने घर के आसपास या कहीं भी मिट्टी के एक बर्तन में हर रोज थोड़ा पानी भरकर रख दें और उसी के आसपास ज्वार, बाजरा और चावल जैसे कुछ दाने भी डाल दें, तो इस छोटे से प्रयास से हर साल हजारों पक्षियों की जान बचायी जा सकती है। ऐसा ही पक्षियों के लिए एक और बड़ा उपकारी काम यह होगा कि जहां भी जमीन खाली पड़ी हो, अगर संभव हो तो एक पेड़ लगा दें, यह पेड़ भी पक्षियाें को आश्रय देता है। बहरहाल ये छोटे-छोटे काम अगर हम करें तो न केवल पक्षियाें की जान बचा सकते हैं बल्कि अपने बिगड़ते पर्यावरण को भी किसी हद तक सुधार सकते हैं।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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