कॉकरोचों को किस प्रकार समझा जाए ?
कॉकरोच क्रांति नहीं करते। वो लगातार मानव जाति को बस अपने होने का एहसास कराते हैं। उनके बारे में ये भ्रांति भी है कि वो परमाणु युद्ध के बाद भी ज़िंदा रहते हैं। परमाणु विभीषिका भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाती। ऐसे में कॉकरोचों ने जब जंतर मंतर पर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन किया तो किसी को शायद ये उम्मीद नहीं थी कि धर्मेंद्र प्रधान अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। कॉकरोच आये, कुछ घंटे हंगामा किया और चले गये। ये वायदा करके कि वो फिर आयेंगे अगर प्रधान ने इस्तीफा नहीं दिया तो। ये सब जब जानते हैं कि मोदी सरकार में इस्तीफे नहीं होते। ये बात रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह बहुत पहले कह चुके हैं। ऐसे में शिक्षा मंत्री इस्तीफा देकर कॉकरोच आंदोलन को गरिमा प्रदान करेंगे, इसकी संभावना बहुत कम है क्योंकि इस्तीफा देने का अर्थ है अपनी गलती मानना जो इस सरकार का स्वभाव नहीं है।
मोदी सरकार भारतीय इतिहास की पहली सरकार है जो गलती मानने को अपनी तौहीन मानती है। उसे लगता है कि गलती मानना सरकार को कमजोर करता है। मोदी सरकार वो गलती नहीं करेगी जो मनमोहन सिंह ने की थी, जब विपक्ष और मीडिया के दबाव में मंत्रियों के त्यागपत्र ले लिये जाते थे। तकरीबन आधा दर्जन से ज्यादा मंत्रियों ने तब पद छोड़ा था। पूर्व गृह मंत्री शिवराज पाटिल को तो इस वजह से पद छोड़ना पड़ा था कि उन्होंने मुंबई ब्लास्ट के बाद एक दिन में कई बार कपड़े बदले थे। यहां ये कहा जा सकता है कि मंत्रियों का पद छोड़ना एक तरह से जवाबदेह सरकार की निशानी है, लेकिन जो सरकार चुनाव जीतने को ही लोकतंत्र मानती हो, वो सरकार जवाबदेही को उचित नहीं मानती। ऐसे में कॉकरोच किसी गलतफहमी में न रहें। वो शोर मचा कर ठंडे हो जायेंगे। सरकार वही करेगी जो वो चाहेगी।
यहां ये नहीं भूलना चाहिये कि मनमोहन सरकार एक जवाबदेह सरकार थी जो जनता और विपक्ष का मजाक नहीं उड़ाती थी। वो उनके प्रति संवेदनशील थी, उनकी मांगों को गंभीरता से लेती थी। और उसे ये लगता था कि लोकतंत्र सिर्फ चुनाव जीतने का नाम नहीं है और सरकार की जवाबदेही सिर्फ चुनाव से तय नहीं होती बल्कि हर पल और हर समय सरकार की कसौटी तय होती रहती है। मनमोहन सिंह के समय जब अन्ना हजारे पहली बार जंतर मंतर पर बैठे तो तीन दिन में ही सरकार के सर्वोंच्च स्तर से आंदोलनकारियों से संपर्क शुरू हो गया था और उनकी मांगों पर विचार किया जाने लगा था और 5वें दिन लोकपाल बिल को बनाने के लिये सरकार के साथ सिविल सोसाइटी के लोगों के साथ एक कमेटी बन गई थी। इसी तरह रामलीला मैदान पर जब अन्ना हजारे दुबारा आमरण अनशन पर बैठे थे तो तेरह दिन में सरकार ने लोकपाल बिल के संदर्भ में संसद में एक प्रस्ताव पास कर अपनी प्रतिबद्धता को दोहरा दिया था। आज वो बातें एक सपने की तरह लगती हैं। एक ख्याल जो भारत के लोकतांत्रिक व्यवस्था की मज़बूती का प्रमाण देता था कि सरकार सिर्फ चुनाव के लिये नहीं होती बल्कि वो जनता के सवालों के जवाब तब भी देती है जब चुनाव नहीं हो रहे होते। मीडिया की बातों को वो संजीदगी से लेती है, आज की तरह मीडिया को अपना गुलाम नहीं बनाती।
कॉकरोच जब प्रदर्शन के लिये उतरे तो गुलाम मीडिया ने उसको पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया जबकि अन्ना के आंदोलन क समय मीडिया ने 24 घंटे दिखाने का काम किया था। मीडिया की कवरेज का हाल ये था कि पूरे देश में गांव गांव शहर शहर कैंडल मार्च निकलने लगे थे और राष्ट्रवाद का वो ज्वार चढ़ा था कि लगा कि देश में क्रांति होने वाली है। मुझे वो दिन याद है जब हर बातचीत अन्ना से शुरू होती थी और अन्ना से ही खत्म होती थी। भ्रष्टाचार से त्रस्त इस देश को लगा था कि देश जल्दी ही भ्रष्टाचार से मुक्त हो जायेगा। राजनीति साफ सुथरी होगी। जनता के मुद्दों पर चुनाव लड़े जायेंगे, लेकिन हुआ इसके उलट। भ्रष्टाचार खत्म होने की जगह बढ़ गया। सरकारों की जवाबदेही तय होने की जगह सरकार पूरी तरह से निष्ठुर हो गई। राजनीति रोटी कपड़ा मकान की जगह हिन्दू मुस्लिम में तब्दील हो गई। भारत का विमर्श पूरी तरह से बदल गया। पूरी व्यवस्था का स्वरूप बदल गया। लोकतंत्र धीरे-धीरे अधिनायकवाद में परिवर्तित हो गया। जहां सरकार से सवाल करना देशद्रोह बन गया और हर उस व्यक्ति की देशभक्ति को कसा जाने लगा जो सत्ता की राय से सहमत नहीं है। ऐसे में ये देख कर हैरानी ज़रूर हुई कि जो सरकार रत्ती भर भी असहमति को स्वीकार नहीं करती वो अचानक इतनी सदाशय और उदार कैसे हो गई कि एयरपोर्ट पर ही धरना प्रदर्शन की अनुमति दे दी गई।
पुलिस की सहमति को दो नज़रिये से देखा जा सकता है। एक, सरकार को पूरी तरह से एहसास था कि कॉकरोचों के प्रदर्शन करने से कुछ होने वाला नहीं है। आयेंगे, शोर मचायेंगे और फिर चले जायेंगे। वैसा ही हुआ। दो, ये भी हो सकता है कि एयरपोर्ट पर उतरने के पहले से ही अभिजीत दिपके से बात हो गई हो कि कुछ ज्यादा बड़ा नहीं होगा, सरकार को तकलीफ नहीं दी जायेगी। दोनों ही स्थितियों में फायदा सरकार को हुआ। उसे ये कहने का मौका मिला कि वो पूरी तरह से लोकतांत्रिक है और उसके बारे में ये कहना गलत था कि वो असहमति को बर्दाश्त ही करती। यानी सरकार के लिये जो आंदोलन परेशानी का सबब होना चाहिये था, वो सरकार के लिये बड़ी पी आर एक्सरसाइज़ बन गया। यानी दुनिया को बताने का अवसर सरकार ने खोज लिया कि उसकी लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता पर प्रश्न खड़ा करने वाले गलत हैं।
वैसे भी कॉकरोच जनता पार्टी के पूरे स्वरूप और अंदाज में किसी भी तरह के अनुशासन की कमी साफ दिखाई देती है। इसके विपरीत अन्ना के आंदोलन में संगठन, लीडरशिप व दीर्घकालिक एजेंडा स्पष्ट था। लंबी तैयारी और काफी विचार विमर्श के बाद लोकपाल बिल की तस्वीर को रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज, वकील और पूर्व कानून मंत्री की मौजूदगी पूरे आंदोलन को एक गरिमा देती थी। कॉकरोच पार्टी में उस गंभीरता और गरिमा की कमी साफ दिखती है। सोशल मीडिया ने लोगों को इकट्ठा किया लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि सोनम वांगचुक के अलावा सिविल सोसाइटी की कोई शख्सियत प्रदर्शन में शामिल हुई। ऐसे में अन्ना आंदोलन से इसकी तुलना बेमानी है। और ये सोचना गलत होगा कि कॉकरोच किसी बड़े बदलाव का कारण बनेंगे। ज्यादा से ज्यादा ये कहा जा सकता है कि प्रेशर कुकर में गैस बहुत जमा हो गई थी। उसके फटने का खतरा पैदा हो गया था। कॉकरोच ने कुकर की सीटी का काम किया। गैस निकल गई और ख़तरा टल गया।



