डॉ. अमरीक सिंह चीमा को याद करते हुए
आज पुण्यतिथि पर विशेष
सब्ज़ क्रांति लाने वालों में शामिल डॉ. अमरीक सिंह चीमा को आज 44 साल बाद भी याद किया जाता है। वह दूरदर्शी कृषि वैज्ञानिक थे, जिन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों का पंजाब में कृषि उत्पादन दोगुना करने का सपना साकार किया और मुख्यमंत्री से ‘स्वर्ण पदक’ लेने का गौरव प्राप्त किया। पंजाब के कृषि निदेशक और भारत के कृषि आयुक्त रहने के बाद डॉ. चीमा विश्व बैंक में उच्च पद पर नियुक्त हो गए, जहां उन्होंने प्रशंसनीय कार्य किए। लेकिन पंजाब की धरती और क्षेत्र की कृषि एवं उद्योगपतियों के आकर्षण ने उन्हें कुछ समय बाद ही विश्व बैंक से वापस लौटने के लिए मजबूर कर दिया। हालांकि उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें विश्व बैंक भेज दिया था। विश्व बैंक से वापस लौट कर उन्होंने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) के उप-कुलपति का पद संभाला। कृषि विश्वविद्यालय को वह गांवों तक ले गए और कौणी में होम साइंस कॉलेज की स्थापना की। पीएयू में रोटेशन सिस्टम शुरू किया। इससे विश्वविद्यालय में प्रत्येक वैज्ञानिक को अपनी योग्यता दिखाने और तरक्की करने का अवसर मिला। विश्वविद्यालय में कई विषयों में पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री कोर्स शुरू किए। इन कोर्सों के ज़रिए शैक्षणिक योग्यता और डिग्री हासिल करने के बाद कई व्यक्तियों ने अलग-अलग क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किए।
नौजवान किसान लहर के संस्थापक डॉ. चीमा अपने आप में एक संस्था थे। उन्होंने रखड़ा में ‘पंजाब यंग फार्मर्स एसोसिएशन’ की नींव रखी। ‘पंजाब चैंबर ऑफ एग्रीकल्चर’ और ‘ऑल-इंडिया चैंबर ऑफ एग्रीकल्चर’ की स्थापना की। गुरु गोबिंद सिंह स्टडी सर्कल की स्थापना में पूरा योगदान दिया। पंजाब के किसानों के मन को शांति देने के लिए ‘नाम योग’ पुस्तक लिखी तथा युवाओं और अन्य लोगों के लिए ‘गीता और यूथ टुडे’ धार्मिक पुस्तक की रचना की। कृषि ज्ञान और विज्ञान संबंधी लेख लिखे जो किसानों और वैज्ञानिकों के लिए प्रकाश सतम्भ का काम करते थे। उनमें खास बात यह थी कि अगर कोई उनसे मिलने आता, तो वह खाली हाथ नहीं जाता था। वह दिन भर किसानों और कृषि आधारित उद्योगपतियों से मिलकर खुश होते और फाइलों का काम शाम को दफ्तर के समय के बाद करते। वह किसानों और उद्योगपतियों के बीच इतने लोकप्रिय थे कि जब वह विश्व बैंक से पंजाब के दौरे पर आते तो किसान और उद्योगपति तुरंत उनके स्वागत के लिए पहुंच जाते। उन्होंने गांवों में कई मिस्त्री और कृषि इंजीनियर बनाए, जिसकी वजह से आज भादसों में कंबाइन उद्योग शीर्ष पर है। उनके बनाए मिस्त्री आज बड़े उद्योगपति माने जाते हैं। इनमें करतार एग्रो इंडस्ट्री अग्रणी है। कृषि प्रसार सेवा में वह शीर्ष वैज्ञानिक थे। उन्होंने गांवों में कृषि प्रसार सेवा को बहुत मज़बूत किया और किसान-वैज्ञानिक और कृषि विशेषज्ञ के बीच सम्पर्क बढ़ाया।
सब्ज़ क्रांति के संस्थापक उस समय के केंद्रीय कृषि और ग्रामीण विकास मंत्री सी. सुब्रमण्यम थे। सुब्रमण्यम के नेतृत्व में आईसीएआर के डायरेक्टर जनरल डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन के साथ मिलकर मैक्सिको से गेहूं की बौनी ‘लरमा रोज़ो’ और ‘सनोरा-64’ आदि तथा ताइवान से चावल की एन-1 (ताइचुंग-1) किसमें लाकर पंजाब के किसानों को उपलब्ध करवाने में योगदान दिया। इसकी वजह से आज पंजाब गेहूं और चावल की काश्त में अन्य सभी राज्यों में अग्रणी है। इन बौनी किस्मों के भारत में आने से आईएआरआई और पीएयू के वैज्ञानिकों ने यहां की मिट्टी और वातावरण के अनुसार बौनी किस्में तैयार करके उनका प्रसार किया। गेहूं के प्रसिद्ध ब्रीडर वी.एस. माथुर (आईएआरआई) और डॉ. अटवाल (पीएयू) ने गेहूं की एचडी-2329 और कल्याण सोना जैसी गेहूं की किस्में तैयार करके किसानों को दीं, जिससे उत्पादन बढ़ा।
वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री और सब्ज़ क्रांति के संस्थापक सुब्रमण्यम और कृषि मंत्री बाबू जगजीवन राम तथा पंजाब के मुख्यमंत्री कैरों से लेकर प्रकाश सिंह बादल और राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह तक डॉ. चीमा पर पूरा विश्वास करते थे और कृषि मामलों में उनसे सलाह लेते थे। इन दोनों केन्द्रीय मंत्रियों के नेतृत्व में डॉ. चीमा ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण से पहले ही स्टेट बैंक ऑफ पटियाला और सिंडिकेट बैंक को किसानों को कज़र् देने के लिए प्रेरित किया और उस समय के मुख्य क्षेत्रीय बैंक स्टेट बैंक ऑफ पटियाला से ननांसू प्रोजेक्ट शुरू करवा कर गांवों में लाया गया। वह युवाओं को रोज़गार उपलब्ध करने में बहुत सहायक थे। उन्होंने ‘बाजीगर ग्राम सुधार सभा’ स्थापित करके बाज़ीगरों को शामलात ज़मीनों पर बसा कर इन बेकार पड़ी ज़मीनों को कृषि योग्य बनाया और बाज़ीगरों एवं अन्य श्रेणियों के लोगों को रोज़गार उपलब्ध करवाया। सेवा-निवृत्ति के बाद भी डॉ. चीमा घर नहीं बैठे। वह युवाओं को ज़मीन देकर रोज़गार देने और उन्हें दूसरे व्यवसायों में लगाने के अवसर की तलाश में तंजानिया गए, जहां 18 जुलाई, 1982 को उनका निधन हो गया।
डॉ. चीमा का जन्म 1918 में एक सितम्बर को पाकिस्तान के सियालकोट ज़िले के गांव वधाई चीमा में हुआ था। चाहे उनका कम आयु में ही निधन हो गया, परन्तु वह पंजाब के विकास, विशेषकर राज्य की कृषि में दिए अपने योगदान रूप में अपनी छाप छोड़ गए।
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