पंजाब कांग्रेस के संकट में स्वयं उलझ कर रह गई है हाईकमान
कौन सा ‘लाल’ सजाऊं तेरे सिहरे में भला,
इस शश-ओ-पंज में तो रात गुज़र जाएगी।
पंजाब कांग्रेस के नेतृत्व के लिए अंतिम फैसला लेने के मामले में कांग्रेस हाईकमान भी बुरी तरह शशोपंज (असमंजस) में फंसी दिखाई दे रही है। इस प्रकार प्रतीत होता है कि कहीं कांग्रेस हाईकमान हरियाणा कांग्रेस की भांति पंजाब कांग्रेस में भी एकता करवाने में इतनी देरी न कर दे कि रात ही गुज़र जाए। परिणामस्वरूप मुख्यमंत्री पद के लिए लड़ते कांग्रेस नेता विधायक बनने से भी न रह जाएं। कई बार कांग्रेस हाईकमान फैसले लेने में इतनी देर कर देती रही है कि उसकी ओर से लिया गया फैसला अपना महत्व ही गंवा बैठता है। कैप्टन अमरेन्दर सिंह को बदलते समय भी ऐसा कुछ ही घटित हुआ था। कई बार ऐसे प्रतीत होता है कि कांग्रेस की भीतरी सत्ता में बैठे लोग जैसे किसी अन्य पार्टी के हितों का ध्यान रख रहे हों, जो पार्टी को सही समय पर सही फैसले ही नहीं लेने देते।
हमारी जानकारी के अनुसार कांग्रेस हाईकमान अलग-अलग नेताओं को बुला कर बातचीत कर रही है। पहले प्रताप सिंह बाजवा तथा चरणजीत सिंह चन्नी को बुलाया गया था। अब राणा गुरजीत सिंह तथा परगट सिंह को बुलाया गया है। अन्यों को भी बुलाए जाने की ‘सरगोशियां’ हैं। इस प्रकार बुला कर सलाह लेना और वास्तविकता समझना अच्छी बात है, परन्तु बहुत धीरे-धीरे फैसले पर पहुंचना कांग्रेस हाईकमान की आदत ही बन चुकी है और बहुत बार कांग्रेस हाईकमान की हालत स्टेशन पर पहुंचने से पहले गाड़ी निकल जाने वाली हो जाती है।
़खैर, जिस प्रकार की ‘सरगोशियां’ हमें सुनाई दे रही हैं, उसके अनुसार कांग्रेस हाईकमान पंजाब से लेकर असमंजस में है और पंजाब बारे फैसला एक-दो दिन में ही होने के आसार न के बराबर हैं। चर्चा है कि पंजाब कांग्रेस की अध्यक्षता के उम्मीदवार फिर बढ़ते जा रहे हैं जो पंजाब कांग्रेस में फूट का एक नया दौर उभार सकते हैं, परन्तु इस समय अध्यक्षता के लिए जिन नामों की चर्चा है, उनमें अमरिन्दर सिंह राजा वड़िंग की अध्यक्षता सलामत रखने हेतु यत्नशील हैं जबकि अन्य दावेदारों में प्रताप सिंह बाजवा, चरणजीत सिंह चन्नी, विजयइन्द्र सिंगला, परगट सिंह तथा चन्नी समर्थक बन चके सुखजिन्दर सिंह रंधावा के नाम शामिल हैं, परन्तु चर्चा है कि यदि इनमें से किसी एक नाम पर सहमति न बनी तो कांग्रेस हाईकमान इन सभी को ही दरकिनार करके किसी ब्लैक हार्स (काले घोड़े) अर्थात ऐसे व्यक्ति को भी पंजाब कांग्रेस की अध्यक्षता सौंप सकती है, जिसके नाम की अध्यक्षता के दावेदारों में कोई चर्चा ही न हो। इस समय तो कांग्रेस की हालत मुमताज मलिक के इस शे’अर जैसी ही है :
अब शश-ओ-पंज में मुझे रहना नहीं,
हो कोई फैसला सख्त मुश्किल में हूं।
भूल बैठे हैं परवाज़ की जब आदत,
दर क़फस का खुला सख्त मुश्किल में हूं।
(परवाज़ = उड़ान, क़फस = पिंजरा, दर = दरवाज़ा)
सतलुज के निर्माता के लिए क्राऊड फंडिंग
फिल्म सतलुज पर चाहे कितनी भी बहस चल रही है और इसकी चाहे कितनी भी तारीफ हो रही है तथा बेशक इसका विरोध करने वाले भी धीरे-धीरे चुप होते जा रहे हैं, पर इस फिल्म ने पंजाब के काले दौर के एक खतरनाक कांड को फिर सामने ही नहीं ला दिया, अपितु वर्तमान दौर में फिर से पुलिस मुकाबलों की शुरुआत के खतरे तथा नुकसान के प्रति भी सचेत करवाया है। इसने यह एहसास करवाया है कि पुलिस राज कितना खतरनाक हो सकता है। फिल्म को सैंसर बोर्ड ने अनुचित शर्तें लगा कर पास नहीं किया, जबकि इससे पहले गुलज़ार की फिल्म ‘माचिस’ भी जो ऑपरेशन ब्लूस्टार तथा सिख कत्लेआम एवं खाड़कूवाद बारे ही थी, चल चुकी है। फिर कुछ अन्य फिल्में भी बनीं। यदि वे नहीं रोकी गईं तो इस फिल्म को रोकना किसी गहरी राजनीति का हिस्सा ही प्रतीत होता है।
सैंसर बोर्ड की स्वीकृति न मिलने पर फिल्म ओ.टी.टी. जी-5 पर रिलीज़ की गई, परन्तु दो दिन में ही प्रतिबंधित कर दी गई। बाद में विश्व भर में रोक दी गई, परन्तु हैरानी की बात है कि इसके वज़र्न बार-बार यू-ट्यूब पर चलने से नहीं रोके गए। लाखों की संख्या में डाऊनलोड भी हुए और पब्लिक स्क्रीनिंग भी सरेआम जारी है। इसके पीछे अवश्य कोई गहरी राजनीति होगी, नहीं तो यदि सरकार ने लोगों को देखने से रोकना ही था तो किसकी मजाल थी कि यू-ट्यूब तथा अन्य मंचों पर यह फिल्म बार-बार उपलब्ध रहती।
हां, इस फिल्म पर प्रतिबंध ने दिलजीत दोसांझ को तो शीर्ष पर पहुंचा दिया है और पता चला है कि शायद उन्होंने फिल्म रिलीज़ न होने के कारण अपना मेहनताना भी नहीं लिया। परन्तु इसके निर्माता रौनी स्क्रूवाला, हनी त्रेहन तथा मैकगफ्न पिक्चर्स वाले तो सिख नहीं हैं। वास्तव में यह फिल्म हिन्दू-सिख विवाद बारे है भी नहीं। यह तो एक दौर में पुलिस की गुंडागर्दी तथा लालच से पर्दा हटाने वाले शहीद जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित फिल्म है। यह फिल्म गैर-सिख फिल्म निर्माता का सिखों पर एक एहसान जैसी है। चाहे उन्होंने यह व्यापारिक दृष्टिकोण से कमाई के लिए ही बनाई हो। उन्होंने इस फिल्म पर 30-40 करोड़ रुपये खर्च किये हैं। अब उन्हें प्रशंसा तो मिल रही है, परन्तु उनका मूल पैसा भी डूबता प्रतीत होता है। साहिब श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी की एक साखी याद आ रही है। एक जैन कलाकार ‘हंसा’ गुरु जी के पास एक चित्र लेकर आया। गुरु साहिब ने उसकी कला की प्रशंसा की, परन्तु कलाकार की सोच के कुछ अंधेरे पक्ष भी उजागर किये, परन्तु साथ ही ईनाम स्वरूप कलाकार को कुछ मोहरें भी दीं। उस समय गुरु साहिब के वचन थे कि जो व्यक्ति किसी की कला देख कर सिर्फ ‘वाह-वाह’ करता है और जेब में से कुछ नहीं देता, उस पर लाहनत है। सो, हमारा सिखों का फज़र् बनता है कि सिखों पर जुल्म की इस दास्तान पर फिल्म बनाने तथा खर्च करने वाले गैर-सिख की मूल लागत वापस करने के लिए देश-विदेश में बैठे पंजाबियों खासकर सिख समुदाय को सोचना चाहिए। इस फिल्म ने 25000 लावारिस कहे जाते मारे गए लोगों की बात फिर सामने ला दी है और उनके कातिलों को मिल रही सुविधाओं की बात भी इसी कारण फिर सामने आई है जो सज़ा भुगतने का सिर्फ ढोंग ही कर रहे हैं। इनमें सिर्फ सिख ही नहीं थे। कई हिन्दू तथा मुसलमान भी थे, जिन्हें आतंदवादी कह कर मार दिया गया। कुछ किसी की निजी रंजिश तथा लालच का शिकार भी हुए। अच्छी बात यह है कि पूर्व सांसद तरलोचन सिंह तथा मास्टर तारा सिंह की नातिन एस.जी.पी.सी. सदस्य बीबी किरणजोत कौर ने भी कुछ ऐसी ही बात कही है।
किसी ़फनकार के ़फन की नहीं तारीफ ही काफी,
उसे जो रोज़ी-ओ-रोज़गार की जब हो ़गदा लाहन।
—लाल फिरोज़पुरी
(़गदा = मांगना, लाहन = ज़रूरत)
श्री करतारपुर साहिब गलियारा अब तो खोल दें
अपने जीअ में ज़रा तो कर इन्स़ाफ,
कब से ना-मेहरबान है प्यारे।
—ज़िगर मुरादाबादी
जब श्री करतारपुर गलियारा खोला गया था तो समूची सिख कौम ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का धन्यवाद किया था। भारत की सही नीति है कि आतंकवाद तथा बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते, परन्तु अब तो सत्तारूढ़ भाजपा के मातृ संगठन के सर-कार्यवाह दत्तात्रेय हौसबोले ने भी साफ-साफ कहा है कि जहां आतंकवाद के खिलाफ सख्ती की ज़रूरत है, वहीं दोनों देशों को आना-जाना तथा व्यापार भी खुलना चाहिए। आर.एस.एस. प्रमुख मोहन भागवत भी इसका समर्थन कर चुके हैं। फिर पाकिस्तान के साथ ट्रैक-2 बातचीत के कितने ही सत्र हो चुके हैं। भाजपा के ही एक अन्य नेता रहे राम माधव तथा भारतीय सेना के पूर्व जनरल एम.एम. नरवणे भी पर्दे के पीछे की बातचीत में शामिल हो चुके हैं।
पाकिस्तान के साथ क्रिकेट तथा हॉकी मैच शुरू हो चुके हैं। सबसे बड़ी बात पाकिस्तान में गुरुपर्वों के अवसर पर सैकड़ें सिख श्रद्धालु 10-10 दिन के लिए स्वतंत्र रूप से घूमने जा रहे हैं। सोचने वाली बात है कि यदि कोई सिख 10 दिन पाकिस्तान में रह कर घूम कर देश विरोधी प्रभाव में नहीं फंसता तो वह श्री करतारपुर साहिब गलियारे तथा गुरुद्वारा साहिब में सिर्फ कुछ घंटे व्यतीत करके देश विरोधी कैसे हो जाएगा। अत: प्रधानमंत्री श्री मोदी को विनती है कि वह अपने ही नेतृत्व में खुलवाए श्री करतारपुर गलियारे को पुन: खुलवाने की कृपा करें। कहीं इतिहास में यह न लिखा जाए कि श्री मोदी ने ही यह गलियारा खुलवाया था और उनके शासन में ही यह बंद भी हो गया था। हां, इस हेतु सख्त निगरानी पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी, अपितु चाहिए तो यह है कि जब प्रत्येक जाने वाले के लिए पुलिस की जांच ज़रूरी है तो फिर पासपोर्ट की शर्त हटा दी जाए ताकि गुरु घर के श्रद्धालु जिनके पास पासपोर्ट नहीं है, वे भी गुरुद्वारा श्री करतारपुर साहिब के दर्शन कर सकें।
-1044, गुरु नानक स्ट्रीट, समराला रोड, खन्ना
-मो. 92168-60000



