पी.ओ.के. के लिए सही खिड़की खोले भारत

इस समय पाकिस्तान के अवैध कब्ज़े वाले कश्मीर जिसे हम ‘पी.ओ.के.’ के नाम से भी जानते हैं। हालात विस्फोटक नज़र आने लगे हैं। सिंधु जल संधि पर भी भारत द्वारा अपनाए गए कड़े रुख के कारण पाकिस्तान में तिलमिलाहट है। पाकिस्तान में इस समय की प्रचलित महंगाई ने वहां की जनता को त्रस्त कर रखा है। ऐसे हालात में उस विद्वान की बात याद आती है जिसने पाकिस्तान की पतली होती हालत देखकर कहा था -पाकिस्तान को एक रस्सा दे दो, वह उस रस्से से लटक कर आत्महत्या कर लेगा।
पी.ओ.के. में जन-आक्रोश शिखर पर है, संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में हफ्तों से पहियाजाम और विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है। इस विरोध प्रदर्शन का बातचीत द्वारा कोई हल निकालने की जगह आसिम मुनीर के नेतृत्व में पाक सेना और पुलिस ने बर्बरता का दामन थामा है, जिससे जन-आन्दोलन पहले से उग्र हो गया है। पाकिस्तान के दमन चक्र के खिलाफ ब़गावत के ऊंचे होते स्वर से ईरान-अमरीका के बीच वार्ताकार की भूमिका दिखा कर दुनिया भर को अभिमान दिखाने वाले पाकिस्तान के चेहरे पर राख उड़ रही है। कश्मीर के जिस हिस्से को वह ‘अपना कह कर प्रचार करवा रहा है, उससे उसकी निर्दयता और दमन चक्र से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान द्वारा प्रचारित ‘कश्मीर नेरेटिव’ की धज्जियां उड़ गई है। आंदोलनकारी जिन मुख्य मांगों पर अडिग हैं, वे हैं- 12 आरक्षित सीटों पर चुनाव न करवाया जाए जो पाकिस्तान में रह गए शरणार्थियों के नाम पर इस्लामाबाद के कठपुतली शासकों को वहां थोपने के काम आती हैं। होता यह है कि इस्लामाबाद की हकूमत इनके ज़रिए हर बार सत्ता पर काबिज़ होकर इस पूरे क्षेत्र को पाकिस्तान का बंधक या बंधुआ की तर्ज पर व्यवहार करती है।
इस बार संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भारत ने पी.ओ.के. में लागू की जा रही नाइंस़ाफी और बर्बरता को पुरज़ोर तरीके से उठाया। ज़ाहिर है कि पाकिस्तान जिस मनचाहे ढंग से दमन चक्र चला कर इसका हल करना चाहता है वह हो नहीं सकता। भारत को क्या करना चाहिए? पी.ओ.के. की वर्तमान स्थितियों को देख कर भारत के लिए कूटनीतिक, सामरिक और राजनीतिक तौर पर सही अवसर है कि वह पी.ओ.के. को भारत में मिलाने का यत्न तेज करे। कुछ वरिष्ठ पत्रकार इसी पर ज़ोर दे रहे हैं। इसके लिए रोड मैप भी बता रहे हैं कि भारत को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के अच्छे एजेंडे को वहां मौजूद आतंकी बुनियादी ढांचे का हवाला देकर किसी भी सैन्य कार्रवाई की तरफ बढ़ना चाहिए।
इसका आधार यह हो सकता है कि सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर, जिसमें अधिकृत कश्मीर और गिलगित, बाल्टिस्तान शामिल हैं, भारत का अभिन्न अंग हैं। देश के सभी नेता, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री, प्रधानमंत्री तक सभी इस बात को दोहराते रहते हैं। भारत की सत्तारूढ़ पार्टी ही नहीं, विपक्ष भी भारत में पी.ओ.के. को मिलाने के लिए एक स्वर बोल रहा है।लेकिन बयान की बात और है, सैन्य कार्रवाई और। हम नैतिक तौर पर, घोषित तौर पर पी.ओ.के. के लोगों के दु:खों से सहमत होकर विश्व भर में आवाज़ उठा सकते हैं और उठानी भी चाहिए, परन्तु एकदम से सैन्य कार्रवाई मुमकिन नहीं लगती। पहले पी.ओ.के. के अवाम को अपनी लड़ाई भरपूर तरीके से लड़नी चाहिए। हम तब तक यह कर सकते हैं कि अलग-अलग देशों में अपने विशेष दूत भेजकर पी.ओ.के. के दर्द को विश्व भर में बताकर उनके लिए एक संवेदन प्लेटफार्म तैयार करें। सेना को तुरंत कार्रवाई के लिए भेजना न तो नैतिक दृष्टि से उचित है, न वैश्विक और व्यवहारिक दृष्टि से। हमले का तर्क आकर्षक लगने के बावजूद व्यवहारिक हर्गिज़ नहीं लगता। राजनीतिक, सामाजिक, नैतिक, कूटनीतिक किसी भी दृष्टि से व्यवहारिक नहीं लगता।

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