सादा जीवन उच्च् विचार
आजकल लोगों ने जीने के सपने देखने बंद कर दिए हैं। वैसे भी सपना देखने का यह ज़माना रहा ही नहीं। हम कभी उजले और स्मार्ट शहरों के सपने देखते थे। उन्हें कभी रैंक भी देते थे। नम्बर एक स्मार्ट शहर बन जाना तब हर शहर का सपना होता था। लकदक सड़कें, उजली रोशनी से चम-चम चमकती सड़कें, कि आदमी उनमें अपना चेहरा देख ले लेकिन ऐसी सड़कें अब नमूना पुस्तकों में मिलती है। अपनी इन सड़कों को देखो। एक बारिश गिरी और उनकी तारकोल की ऊपरी परत उखड़ गई। दूसरी बारिश गिरी और आदमी इन सड़कों पर बाइक नहीं, मौत के कुएं में साइकिल चला रहा होता है। फिर लगता है यह साइकिल तो हम रोज़ चलाते हैं, एक ऐसा साइकिल जिसके दोनों टायर पंक्चर हैं, और हम इसके साथ ज़िन्दगी का ओलम्पिक खेलने चले हैं।
यह कौन-सा ओलम्पिक है भाई? इसमें स्मार्ट शहरों की जब दौड़ होती है, तो आपका शहर आराम से पहले नम्बर से पचासवें नम्बर तक आ जाता है। इनके कूड़े के ढेरों पर आपका सौन्दर्य बोध हुक्का गुड़गुड़ाता नज़र आता है, और आप विकृतियों में जीने को आम आदमी का जीना कहने लगते हैं।
यह आम आदमी शब्द भी खूब है, साहिब! नेता लोग इसका कल्याण कर देने का दावा आम तौर पर अपने भाषणों में करते नज़र आते हैं। जब वे कहें कि हम तो आम आदमी के कल्याण के लिए ही जीते हैं, और उसके लिए ही मरते हैं। तब समझ लीजिए कि उनका आम आदमी कहने का अर्थ अपने बेटे से है या नाती-पौत्र से है। पंजाब में एक सूत्र वाक्य है, ‘रोंदी यारां नूं लै लै नां भरावां दे।’ जितना ही कोई नेता अपने भाषण में आम आदमी की दुर्दशा के बारे में अधिक चिन्ता प्रकट करता है, उतना ही आप समझ लीजिये कि उसकी वंश बेल आर्थिक रूप से वंचितों से भरी हुई है। उसे सबसे पहले इन वंचितों की खोज खबर लेनी है। इसके बाद ही आम जनता का भाग्य-निर्णय अपने कल्याणकारी प्रवचनों से वह करेगा। अब आप इन प्रवचनों को प्रवंचना समझ लेंगे तो हम आपकी अक्ल की दाद देंगे, और कहना चाहेंगे, ‘भैय्या जब से जागे तब से सवेरा। आपको समझ तो आई।’
लेकिन अपने यहां जब किसी को समझ आती है, तो वह ज़रूरत से अधिक आ जाती है। बन्दा क्रांतिकारी होने से पहले उसका ज़िन्दाबाद हो जाता है। ज़िन्दाबाद हो जाने के बहुत लाभ हैं साहिब! आप बहुत आसानी से क्रांति का मसीहा उस महामानव को कह सकते हैं, जो आपके लिए भी शार्टकट संस्कृति के द्वारा खोल सके। यूं सांस्कृतिक हो जाने के बड़े लाभ हैं। वैसे भी आजकल पुस्तक संस्कृति से टूट जाने के बाद लोग अपने लिए मनभावन संस्कृतियों की रचना करने लगे हैं। इन संस्कृतियों के इतिहास को पुन: लिखा जा रहा है। ऐसा लिखना कि जो आपके परिवार, जाति या धर्म को सर्वोपरि घोषित कर सके। अपने वर्ग को महिमामण्डित करते हुए लोग उस अतीत पर टसुये बहाते दिखते हैं, कि जिसमें वह बहुत आसानी से पूरा आरोप गुलामी के उन दिनों पर लगा देते हैं, कि जिसमें उनके अतीत के साथ बहुत अन्याय किया गया। अब वक्त आ गया है इस अन्याय का प्रतिकार किया जाये। जो लिखा है उसे नकार कर कल के नायक खलनायक बना दिये जायें। और जिनकी पहले लिखा इतिहास उपेक्षा या मिट्टी पलीद (आपके शब्दों में) करता रहा, उन्हें एक नई शाब्दिक छवि दी जाये। शाब्दिक इस लिए कहा कि आज कल एक नया अभियान चल रहा है। लोगों से लेकर चौकों, और चौकों से लेकर शहरों तक के नाम बदले जा रहे हैं, और महत्त्वपूर्ण इमारतों में से आर्य युग की इमारतों को तलाश किया जा रहा है। तलाश ही नहीं, बल्कि उनका चेहरा और मोहरा भी बदला जा रहा है। यूं गुलाम मानसिकता के आरोप लगा कर हम हिन्दुस्तान को आर्यवृत बना रहे हैं। गानों को भी पुनर्जीवन दिया जा रहा है। जो राष्ट्र गान है उससे कम राष्ट्रगीत भी नहीं। इसलिए अब सभी सामूहिक सभाओं में इन दोनों का गायन अनिवार्य कर दिया गया है।
वैसे एक तरह से यह अच्छा ही हुआ, क्योंकि प्राय: ऐसी सभायें उत्सवधर्मी सभायें ही होती हैं, जिनमें सफलताओं की मंज़िल पा लेने की कल्पना का सम्मान किया जाता है। पूरा देश अब उन सपनों के साकार हो जाने की शोभायात्रा निकालने में लगा है कि जो सफलता गोदी मीडिया के शीर्षकों में दिखायी देती है, कभी वास्तविक रूप में हमारे साथ हाथ मिलाती हुई नज़र नहीं आती। हम कहते हैं हमने महंगाई पर नियन्त्रण पा लिया, और तब हर उपयोगी वस्तु की कीमत छलांग लगा ऊपर उठती है, और हर साधारण जेब को फटीचर बना देती है। हम कहते हैं हम भ्रष्टाचार को शून्य स्तर पर भी सहन नहीं करेंगे, और कहने वाले ही इतने भ्रष्ट निकल आते हैं कि उस पैसे से बनाये शीश महलों को झोंपड़ी सिद्ध करने लगे हैं। इन झोंपड़ियों के वासी आपको सादा जीवन उच्च विचार जीने का अमर सन्देश देते हैं, और आप हैं कि इस सन्देश को सुनते ही नहीं।



