वक्त का तकाज़ा

लावारिस कुत्तों द्वारा लोगों और खासकर बच्चों, महिलाओं एवं वृद्धों पर हमले और फलस्वरूप उन्हें नोच-नोच कर मार देने की घटनाएं अब तो जैसे असहनीय मोड़ तक पहुंच गई प्रतीत होती हैं। पंजाब के होशियारपुर ज़िला के गांव बस्सी जलाल में विगत 6 जुलाई को एक पोल्ट्री फार्म के निकट सात-आठ कुत्ते मां-बाप के सामने ही, उनकी चार वर्षीय बच्ची को घसीट-खींच कर निकटवर्ती खेतों में ले गये, और वहां उनके सामने ही बच्ची को नोंच-नोंच कर मार डाला। माता-पिता ने लोगों की मदद से बड़ी मुश्किल से कुत्तों को भगाया। प्रवासी लोगों का यह परिवार किसी किसान के खेत में धान की रोपाई कर रहा था, और उनकी चार वर्षीय बच्ची पास ही एक बड़े वृक्ष के नीचे खेल रही थी, कि कुत्ते एक-बारगी उस पर हमला करके उसे जबड़ों में भर कर दूर खींच ले गए। नि:संदेह यह एक बड़ा वीभत्स एवं भयावह दृश्य था। बच्ची चीखती-चिल्लाती रही किन्तु उसकी मासूम आवाज़ कुत्तों  के आवारा झुण्ड की चिल्ल-पों में ही दब कर रह गई।
प्रशासनिक धरातल पर बेशक यह एक ऐसी त्रासदी है कि लावारिस कुत्ते एक के बाद एक निरीह प्राणियों की जान ले रहे हैं। उन्हें काट-नोंच कर घायल करते हैं, किन्तु ऐसे कुत्तों की रोकथाम हेतु प्रशासन कोई कठोर कार्रवाई करने की बजाय चिरकाल से ‘देखो, सुनो और टाल दो’ की नीति अपनाये रखने पर विवश है। देश की अनेक छोटी-बड़ी अदालतें ऐसी घटनाओं के विरुद्ध कई बार टिप्पणियां कर चुकी हैं। सर्वोच्च न्यायालय भी लावारिस कुत्तों और उनके द्वारा लोगों को काटे जाने की घटनाओं को लेकर कई बार फैसले जारी कर चुका है, किन्तु थोड़ी देर की प्रशासनिक उथल-पुथल के बाद परनाला फिर वहीं पहले वाली जगह पर आ टिकता है। सामाजिक, धार्मिक संस्थाओं और राजनीतिक वर्गों के कई लोगों ने भी इस अति-गम्भीर हो गई समस्या के विरुद्ध कई बार ‘हाअ का नारा’ मारा है, किन्तु इसे प्रशासन की निरंकुशता कहें अथवा उसकी धृष्टता, निरोधक कार्रवाई करने हेतु कभी कोई कलम नहीं चली, न ही कोई प्रतिबद्ध हाथ उठा है। 
इस समस्या का एक और अति गम्भीर पक्ष यह है कि एक घटना की अभी स्याही भी नहीं सूखती कि दूसरी घटना हो जाती है। फिर तीसरी, चौथी और इस प्रकार का यह सिलसिला जन-साधारण चीखो-पुकार के बावजूद अनवरत चला आ रहा है। विगत मास 10 जून को  मोरिण्डा में घर से दूध लेने जा रही आठ वर्षीय बच्ची को कुत्तों ने नोच-नोच कर मार डाला था। जालन्धर के लाम्बड़ा में एक युवा छात्र को हड्डा-रोड़ी कुत्तों ने हमला करके घायल कर दिया था। इसी मास 2 जुलाई को जगराओं के एक गांव में रात को कुत्तों के एक झुण्ड ने एक युवा हृष्ट-पुष्ट खेत मजदूर को खेतों में खींच ले जा कर मार दिया था। मृतक बिहार से पंजाब में धान की पनीरी की बुआई करके रोज़ी-रोटी कमाने आया था, किन्तु प्रशासनिक कोताही की भेंट चढ़ गया।
नि:संदेह इस समस्या का पानी अब गर्दन के ऊपर तक पहुंच गया है। सरकारें और उनका प्रशासन इस समस्या को लेकर इतना उदासीन और उद्दण्ड क्यों हैं, यह समझ नहीं आता। पूरा समाज इसे लेकर त्राहि-त्राहि कर रहा है। अदालतें भी इस मामले को लेकर परामर्श, निर्देश-आदेश से भी आगे, सरकारों को फटकार तक लगा चुकी हैं, किन्तु प्रशासनिक तंत्र के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। पता नहीं कुत्तों के तीव्र जबड़ों के बीच प्रशासन और कितनी नर-बलियां लेना चाहता है। बेशक कुछ कुत्ता-प्रेमियों का अपना तर्क हो सकता है, किन्तु इस तर्क के बदले मानव-जानें कुर्बान करने की तुक समझ नहीं आती।
हम समझते हैं कि नि:संदेह इस समस्या पर किसी भी प्रकार से रोक लगाने की बेला अब आ चुकी है। सर्वोच्च अदालत हाल ही में ़खतरनाक एवं खूंखार कुत्तों को मारने का निर्देश भी जारी कर चुकी है। सरकारें और उनके प्रशासनिक तंत्र लावारिस कुत्तों के विरुद्ध कई बार एक्शन योजनाएं भी तैयार करते हैं, और कई बार कार्रवाई किये जाने की घोषणाएं भी की जाती हैं, किन्तु इनका परिणाम खाली कागज़ पर एक लकीर भर खींचने से अधिक कुछ नहीं निकलता।  पंजाब में तो मुख्यमंत्री स्वयं लावारिस कुत्तों के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों को अक्षरश: लागू करने का वायदा कर चुके हैं। तथापि, हम समझते हैं कि कानूनी अथवा न्यायिक फैसलों को मानने के तौर पर बेशक न सही, नैतिकता एवं मानवीयता के धरातल पर तो अब अवश्य कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। कुत्तों को बेशक मारें नहीं, किन्तु उनके पंजों से इन्सानों को बचाने के लिए कुछ न कुछ कीजिये अवश्य। यह समाज की पुकार है, और वक्त का तकाज़ा भी है।

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