क्या पार्टी लाइन पर ही चलेंगे चरणजीत सिंह चन्नी ?

पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और जालन्धर से कांग्रेस सांसद चरणजीत सिह चन्नी ने लगता है कि बगावत का फैसला टाल दिया है। वह पार्टी की लाइन पर ही काम करने को तैयार हो गए हैं। हालांकि यह उनका अंतिम फैसला है। भाजपा के कुछ लोगों से उनका संपर्क हुआ है लेकिन भाजपा भी अभी उन पर पूरी तरह से दांव लगाने को तैयार नहीं है। चन्नी किसी तरह से अपने को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कराना चाहते हैं। यह काम कांग्रेस नहीं करेगी और भाजपा भी नहीं करेगी। इसीलिए चन्नी एक कदम पीछे हटे हैं। यह सही है कि पंजाब में दलित आबादी देश के किसी भी दूसरे राज्य के मुकाबले ज्यादा है, लेकिन वह बहुत बंटा हुआ है। राज्य की कुल 33 फीसदी दलित आबादी में सिर्फ एक तिहाई ही मज़हबी दलित हैं, जिनके नेता के तौर पर चन्नी अपने को देख रहे हैं। दूसरे दलित समुदायों में खास कर रविदासिया और वाल्मीकि में मज़हबी दलितों से दूरी है। यही कारण है कि कांशीराम का दलित राजनीति का प्रयोग पंजाब में नहीं चल सका था। इस बात को चन्नी भी समझ रहे हैं। दूसरी बात यह है कि संख्या चाहे जितनी भी कम हो लेकिन पंजाब की राजनीति में जाट सिखों का दबदबा अभी तुरंत खत्म नहीं होने वाला है। हर पार्टी को जाट सिख चेहरा चाहिए। भाजपा जैसी पार्टी जो पूरी तरह से 38 फीसदी हिंदू वोट की राजनीति कर रही है, उसने भी जाट सिख को अध्यक्ष बनाया है। चन्नी इस बात को समझ रहे हैं। इसलिए अब वह कांग्रेस से मोलभाव कर रहे हैं कि चुनाव के बाद उनको मुख्यमंत्री बनाया जाए।
वित्त सचिव का पद रिक्त
केंद्र सरकार में प्रधानमंत्री के बाद सबसे अहम चार मंत्रालयों में एक वित्त मंत्रालय है। पिछले कई बरसों से निर्मला सीतारमण वित्त मंत्री हैं। उन्होंने लगातार बजट पेश करने का रिकॉर्ड बनाया है, लेकिन उनके मंत्रालय के सचिव का पद एक साल से खाली है। गौरतलब है कि वित्त मंत्रालय में कई सचिव होते हैं। राजस्व से लेकर व्यय और आर्थिक मामलों से लेकर वित्तीय सेवाएं, निवेश और सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन व सार्वजनिक उद्यम तक के अलग-अलग छह सचिव होते हैं, लेकिन वित्त सचिव एक ही होता है। भारत के वित्त सचिव के पद से 30 जून, 2025 को अजय सेठ सेवा-निवृत्त हुए थे। उसके बाद से वित्त सचिव का पद खाली है।
कई सचिवों के नाम की चर्चा हुई, लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी वित्त सचिव नियुक्त नहीं किया गया। गौरतलब है कि पिछले काफी समय से देश में यह व्यवस्था बन गई थी कि वित्त मंत्रालय के छह सचिवों में से सबसे वरिष्ठ सचिव को वित्त सचिव नियुक्त किया जाता था। एक परम्परा बन गई थी। कहा जा रहा है कि नरेंद्र मोदी की सरकार कुछ समय से इस परम्परा को समाप्त करने की कोशिश कर रही थी। अब वह इसमें कामयाब हो गई है। अजय सेठ के बाद जो वरिष्ठ थे वह भी सेवा-निवृत्त हो गए या सेवा-निवृत्त होने वाले हैं। हालांकि अब भी पता नहीं है कि सरकार किसको वित्त सचिव नियुक्त करेगी।
केजरीवाल की राजनीति
आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल मौके की तलाश में थे। पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें कोई ऐसा मुद्दा चाहिए था, जिस पर वह मध्य वर्ग को आकर्षित कर सके। एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर देश में मचे हल्ले से उससे उन्हें मौका मिल गया। उन्होंने इसका राजनीतिक लाभ लेने का अभियान शुरू कर दिया है। उनकी पार्टी दिल्ली और पंजाब में इसे मुद्दा बना रही है। इस सिलसिले में उन्होंने देश की 29 ऑटोमोबाइल कंपनियों को चिट्ठी भी लिखी है। केजरीवाल ने इन कंपनियों को चिट्ठी लिख कर कहा है कि वे लिखित रूप से बताएं कि 20 फीसदी एथेनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल यानी ई-20 पेट्रोल से गाड़ियों के इंजन पर कोई असर नहीं हो रहा है। उन्होंने 2023 से पहले बनी गाड़ियों के बारे में यह सवाल पूछा है। इस बात की पूरी संभावना है कि कोई भी कंपनी यह दावा लिखित में नहीं करेगी। उनके जवाब का इंतजार करके केजरीवाल आगे का दांव चलेंगे। बताया जा रहा है कि उनकी पार्टी ने ऐसे सैकड़ों मामले जुटाए हैं, जिनमें ई-20 पेट्रोल से गाड़ियों के इंजन खराब हुए हैं। वे बीमा कंपनियों की ओर से दावा ठुकराने के मामले भी जुटा रहे हैं। इसके साथ ही बिना मिलावट वाले पेट्रोल की कीमत का मुद्दा भी जोड़ जाएगा। आने वाले दिनों में केजरीवाल इसे बड़ा मुद्दा बनाएंगे।
‘मौनेंद्र मोदी’ कहा जाने लगा
केंद्र में जब यूपीए की सरकार थी और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। तब उनकी चुप्पी को लेकर भाजपा की ओर से खूब हमले होते थे। मीडिया मे भी उन्हें ‘मौनमोहन सिंह’ कहा जाता था। जब 2014 में कांग्रेस हारी और भाजपा की सरकार बनी तो कई सालों तक भाजपा के बड़े नेता यह दावा करते थे और इसमें गर्व महसूस कराते रहे कि अब भारत को बोलने वाला प्रधानमंत्री मिला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब भी देश-विदेश में खूब बोलते हैं। लेकिन देश, समाज, राजनीति आदि को लेकर जो बड़ा घटनाक्रम होता है, उस पर वह चुप्पी साध लेते है। इस समय प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी पर न सिर्फ  चर्चा में है, बल्कि उसका मज़ाक भी बनाया जा रहा है। मज़ाक बनाने वालों में दक्षिणपंथी प्रभावी भी हैं। सबसे लोकप्रिय इन्फ्लूएंसर्स ने उन्हें ‘मौनेंद्र मोदी’ का नाम दिया है। 
‘मौनमोहन सिह’ की तर्ज पर ‘मौनेंद्र मोदी’। इसका कारण यह है कि हाल की किसी भी बड़ी घटना पर प्रधानमंत्री का बयान नहीं आया है। सबसे ताज़ा मामला अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का है। मोदी ने न सिर्फ मंदिर का शिलान्यास किया था, बल्कि उद्घाटन भी किया था। उनकी सरकार के निर्देश पर ट्रस्ट का गठन हुआ था। फिर भी करोड़ों रुपये की चोरी पर वह चुप हैं। इससे पहले नीट (यूजी) की परीक्षा के पेपर लीक और दोबारा परीक्षा से 24 लाख छात्र और उनके परिजन परेशान हुए। उसी समय सीबीएसई के 12वीं बोर्ड की ऑनस्क्रीन मार्किंग से करीब 18 लाख छात्र प्रभावित हुए, परन्तु प्रधानमंत्री ने चुप्पी साधे रखी। 
चढ़ावा चोरी पर राहुल की चुप्पी
अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावा चोरी को विपक्षी पार्टियों खास कर उत्तर प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी और कांग्रेस की सहयोगी समाजवादी पार्टी ने इसे मुद्दा बनाया है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय और कांग्रेस के दूसरे नेता भी इस मुद्दे पर खूब बोल रहे हैं, लेकिन राहुल गांधी इस पर कुछ नहीं बोल रहे हैं। राहुल की चुप्पी रणनीतिक दिखाई दे रही है। बताया जा रहा है कि राहुल इसलिए चुप हैं क्योंकि वह कुछ भी बोलेंगे तो भाजपा और आरएसएस के पूरे सिस्टम को मौका मिल जाएगा मामले को घुमाने का। सारा फोकस चढ़ावा चोरी के मामले से हट कर राहुल गांधी के बयान पर आ जाएगा। 
कांग्रेस को यह भी लग रहा है कि जब तक हिंदू समाज में दक्षिणपंथी लोग खुद ही चढ़ावा चोरी का मामला उठा रहे हैं और पूरी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं तो विपक्ष को और खास कर राहुल गांधी को इससे दूर रहना चाहिए। यह भी कहा जा रहा है कि संघ मुख्यालय नागपुर से लेकर दिल्ली, लखनऊ और अयोध्या तक के सत्ता केंद्र आपस में ही लड़ रहे हैं। संघ और विहिप के बीच भी तनातनी है। ऐसे में अगर राहुल गांधी बयान देते हैं तो सब एक होकर उनको निशाना बनाने लगेंगे। इसलिए राहुल ने चुप्पी साध रखी है। वह बोलेंगे लेकिन अभी नहीं। हो सकता है कि चुनाव के समय बोले या उनका बयान तब आए, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मामले में कुछ बोले। 

#क्या पार्टी लाइन पर ही चलेंगे चरणजीत सिंह चन्नी ?