कूटनीति के कैनवास पर भारत का उभरता नया स्वरूप

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड की ऐतिहासिक यात्रा के बाद स्वदेश लौटे हैं। वह इन देशों से लिए रक्षा व सुरक्षा सहयोग, महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी, व्यापार, तकनीक, शिक्षा और समुद्री सुरक्षा के कई महत्वपूर्ण समझौते करके आए हैं। आज जब वैश्विक भू-राजनीति के वर्तमान दौर में महाशक्तियों के बीच वर्चस्व की होड़ मची है और पारम्परिक वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं बिखराव के दौर से गुज़र रही हैं, तब किसी देश की विदेश नीति की सफलता इस बात से मापी जाती है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों को कितनी कुशलता से सुरक्षित करता है। इस संदर्भ में विदेश मंत्रालय द्वारा रेखांकित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड का छह दिवसीय दौरा भारत की समकालीन विदेश नीति के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ है। 6 से 11 जुलाई तक चले इस सघन राजनयिक अभियान ने न केवल भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति को नई ऊर्जा दी है, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की स्थिति को ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ (सुरक्षा प्रदाता) और एक अपरिहार्य आर्थिक धुरी के रूप में स्थापित कर दिया है।
यह दौरा महज कुछ द्विपक्षीय बैठकों या औपचारिक समझौतों का पुलिंदा नहीं था। इसे भारत के दूरगामी रणनीतिक दृष्टिकोण, विशेष रूप से ‘विज़न महासागर’ के धरातल पर क्रियान्वयन के रूप में देखा जाना चाहिए। इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड—ये तीनों देश हिंद-प्रशांत की उस समुद्री भूगोल पर स्थित हैं, जहां से भारत के दो-तिहाई व्यापार और ऊर्जा मार्ग गुजरते हैं। इस यात्रा के ज़रिए भारत ने रक्षा निर्यात, महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षा, परमाणु ऊर्जा के नए मार्ग और मुक्त व्यापार समझौतों का ऐसा मज़बूत चक्रव्यूह तैयार किया है, जो आने वाले दशकों में देश को ़5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था से आगे बढ़ाकर एक विकसित राष्ट्र बनाने का मार्ग प्रशस्त करेगा। दौरे के पहले पड़ाव के रूप में जकार्ता में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के साथ हुई द्विपक्षीय वार्ता भारत के रक्षा इतिहास में एक नया अध्याय लिख गई। सबसे बड़ी कूटनीतिक और रक्षा सफलता इंडोनेशिया के साथ लगभग 5,400 करोड़ रुपये के ब्रह्मोस मिसाइल और तटीय रक्षा प्रणालियों के सौदे पर हुई ठोस प्रगति है। यह सौदा न केवल भारत के रक्षा निर्माण क्षेत्र की वैश्विक साख को बढ़ाता है, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन को बनाए रखने में भी मददगार साबित होगा।
सुरक्षा के मोर्चे पर इससे भी बड़ी रणनीतिक सफलता सुदूर इंडोनेशियाई द्वीप पर स्थित साबांग बंदरगाह के संयुक्त विकास को लेकर बनी सहमति है। मलक्का जलडमरूमध्य के ठीक मुहाने पर स्थित साबांग बंदरगाह का रणनीतिक महत्व अद्वितीय है। दुनिया का अधिकांश समुद्री व्यापार इसी पतले जलमार्ग से होता है। साबांग में भारत की आर्थिक और तकनीकी उपस्थिति का सीधा अर्थ यह है कि भारत अब अंडमान और निकोबार द्वीप समूह से परे हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के मिलन बिंदु पर अपनी पैनी नज़र रख सकेगा। 
यात्रा के दूसरे चरण में मेलबर्न में आयोजित तीसरे भारत-ऑस्ट्रेलिया वार्षिक नेताओं के शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज के बीच हुई बातचीत पूरी तरह से भविष्य की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर केंद्रित रही। इस पड़ाव की सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि वह नागरिक परमाणु ऊर्जा समझौता रहा। इस समझौते के तहत ऑस्ट्रेलिया से भारत को व्यावसायिक रूप से यूरेनियम की निर्बाध आपूर्ति का रास्ता साफ हो गया है। यह भारत की हरित ऊर्जा प्रतिबद्धताओं और कार्बन उत्सर्जन को कम करने की दिशा में एक युगांतरकारी कदम है। इसके साथ ही डिजिटल और तकनीकी क्रांति के इस युग में भारत ने ऑस्ट्रेलिया के साथ महत्वपूर्ण खनिजों—जैसे लिथियम, कोबाल्ट और निकल की सुरक्षित आपूर्ति शृंखला बनाने के लिए ठोस रणनीतिक साझेदारी की है। आज जब भारत इलेक्ट्रिक वाहनों, सेमीकंडक्टर और सौर पैनल निर्माण का वैश्विक हब बनने की ओर अग्रसर है, तब इन खनिजों पर से किसी एक देश के एकाधिकार को तोड़ना बेहद जरूरी था। 
दौरे का अंतिम और सबसे अनूठा पड़ाव न्यूज़ीलैंड रहा। ऑकलैंड में प्रधानमंत्री क्रिस्टोफ र लक्सन के साथ हुई व्यापक बैठकों के बाद दोनों देशों के संबंधों को औपचारिक रूप से रणनीतिक साझेदारी के सर्वोच्च स्तर पर अपग्रेड कर दिया गया। भारत ने स्पष्ट कर दिया कि वह प्रशांत महासागर के सुदूर कोनों में भी अपने हितों को लेकर बेहद गंभीर है।
इस यात्रा का सबसे बड़ा आर्थिक लाभ भारत-न्यूज़ीलैंड मुक्त व्यापार समझौते की वार्ताओं को मिली नई गति है। न्यूज़ीलैंड ने भारतीय सामान, विशेषकर कृषि-प्रौद्योगिकी, फार्मास्यूटिकल्स और सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं के लिए अपने बाज़ारों में पूरी तरह से शुल्क-मुक्त या रियायती पहुंच प्रदान करने के रोडमैप पर सहमति जताई है। इसके बदले में भारत न्यूज़ीलैंड की उन्नत डेयरी तकनीक, खाद्य प्रसंस्करण और महासागर अनुसंधान की विशेषज्ञता का लाभ उठा सकेगा। खेल, संस्कृति, पर्यटन और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में हस्ताक्षरित कई समझौता ज्ञापनों ने इस साझेदारी को केवल सरकारी गलियारों तक सीमित न रखकर जनता से जनता के जुड़ाव में बदल दिया है।
इस त्रिकोणीय यात्रा के भू-राजनीतिक निहितार्थ को समझे बिना इसका मूल्यांकन अधूरा रहेगा। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता और कज़र् के जाल वाली कूटनीति के बीच भारत ने इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के साथ मिल कर एक वैकल्पिक, नियम-आधारित और पारदर्शी व्यवस्था का खाका खींचा है। भारत की यह कूटनीति किसी देश के विरोध में नहीं, बल्कि समावेशी और खुले हिंद-प्रशांत के पक्ष में है। भारत ने यह संदेश दे दिया है कि वह वैश्विक मंच पर केवल एक दर्शक नहीं, बल्कि एजेंडा तय करने वाला देश है। प्रधानमंत्री मोदी को दुनिया भर से मिले 35 सर्वोच्च नागरिक सम्मान और इस दौरे के दौरान दक्षिण-पूर्वी एशिया व प्रशांत देशों में मिला अभूतपूर्व सम्मान यह दिखाता है कि भारत किस तरह वैश्विक दक्षिण की मज़बूत आवाज़ बन चुका है। भारत वैश्विक विनिर्माण और 5जी/6जी जैसी स्वदेशी प्रौद्योगिकियों के दम पर दुनिया की शीर्ष तीन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है और यह दौरा उसी संकल्प को गति देने वाला ईंधन है।
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