अनशन, असहमति और लोकतंत्र का नैतिक संकट

लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान केवल चुनाव नहीं है। चुनाव तो सत्ता बदलने का माध्यम हैं। लोकतंत्र का वास्तविक नैतिक आधार यह है कि वह असहमति को कितना सम्मान देता है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की परिपक्वता का आकलन इस बात से होता है कि वह अपने सबसे कमज़ोर, सबसे असहमत और सबसे असुविधाजनक नागरिक की आवाज़ को कितनी गंभीरता से सुनती है। जब सत्ता संवाद की बजाय मौन को चुनने लगे, तब संकट केवल किसी एक आंदोलन का नहीं रहता, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का हो जाता है। इन दिनों लद्दाख के पर्यावरणविद, अभियंता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक कई दिनों से आमरण अनशन पर हैं। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में यह केवल एक व्यक्ति का उपवास नहीं होता। यह व्यवस्था के सामने रखा गया नैतिक प्रश्न होता है। 
अनशन अपने शरीर को ही तर्क बना देने की वह परम्परा है, जिसमें हिंसा का कोई स्थान नहीं होता। महात्मा गांधी ने इसे सत्याग्रह की सर्वोच्च अभिव्यक्ति माना था। इसलिए जब कोई नागरिक इस अंतिम लोकतांत्रिक उपाय का सहारा लेता है तो यह मानकर चलता है कि सत्ता के भीतर अभी भी संवेदना का कोई कोना शेष है। प्रश्न यह है कि क्या आज भी ऐसा है?
भारत का स्वतंत्रता आंदोलन इस विश्वास पर खड़ा था कि नैतिक शक्ति अंतत: राजनीतिक शक्ति को झुकाती है। नमक सत्याग्रह, व्यक्तिगत सत्याग्रह, उपवास और अहिंसक प्रतिरोध ने ब्रिटिश साम्राज्य जैसी ताकत को भी नैतिक संकट में डाल दिया था, लेकिन स्वतंत्र भारत में विडम्बना यह है कि कई बार अपनी ही लोकतांत्रिक सरकारें शांतिपूर्ण आंदोलनों के प्रति ऐसी उदासीन दिखाई देती हैं मानो विरोध कोई नागरिक अधिकार नहीं, बल्कि प्रशासनिक असुविधा हो। आज सोनम वांगचुक का अनशन उसी परम्परा की याद दिलाता है। वह किसी राजनीतिक दल के पेशेवर नेता नहीं हैं। उन्होंने लद्दाख में शिक्षा, जल संरक्षण और पर्यावरण के क्षेत्र में जो काम किया है, उसने उन्हें अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाई। उनकी ‘आइस स्तूप’ तकनीक केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन से जूझते हिमालयी समाज के लिए आशा का मॉडल है। ऐसे व्यक्ति की आवाज़ से असहमति हो सकती है, लेकिन उसे अनसुना कर देना लोकतांत्रिक विवेक के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता। लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि सरकार हर मांग स्वीकार कर ले। लोकतंत्र का अर्थ यह है कि सरकार हर नागरिक को सुनने की ज़िम्मेदारी स्वीकार करे। संवाद, असहमति और आलोचना लोकतंत्र के शत्रु नहीं, बल्कि उसके प्राण हैं। जब संवाद की जगह मौन ले लेता है, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे केवल चुनावी प्रक्रिया बन कर रह जाता है।
जर्मन दार्शनिक हन्ना आरेंट ने लिखा था कि सत्ता की सबसे बड़ी विफलता तब होती है जब वह नागरिकों को संवाद के योग्य नहीं समझती। भारतीय संविधान भी इसी विचार पर आधारित है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा और विरोध का अधिकार इसलिए दिए गए कि राज्य निरंकुश न बन सके। यदि नागरिक का शांतिपूर्ण प्रतिरोध भी व्यवस्था तक न पहुंचे, तो संविधान की आत्मा आहत होती है।
आज प्रश्न केवल सोनम वांगचुक का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या भारत में अहिंसक प्रतिरोध अब भी लोकतांत्रिक संवाद का वैध माध्यम है, या वह केवल प्रतीक बनकर रह गया है? यदि व्यवस्था शांतिपूर्ण आवाज़ों को भी अनसुना करती रही, तो यह केवल एक आंदोलनकारी की पराजय नहीं होगी, यह लोकतंत्र की नैतिक विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह होगा।
लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट तब शुरू होता है जब सत्ता यह मान बैठती है कि चुनावी बहुमत ही नैतिक वैधता का अंतिम प्रमाण है। चुनाव सरकार बनाने का अधिकार देता है, लेकिन नागरिकों की असहमति को अनसुना करने का अधिकार नहीं देता। संविधान ने सरकार को शक्ति दी है, परन्तु उसी संविधान ने नागरिकों को प्रश्न पूछने, विरोध करने और शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का अधिकार भी दिया है। यही कारण है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनशन को केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि एक नैतिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जाता है।
यह भी ध्यान रखना होगा कि लोकतंत्र में हर आंदोलन सही हो, यह आवश्यक नहीं, लेकिन हर आंदोलन को सुनना आवश्यक है। सरकार किसी मांग से असहमत हो सकती है, उसे अस्वीकार भी कर सकती है, किंतु संवाद से इंकार लोकतांत्रिक परम्परा को कमज़ोर करता है। संवाद लोकतंत्र की कमज़ोरी नहीं, उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। (युवराज)

#अनशन
# असहमति और लोकतंत्र का नैतिक संकट