क्या भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति में कुछ बड़ा होने वाला है ?

ऐसा लगता है कि कुछ बड़ा होने वाला है। कुछ अप्रत्याशित क्योंकि पिछले कुछ दिनों से लगातार ऐसी अप्रत्याशित घटनायें हो रही हैं जिन्हें सामान्य नहीं कहा जा सकता है। वैसे तो ये सिलसिला 2024 चुनाव के बाद से शुरू हो गया था लेकिन अब इसकी ज़द में भाजपा और सरकार भी आती दिख रही है। 2024 चुनाव के बाद जिस तरह से भाजपा हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार और बंगाल जीती, उसकी उम्मीद कम से कम विपक्ष को तो नहीं थी। राहुल गांधी ने वोट चोरी के आरोप लगाये। चुनाव आयोग ने अचानक एसआईआर का ऐलान कर दिया और विपक्ष के तमाम आरोपों और दबाव के बाद भी उसने किसी की एक नहीं सुनी। पहली बार ये हुआ कि लाखों की संख्या में वोटर कटे। बंगाल में अंतिम समय में 27 लाख लोगों को तार्किक विसंगति बता कर वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया गया। ममता बनर्जी की हार चौंकाने वाली थी। उससे ज्यादा अप्रत्याशित था उनकी पूरी पार्टी का ध्वस्त होना।
अब अप्रत्याशित की लिस्ट में भाजपा भी जुड़ गई है। पहले राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी का मामला सामने आया जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। भाजपा और आरएसएस की जड़ें हिल गईं। फिर एक के बाद एक दो घोटालों के आरोप भाजपा के नेताओं पर लगे। पहले मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और उनके परिवार पर जमीन खरीदने के आरोप। फिर केंद्रीय मंत्री भगीरथ चौधरी की खुद अपने मंत्रालय से अपने लिये निन्यानवे लाख रुपये सब्सिडी के तौर पर लेने की कहानी अखबार में छप गई। उसके बाद पिछले सप्ताह केन्द्र में बेहद शक्तिशाली माने जाने वाले और अमित शाह के करीबी मंत्री भूपेन्द्र यादव के दफ्तर में दो वरिष्ठ और मंत्री के नज़दीकी अफसरों की बर्खास्तगी और दो दूसरे अफसरों की उनके पुराने कैडर में सज़ा के तौर पर वापसी ने सबको चौंका दिया। यानी लगातार ऐसी घटनाएं हुई जिनसे सरकार और भाजपा की छवि को धक्का लगा है। 
ये वही सरकार है जिसके नेता ये कहते अघाते नहीं थे कि मोदी सरकर में घोटाले नहीं होते और न ही इस्तीफे। सरकार में इस्तीफा तो नहीं हुआ लेकिन ये संदेह पुख्ता हुआ कि क्या ये सब किसी अंदरूनी कलह का परिणाम हो सकता है? कहीं एक-दूसरे को निपटाने का खेल तो नहीं चल रहा है? कहीं बिग बास कोई बड़ा संदेश तो नहीं दे रहे हैं? राम मंदिर चोरी का प्रश्न तो इतना बड़ा हो गया है कि ट्रस्ट के बाहुबली माने जाने वाले चंपत राय को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा, या ये कहा जाये कि उनसे इस्तीफा ले लिया गया लेकिन जो नुकसान होना था वो हो गया। संघ परिवार और भाजपा पर ऐसे दाग लग गये जिससे छुटकारा मुमकिन नहीं है। लोग कहने लगे हैं कि दो साल तक जो लोग राम मंदिर की सुरक्षा नहीं कर पाये, वो हिंदू समाज की सुरक्षा कैसे करेंगे? 
इसके बाद दो और चौंकाने वाली घटनाएं हुई। एक, मध्यप्रदेश के दतिया में भाजपा के बेहद वरिष्ठ और मज़बूत नेता माने जाने वाले नरोत्तम मिश्रा की विधानसभा के उपचुनाव में दावेदारी को खारिज कर दिया गया और एकदम नये नेता को टिकट दे दिया गया। नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने हाइवे जाम कर दिया, पुलिस अधिकारियों की पिटाई कर दी लेकिन पार्टी आलाकमान टस से मस नहीं हुआ। नरोत्तम को चुप होना पड़ा। ये वो नेता हैं जो कभी प्रदेश में गृहमंत्री थे और मुख्यमंत्री पद के तगड़े दावेदार माने जाते थे लेकिन पिछला विधानसभा चुनाव हार गये। अब जब उन्हें उपचुनाव में फिर से खड़ा होने का मौका मिल रहा था और वे पूरी तरह से आश्वस्त थे कि टिकट मिलेगा, तो पत्ता साफ। नरोत्तम मिश्रा की छटाई क्या पार्टी के सीनियर नेताओं को बड़ा संदेश है कि बस्ता समेटो, रिटायरमेंट का समय आ गया है? 
उसी समय पार्टी के नये नवेले अध्यक्ष को लगा कि वो कम से कम अपनी विधानसभा में तो अपने चहेते को टिकट दे सकते हैं। नितिन नवीन का मुगालता भी हवा हो गया। अंतिम समय पर पार्टी ने अध्यक्ष जी के पसंदीदा उम्मीदवार का नामांकन वापस करा कर नये उम्मीदवार को टिकट दे दिया। नितिन समझदार होंगे तो समझ गये होंगे कि भले ही वो अध्यक्ष हों पर वो हैं रबड़ स्टैंप ही या फिर वो अपने को ताकतवर न समझें। पार्टी में ताकतवर तो सिर्फ मोदी जी ही हैं। बाकी लोगों को उनका सिर्फ हुक्म बजाना होता है। 
इन सभी छह घटनाओं में कहीं न कहीं कोई एक तार जुड़ता है। ये तार ये कहता है कि पार्टी में सब कुशल नहीं है। अंदर-खाने बहुत कुछ हो रहा है या कुछ बहुत बड़ा होने जा रहा है। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री के मन में कोई बड़ी योजना है। बड़े से बड़े नेताओं को संदेश दिया जा रहा है कि अपने अपने जूतों को कस लो। अपने को बदलो नहीं तो पार्टी बदल देगी। नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना तो साफ संदेश है कि बड़बोले नेताओं के लिये भविष्य अच्छा नहीं हैं। नरोत्तम का टिकट अगर कट सकता है, तो कोई भी निपटाया जा सकता है। किसी को भी घर बैठाया जा सकता है। बांकीपुर के माध्यम से शीर्ष नेतृत्व ने ये भी संदेश दिया है कि बेहद कम उम्र में पार्टी ने अगर मौका दिया है तो फिर कसौटी पर खरा उतरना पड़ेगा। 
वैसे तो ये कहना बहुत मुश्किल है कि प्रधानमंत्री क्या सोच रहे हैं। लेकिन खबरें इशारा कर रही हैं कि भूल सुधार कार्यक्रम चलेगा, कुछ ऐसा जो पार्टी को नये सांचे में ढालेगा या ढालने की कोशिश करेगा? नितिन नवीन की नियुक्ति इसका पहला इशारा था। जब बड़े-बड़े नेताओं की दावेदारी को दरकिनार कर बिल्कुल नये अज्ञात नेता को मौका दिया गया। बारह साल किसी भी सरकार या दल में जड़ता लाने के लिये काफी होते हैं। पार्टी के लोग और मंत्री थकने लगते हैं और साथ ही अहंकार भी भर जाता है। पार्टी जब लंबे समय तक सत्ता में रहती है तो सत्ता को अपने घर की संपत्ति समझना स्वाभाविक है। नेता मनमाना बर्ताव करने लगते हैं। ये वक्त होता है बदलाव का। 
नरेन्द्र मोदी जब से पार्टी के सर्वोच्च नेता बने हैं, पार्टी को झटका देते रहे हैं। बिल्कुल अनजान से लोगों को मुख्यमंत्री बनाना उनका शुगल है। कई बड़े नेताओं का राजनीतिक कैरियर खत्म हो गया। वसुंधरा राजे सिंधिया जैसी नेता राजनीतिक परिदृश्य से गायब हो गईं। संकेत साफ है कि छोटे बदलावों से काम नहीं चलेगा। राम मंदिर का दाग आसानी से नहीं छूटेगा। भ्रष्टाचार की खबरें इशारा है कि समस्या गहरी है। निदान भी गहरा होना होगा। ‘जेनरेशनल शिफ़्ट’ क्या कोई उपचार है? क्या दिग्गजों को मार्गदर्शक मंडल में डालने का वक्त आ गया है? नये विचारों के लिये नये युवा लोगों की आवश्यकता है। पार्टी और सरकार को नया तेवर और नया स्वरूप देने की ज़रूरत है। हो सकता है प्रधानमंत्री जल्दी ही कोई धमाका करें।

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