एक नया इतिहास रचेगी देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कल 17 जुलाई, 2026 को एक और ऐसा काम करेंगे, जो ऐतिहासिक होगा। देश की सर्वप्रथम, उत्सर्जन रहित हाइड्रोजन ट्रेन को हरियाणा के जींद में हरी झंडी दिखाने का। इस ब्राड गेज पर दुनिया की सबसे लंबी हाइड्रोजन ट्रेन की पहल के साथ, भारत ब्रिटेन को परीक्षण के दौर में छोड़ जर्मनी, जापान, फ्रांस, चीन, कनाडा और अमरीका जैसे चुनिंदा देशों के समूह में शामिल ही नहीं बल्कि आगे हो जायेगा। जन साधारण के मन में बस इतना सा सवाल है कि यह ट्रेन जींद से ही क्यों? इसका किराया सस्ता होगा या महंगा? हाइड्रोजन ट्रेन की उपयोगिता, औचित्य तथा व्यवहारिकता को बहस के दायरे में लाने वालों के सवाल कुछ ज्यादा, व्यापक और जटिल हैं। 2018 में शुरू करने के बाद जर्मनी भारी परिचालन लागत और बुनियादी ढांचे की कमी के चलते अपनी हाइड्रोजन ट्रेन दो साल पहले ही वापस ले चुका है। फ्रांस भी हाथ आजमाने के बाद आगे नहीं बढ़ रहा। जापान ने 2022 में इसे शुरू किया पर विकास पर विराम है। चीन की हाइड्रोजन पैसेंजर ट्रेन टेस्ट ऑपरेशन चला रही है, पर प्रोडक्शन की रफ्तार सुस्त है। जापान ने कभी अपनी ट्रेन की लंबाई नहीं बताई जबकि भारत ने जर्मन ट्रेन से पांच गुना लंबी ट्रेन बनाई है।
सवाल यह भी कि जब ग्रिड की बिजली से सीधे बैटरी चार्ज करना, पानी से हाइड्रोजन बनाकर फिर उससे बिजली बनाने के मुकाबले दुगुना अधिक कुशल है, तो बैटरी की बजाय यह कवायद क्यों? सामान्य डीजल इंजन की लागत 20 करोड़ रुपये बैठती है, जबकि एक हाइड्रोजन ट्रेनसेट की अनुमानित लागत लगभग 80 करोड़ रुपये है और इसके ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर या रिफ्यूलिंग स्टेशन पर प्रति रूट 70 करोड़ रुपये का खर्च आयेगा। वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग दृष्टिकोण से, स्रोत से लेकर ट्रेन के पहियों तक ऊर्जा पहुंचने और उसे गति देने की पूरी प्रक्रिया में कितनी ऊर्जा बची इसे व्हील टू व्हील दक्षता कहते हैं। हाइड्रोजन ईंधन की व्हील टू व्हील दक्षता अधिकतम 35 प्रतिशत है, जबकि सस्ते विकल्प डीजल की इसके बराबर और बिजली की इससे दूनी, फिर बेहद महंगा हाइड्रोजन अपनाने की क्या तुक है। हरित हाइड्रोजन का पर्याप्त उत्पादन देश में अभी अत्यंत सीमित है। यदि इंडियन रेलवे लगभग 2,800 करोड़ की लागत से 35 हाइड्रोजन-फ्यूल वाली ट्रेनें संचालित करता है, तो वार्षिक लगभग 4,000 से 5,000 टन ग्रीन हाइड्रोजन की आवश्यकता होगी। यह कहां से आयेगा? इसका रिफ्यूलिंग स्टेशन बनाना बेहद महंगा पड़ता है। फिर इस ईंधन के लिए उच्च सुरक्षा मानकों की भी आवश्यकता होती है। इन सबकी भारी लागत का बोझ सरकार कैसे उठाएगी, जबकि रेलवे की आर्थिक हालत बहुत सुदृढ़ नहीं है। ये सभी प्रश्न अनूठी पहल की सफलता और उसके भविष्य पर शंका पैदा करते हैं पर तथ्यों, तर्कों और तकनीक के निष्कर्ष पर इनके जवाब तलाशें तो यह लगता है कि भारत सरकार की रणनीति अत्यंत ठोस और दूरगामी प्रभाव वाली है।
दूसरे देशों की असफलता और इसके महंगे होने की वजह उनकी तकनीक और रणनीति है। भारत का उद्देश्य विकसित देशों की तरह अंधाधुंध पूरी रेलवे को हाइड्रोजन पर ले जाना नहीं वरन ऐसे पहाड़ी, दुर्गम या ऐतिहासिक विरासत वाले रूट पर ट्रेन चलाना है, जहां भौगोलिक कारणों से बिजली वाली ट्रेन नहीं चला सकते और डीजल इंजनों के इस्तेमाल से पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों को नुकसान पहुंचाने की बजाये स्वच्छ शांत पर्यावरणानुकूल यात्रा सुनिश्चित करना चाहते हैं। ऐसे रूट रेल के कुल नेटवर्कसे तीन प्रतिशत से भी कम होंगे, इसलिये मात्र 35 छोटे रूट का ही प्रस्ताव है। हाइड्रोजन ट्रेन केवल उन पहाड़ी या हेरिटेज रूटों के लिए आरक्षित है जहां ट्रेनें लगातार कई घंटों तक बिना किसी ग्रिड कनेक्टिविटी के चलती हैं और जहां ऊंचाई पर बैटरी का वजन बहुत भारी हो जाता है। कुल मिलाकर सीमित परिचालन के चलते भारत का जोखिम और लागत जर्मनी वगैरह के मुकाबले बहुत कम है। परीक्षण या प्रथम परिचालन के लिये जींद से सोनीपत के 89 किलोमीटर के रूट का चयन इसलिये किया गया क्योंकि यह इतना छोटा है कि शुरुआती दौर में पायलट इसे मैनेज कर सके। साथ ही इतना लंबा है कि रेंज को स्ट्रेस-टेस्ट कर सके। जींद में 3,000 किलोग्राम हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण करने वाला प्लांट भी है, इसके अलावा आसपास इसके सहयोग हेतु अवसंरचना निर्मित की गई है।
विदेशी मॉडल को सीधे कॉपी करने के बजाये हमने अपनी ज़रूरत के मुताबिक भारी यात्री वहन क्षमता और ब्रॉड-गेज के अनुकूल तकनीक विकसित की। इसके लिए भारत ने 10-कोच वाली विशाल ब्रॉड-गेज ट्रेन तैयार की है, जिसकी यात्री वहन क्षमता और शक्ति वैश्विक मानकों से कहीं अधिक बड़ी है। 10 कोच वाली ट्रेन के शुरुआती डिज़ाइन से लेकर प्रोटोटाइप फैब्रिकेशन, हाइड्रोजन ट्रैक्शन टेक्नोलॉजी तक स्वदेशी है। जर्मनी ने एल्सटॉम से बिल्कुल नई, बेहद महंगी हाइड्रोजन ट्रेनें खरीदीं तो भारतीय रेलवे ने ‘रेट्रोफिटिंग’ मॉडल अपनाते हुए मौजूदा डीजल-इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट या डेमो ट्रेनों के इंजन और डिब्बों को पूरी तरह बदले बिना, उनमें स्वदेशी रूप से विकसित हाइड्रोजन फ्यूल सेल और बैटरी सिस्टम फिट किया। इससे नई ट्रेन खरीदने की लागत बच गई। तकनीक ऐसी कि हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन चलाने के दौरान बिजली भी बनाएगा। पूरी ट्रेन की लाइटिंग व एसी इसी से चलेगी यानी आत्मनिर्भर भारत की अनूठी मिसाल है यह परियोजना। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि यदि एक यात्रा में 90,000 का डीजल लगता है, तो हाइड्रोजन से उसी यात्रा का खर्च लगभग 25 से 30 प्रतिशत अधिक आयेगा। फिर भी सरकारी नीति के चलते यात्रियों के लिए टिकट कुछ खास महंगा नहीं होगा।
भारी लागत का बोझ रेलवे को अपने आंतरिक राजस्व से नहीं उठाना है, इसलिए इस संदर्भ में प्रश्न बेमानी है। उल्टे यह निवेश रेलवे के ‘नेट जीरो कार्बन एमिशन 2030’ के लक्ष्य का हिस्सा है, जिससे भविष्य में डीजल आयात पर होने वाले अरबों रुपये के विदेशी मुद्रा खर्च की बचत होगी। भारत के लिए यह परियोजना केवल एक नई ट्रेन नहीं, बल्कि हरित ऊर्जा, स्वदेशी प्रौद्योगिकी और भविष्य की सतत परिवहन व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग है, जिसकी वास्तविक सफलता आने वाले कुछ वर्षों के परिचालन अनुभव से तय होगी।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



