युवाओं के इस आक्रोश से सरकार और सियासत सबक ले

इितहास गवाह है कि किसी भी देश की सबसे बड़ी ताकत उसकी सेना, उसकी अर्थव्यवस्था या उसके ऊंचे-ऊंचे भवन नहीं होते। किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत उसके सपने देखने वाले युवा होते हैं। जब वही युवा सड़कों पर उतर आएं, जब उनकी आंखों में उम्मीद से ज्यादा आक्रोश दिखाई देने लगे और जब उनके हाथों में किताबों की जगह तख्तियां आ जाएं, तब समझ लेना चाहिए कि समस्या केवल किसी एक परीक्षा, किसी एक विश्वविद्यालय या किसी एक मंत्रालय की नहीं रह गई है। वह पूरे समाज की चिंता बन चुकी है।
गुजरी 20 जुलाई 2026 को दिल्ली के जंतर मंतर पर जो दृश्य दिखाई दिए, वे विरोध की एक घटनाभर नहीं थे। वे देश के करोड़ों युवाओं की मन:स्थिति का आईना थे। हजारों छात्र शिक्षा व्यवस्था में सुधार और जवाबदेही की मांग लेकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाने पहुंचे। बाद में प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा। इस घटना को लेकर अलग-अलग पक्षों ने अलग-अलग दावे किए, लेकिन एक बात निर्विवाद है देश का युवा गहरे असंतोष में है। आखिर यह गुस्सा आया कहां से? यह गुस्सा एक दिन में पैदा नहीं हुआ। यह उन वर्षों की निराशा है, जब लाखों युवाओं ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हुए अपनी जवानी दांव पर लगा दी। यह उन परिवारों की चिंता है जिन्होंने अपनी बचत बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर दी। यह उन युवाओं की पीड़ा है जिन्हें हर परीक्षा के बाद यह डर सताता है कि कहीं फिर कोई विवाद, कोई गड़बड़ी या कोई अनिश्चितता उनके सपनों को अधूरा न छोड़ दे। देश का युवा केवल नौकरी नहीं मांग रहा। वह निष्पक्ष अवसर मांग रहा है। वह ऐसी व्यवस्था चाहता है, जहां उसकी मेहनत का मूल्य हो, जहां उसका भविष्य किसी लापरवाही या अव्यवस्था का शिकार न बने।
सबसे बड़ी चिंता यह नहीं कि युवा विरोध कर रहे हैं। लोकतंत्र में विरोध स्वाभाविक है। चिंता तब होती है जब विरोध को सुनने के बजाय उसे केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मान लिया जाता है। सरकारों को याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र केवल बहुमत का नाम नहीं है। लोकतंत्र संवाद का भी नाम है। जो सरकार अपने युवाओं से संवाद खो देती है, वह धीरे-धीरे भविष्य से भी संवाद खोने लगती है। पुलिस की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। पुलिस कानून लागू करती है, लेकिन लोकतंत्र में उसका दायित्व केवल भीड़ नियंत्रित करना नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना भी है। युवाओं के प्रदर्शन को दबाने या कुचलने के लिए पुलिस ने जिस तरह का निर्दय बल प्रयोग किया, वह उसकी कोई तात्कालिक ज्यादती नहीं है। पुलिस की यह स्थाई संवेदनहीनता है जिसके लिए कोई एक या मौजूदा सरकारभर जिम्मेदार नहीं है, इसके लिए आज़ादी के बाद निर्मित हुआ देश का राजनीतिक चरित्र जिम्मेदार है। इसलिए राजधानी दिल्ली में पुलिस ने छात्रों-नौजवानों पर जिस तरह का बर्बर बल प्रयोग किया है, उसकी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। साथ ही यदि कहीं प्रदर्शन के दौरान असामाजिक तत्वों ने हिंसा की है और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है, तो उसकी भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। लोकतंत्र में कानून सब पर समान रूप से लागू होना चाहिए। इस पूरे घटनाक्रम ने मीडिया के सामने भी एक आईना रखा है। किसी भी आंदोलन को केवल राजनीतिक खेमों के चश्मे से देखने के बजाय उसके सामाजिक और शैक्षिक कारणों की गंभीर जांच आवश्यक है।
छात्रों की आवाज को केवल ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ बनाकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। मीडिया का दायित्व सत्ता से प्रश्न पूछना भी है और समाज को तथ्यपरक जानकारी देना भी। जहां तक बात देश के मध्यम वर्ग कि है तो जो मध्यम वर्ग अक्सर चुप रहता है। अपने बच्चों से कहता है- ‘मेहनत करो, सब ठीक हो जाएगा।’ लेकिन यदि मेहनत के बाद भी व्यवस्था पर भरोसा कमजोर पड़ने लगे, तो सबसे बड़ा संकट केवल युवाओं का नहीं, उस भरोसे का होता है जिस पर पूरा समाज टिका है। आज जंतर मंतर पर खड़ा छात्र किसी और का नहीं, हमारे-आपके घर का बच्चा है। उसकी चिंता को राजनीतिक चश्मे से नहीं, मानवीय दृष्टि से देखने की ज़रूरत है। केवल सत्तापक्ष ही नहीं, सभी राजनीतिक दलों के लिए भी यह घटना एक संदेश है कि युवाओं का इस्तेमाल केवल चुनावी भाषणों और रैलियों तक सीमित नहीं होना चाहिए। यदि युवा केवल वोट बैंक बनकर रह जाएंगे, तो लोकतंत्र की आत्मा मर जायेगी। देश का भविष्य नारों से नहीं, नीतियों से बनता है; भाषणों से नहीं, भरोसे से बनता है। शिक्षा मंत्री हों या पूरा शिक्षा तंत्र, उनसे प्रश्न पूछना लोकतंत्र विरोधी नहीं है। प्रश्न पूछना नागरिक का अधिकार है। साथ ही यह भी ज़रुरी है कि इन प्रश्नों के उत्तर तथ्यों, संवाद और संस्थागत प्रक्रिया के माध्यम से दिए जाएं। जवाबदेही किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था को मजबूत करने के लिए होनी चाहिए। भारत आज विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में है। यही हमारी सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन यदि यही पीढ़ी व्यवस्था से निराश होकर यह महसूस करने लगे कि उसकी आवाज सुनी नहीं जाती, तो यह केवल राजनीतिक चुनौती नहीं, राष्ट्रीय चुनौती बन जाएगी।
जंतर मंतर की घटना हमें डराने के लिए नहीं, जगाने के लिए आयी है। यह हमें याद दिलाती है कि युवा केवल आंकड़े नहीं होते, वे सपनों का दूसरा नाम होते हैं। उनके कंधों पर देश का आने वाला कल टिका होता है। यदि उन्हीं कंधों पर बार-बार निराशा का बोझ रखा जाएगा, तो राष्ट्र की गति ही धीमी नहीं पड़ेगी, उसके सपनों की अकाल मृत्यु हो जायेगी। इसलिए समय अभी भी है। सरकार संवाद का रास्ता चुने, विपक्ष जिम्मेदार राजनीति करे, मीडिया मुद्दे की गहराई तक जाए, पुलिस संवेदनशीलता और संयम बनाए रखे और समाज अपने युवाओं के साथ खड़ा हो। लोकतंत्र में असहमति को शत्रु नहीं, सुधार का अवसर माना जाना चाहिए क्योंकि किसी भी देश का भविष्य संसद की दीवारों से कम और उसके युवाओं की आंखों में ज्यादा लिखा होता है। उन आंखों में यदि उम्मीद बची रही, तो भारत का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा, लेकिन यदि वहां केवल आंसू और आक्त्रोश रह गए, तो इतिहास हम सब से कठिन प्रश्न पूछेगा।

-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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