कीमती स्रोत पानी को बचाया जाए

अभी भी 153 ब्लॉकों में से 110 में भू-जल स्तर संतोषजनक नहीं। पानी की खपत ज़्यादा है। धान की काश्त का रकबा लगातार बढ़ रहा है और सब्ज़ क्रांति से पहले के 2.27 लाख हेक्टेयर से बढ़ कर 32 लाख हेक्टेयर से पार हो गया है। इसमें चाहे 7.2 लाख हेक्टेयर रकबा बासमती की काश्त के अधीन है, जिसकी पानी की ज़रूरत धान से कम है। पीएयू विशेषज्ञों के अनुसार इसे भू-जल स्तर में सुधार नहीं कहा जा सकता। स्थिति अभी भी बहुत खतरनाक है। राज्य में पानी का स्तर अभी भी नीचे ही जा रहा है। बरनाला, मोगा, पटियाला और संगरूर आदि ज़िलों के कुछ ब्लॉकों में वर्ष 2030 तक पानी का स्तर और नीचे जाने का अनुमान है। इसमें कोई संदेह नहीं कि पंजाब केन्द्रीय चावल भंडार में प्रभावशाली योगदान दे रहा है और इसकी उत्पादकता दूसरे राज्यों से ज़्यादा है। इस कारण भारत सभी देशों में चावल का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है। 
प्रधानमंत्री की ‘गरीब कल्याण योजना’ के तहत एक बड़ी आबादी को मुफ्त अनाज दिया जा रहा है। इसमें चावल बड़ी मात्रा में शामिल हैं। भारत को आत्मनिर्भर और अनाज निर्यात करने के योग्य बनाने के लिए पंजाब का पानी इस्तेमाल किया गया है। इस कारण यह समस्या पैदा हो गई है कि इसका भविष्य में क्या होगा? राज्य का 99 प्रतिशत रकबा सिंचाई के अधीन है। इसके लिए 14.5 लाख से ज़्यादा ट्यूबवेल चलाए जा रहे हैं, जिनसे धान के लिए पानी दिया जाता है और ट्यूबवेलों के लिए बिजली मुफ्त दी जा रही है। वार्षिक रिचार्ज से ज़्यादा मात्रा में पानी का इस्तेमाल होने से भू-जल स्तर कम होना एक बड़ी समस्या बनी हुई है। पंजाब सरकार ने चाहे अधिक से अधिक खेतों को नहरी पानी उपलब्ध करने का प्रयास किया है, फिर भी यह बहुत कम रकबे पर उपलब्ध हो सका है। 
पंजाब प्रिज़र्वेशन ऑफ सब-स्वाइल वॉटर एक्ट-2009 के लागू होने से धान की अगेती बिजाई बंद होने के बावजूद और 7 लाख हेक्टेयर रकबा बासमती किस्मों की काश्त के अधीन आने के बाद भी धान की फसल के लिए सभी ट्यूबवेल निरन्तर 8 घंटे प्रतिदिन चल रहे हैं। वर्ष 1973 में पंजाब के सिर्फ तीन प्रतिशत क्षेत्र में पानी का स्तर 3 फुट से नीचे था, जो आज कई क्षेत्रों में 150 फुट तक नीचे चला गया है। सेंट्रीफ्यूगल पम्प नाकाम हो चुके हैं और अब सारी सिंचाई सबमर्सिबल पम्पों से हो रही है, जिस पर किसानों की बड़ी लागत आई है। पंजाब के कुछ हिस्सों में पानी भी दूषित है और सिंचाई के योग्य ही नहीं है। सबमर्सिबल पम्प से ज़्यादा गहरी सतह से पानी निकाल कर की गई सिंचाई ज़मीन को फिर से कलराठी बनने की तरफ ले जा रही है। इससे ज़मीन बंजर हो सकती है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि भविष्य में सिर्फ पानी का संकट ही नहीं, बल्कि बिजली संकट के भी विपरीत प्रभाव पैदा होने की सम्भावना है। गहरी सतह से पानी निकालने के लिए अधिक बिजली की ज़रूरत है। इस समय राज्य में बिजली का बहुत बड़ा हिस्सा धान की सिंचाई के लिए ज़मीन में से पानी निकालने में खर्च हो रहा है। इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए औद्योगिक क्षेत्र में बिजली की कटौती भी हो रही है। इससे रोज़गार के साधन और औद्योगिक उत्पादन प्रभावित हो रहा है। अगर स्थिति ऐसी ही रही तो भविष्य में अन्य क्षेत्रों पर भी इसके विपरीत प्रभाव पड़ने शुरू हो जाएंगे। 
पराली को जलाने से रोकने के लिए भी धान का रकबा कम करने की ज़रूरत है। सरकार द्वारा धान की काश्त का रकबा कम करने के बहुत प्रयास किए गए, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसलिए किसानों को धान की वैकल्पिक फसलों की किस्में देने की ज़रूरत है, जो धान से ज़्यादा या इसके बराबर मुनाफा दें। फिर उन फसलों की एमएसपी और सरकारी खरीद भी होनी चाहिए। किसानों को भी चाहिए कि वे पानी की बचत करें, क्योंकि यह प्रकृति का दिया हुआ अमूल्य खज़ाना है, जिसे किसी भी तरीके से स्वयं नहीं बनाया जा सकता। इसलिए घरों या खेतों में बिना वजह ट्यूबवेल नहीं चलाने चाहिएं। चाहे पंजाब में चावल की प्रति हेक्टेयर पैदावार अन्य सभी राज्यों से ज़्यादा है, लेकिन इसकी पानी की खपत शिखर पर है।
फिलहाल पंजाब कृषि विश्वविद्यालय और कृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा धान का रकबा कम करके दालों, सब्ज़ियों, फलों की काश्त के तहत लाया जाए तथा मूंगफली और बांस जैसी फसलों की काश्त बढ़ाई जाए ताकि भू-जल स्तर की स्थिति कुछ सुधारी जा सके। जो किसान धान की जगह दूसरी फसलें लगाएं, उन्हें नकद सब्सिडी देकर उन्हें प्रोत्साहन दिया जाए। डीएसआर (सीधी बिजाई) और ज़ीरो ड्रिल जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करके ज़्यादा से ज़्यादा पानी बचाने की ज़रूरत है। जब तक पानी की बचत नहीं की जाएगी, तब तक सुरक्षित उत्पादन, कृषि और खाद्य संबंधी खतरा ही रहेगा। इसलिए पानी को हर हाल पर बचाया जाना चाहिए और भू-जल स्तर में सुधार लाना ज़रूरी है।
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