झोटा हत्याकांड की जांच सी.बी.आई. के हवाले

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने परविन्दर सिंह झोटा के परिवार और एक्शन कमेटी मानसा की मांग के दृष्टिगत परविन्दर सिंह झोटा हत्या कांड की जांच सी.बी.आई. को देने की घोषणा की है। इससे सम्भव है कि अब परविन्दर सिंह झोटा के अंतिम संस्कार के लिए रुकावट दूर हो सकेगी और परिवार में इन्साफ मिलने संबंधी भी उम्मीद बढ़ सकेगी। केन्द्रीय गृत्र मंत्री अमित शाह ने भी परिवार को मिल कर इस मामले की निष्पक्ष जांच करवा कर आरोपी को कड़ी सज़ा दिलाने का आश्वासन दिया है।
नि:संदेह पंजाब इस समय अनेक समस्याओं का सामना कर रहा है। इन समस्याओं में जो इस समय सबसे बड़ी समस्या बन कर हमारे सामने आ रही है, वह है भिन्न-भिन्न तरह के नशे का प्रदेश में प्रचलन। कभी पंजाब के प्रसिद्ध कवि प्रो. पूरन सिंह ने लिखा था, ‘पंजाब जिऊंदा गुरां दे नां उत्ते’। अपनी कविता की इन पंक्तियों में उनका इशारा पंजाब की अमीर संस्कृति और स्वस्थ नैतिक मूल्यों की ओर था। ऐसे नैतिक मूल्य, जिनके धारणी बन कर पंजाबियों ने बड़ी-बड़ी चुनौतियों का सामना किया था और इतिहास में अपनी शान और रुतबे को बुलंद रखा था। गुरु साहिबान और हमारे अन्य धार्मिक रहबरों ने पंजाबियों को संतुलित जीवन जीने और नशे से दूर रहने की प्रेरणा दी थी। कुछ दशक पहले यह सोचा भी नहीं जा सकता था कि पंजाब के लोगों का एक बड़ा हिस्सा इस तरह नशों की दलदल में फंस कर मृत्यु के मार्ग पर चल पड़ेगा, परन्तु आज यह सब कुछ घटित होता हम अपनी आंखों से देख रहे हैं। 
पिछले समय में प्रदेश में बनी भिन्न-भिन्न सरकारों ने अपनी-अपनी नीतियों से नशों के प्रचलन और प्रदेश को हो रही नशे की सप्लाई को रोकने के लिए अनेक यत्न किए थे, परन्तु इस बीमारी से प्रदेश को छुटकारा न मिल सका। मौजूदा आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा भी ‘युद्ध नशों विरुद्ध’ नामक पिछले कुछ वर्षों से एक बड़ा अभियान चलाया जा रहा है। व्यापक स्तर पर नशीले पदार्थ और तस्कर पकड़े गए हैं। उन पर विभिन्न के तहत मामले भी दर्ज किए गए हैं, परन्तु इसके बावजूद प्रदेश में हो रही नशे की सप्लाई नहीं थमी और न ही इनकी खपत में कोई बड़ी कमी आई है। लगभग प्रतिदिन युवाओं के अधिक नशा करने से मरने के समाचार आते रहते हैं, जो प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति को परेशान करते हैं। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि गांवों और शहरों में जो लोग नशा तस्करों का विरोध करते हैं, उन्हें भी हमलों का सामना करना पड़ रहा है। विगत दिवस अनेक ऐसी घटनाएं घटित हुई हैं। ऐसा ही एक घटनाक्रम मानसा में 13 अक्तूबर को घटित हुआ था, जब नशे के विरुद्ध जद्दोजहद कर रहे परविन्दर सिंह झोटा की एक मैडीकल स्टोर के मालिक अश्विनी कुमार, जो नशीली गोलियां बेचने के लिए बदनाम है, से उसकी दुकान में इस मुद्दे को लेकर बहस हो गई थी। अश्विनी कुमार ने गोलियां चला कर परविन्दर सिंह झोटा की हत्या कर दी थी, और उसके कुछ साथियों को भी घायल कर दिया था।
इस घटनाक्रम ने पंजाब में व्यापक स्तर पर रोष पैदा कर दिया था। 15 अक्तूबर को मानसा में परविन्दर सिंह झोटा के परिवार को इन्स़ाफ दिलाने के लिए बनी एक्शन कमेटी के निमंत्रण पर पंजाब बंद का आह्वान दिया गया था, जिसे प्रदेश में भारी समर्थन मिला था। एक्शन कमेटी ने और परविन्दर सिंह झोटा के पिता भीम सिंह, जोकि एक पूर्व सैनिक हैं, ने परविन्दर सिंह झोटा का संस्कार करने से पहले प्रदेश सरकार के समक्ष कुछ मांगें रखी थीं और उनकी पूर्ति के बाद ही अंतिम संस्कार करने की बात की थी। एक्शन कमेटी द्वारा रखी गईं मांगों में मुख्यमंत्री और डी.जी.पी. का त्याग-पत्र, परविन्दर सिंह झोटा की हत्याकांड की सी.बी.आई. से जांच करवाने सहित कुछ अन्य मांगें शामिल थीं। पंजाब सरकार ने तीन महिला आई.ए.एस. अधिकारियों की एक समिति बना कर परिवार और एक्शन कमेटी के साथ इस मामले पर बातचीत भी की थी, परन्तु फिर भी गतिरोध खत्म नहीं हुआ था। इसके बाद परविन्दर सिंह झोटा के पिता भीम सिंह ने अपना रुख कुछ नरम करते हुए यह भी कहा था कि वह मुख्यमंत्री और डी.जी.पी. के त्याग-पत्र की मांग नहीं कर रहे, अपितु वह चाहते हैं कि इस हत्याकांड की सी.बी.आई. से जांच करवाई जाए। शायद परिवार की इस मांग के दृष्टिगत ही मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने इस हत्याकांड की जांच सी.बी.आई. को देने की घोषणा की है। यदि पंजाब सरकार द्वारा कुछ दिन पहले ही ऐसी पहलकदमी की जाती तो हो सकता था कि अब तक परविन्दर सिंह झोटा का अंतिम संस्कार हो चुका होता। फिर भी मुख्यमंत्री द्वारा की गई इस पहलकदमी को उचित दिशा में एक कदम कहा जा सकता है। सम्भव है कि सरकार के इस फैसले के पीछे केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के पंजाब दौरे का भी प्रभाव हो। गृह मंत्री अमित शाह ने मानसा में परविन्दर सिंह झोटा के परिवार के अतिरिक्त गुरदासपुर और संगरूर में भी कुछ उन परिवारों के सदस्यों से भी भेंट की है, जिनके सदस्यों को नशे की बिक्री का विरोध करने के कारण अपनी जान गंवानी पड़ी है।
नि:संदेह पंजाब में नशे का प्रचलन एक असाध्य बीमारी बन चुका है, जो पंजाब के अस्तित्व, शख्सियत को बड़ी चुनौती दे रहा है। चाहे पंजाब विधानसभा के चुनाव नज़दीक होने के कारण राजनीतिक पार्टियां इस मुद्दे को लेकर एक दूसरे के विरुद्ध बयानबाज़ी करके राजनीति करती भी दिखाई दे रही हैं, परन्तु प्रदेश के हालात यह मांग करते हैं कि सभी राजनीतिक पार्टियां, धार्मिक और सामाजिक संगठन इस संबंध में एक बड़ा लोकतांत्रिक अभियान चलाने के लिए एक मंच पर एकजुट हों और केन्द्र सरकार तथा प्रदेश सरकार भी इस महामारी को खत्म करने के लिए आपस में सहयोग करें। सरकारों की ओर से अपने फर्ज़ अदा किए जाएं, राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक संगठनों द्वारा लोगों को नशे के प्रचलन के विरुद्ध सचेत और लामबंद करने के लिए अपना फर्ज़ निभाया जाए। ऐसे सामूहिक यत्नों से ही इस घातक प्रचलन को रोकने में सफलता मिल सकती है। उम्मीद है कि आगामी समय में पंजाब अपने सामूहिक यत्नों के साथ इस बड़े संकट से ज़रूर उभर कर सामने आएगा और पंजाबी फिर से पहले की भांति अपनी विकास यात्रा को जारी रखने में समर्थ हो सकेंगे।

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