‘पोस्ट-ट्रुथ’ के साये में लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाएं
कहा जाता है कि युद्ध में अक्सर सबसे पहली बलि सच की ही चढ़ाई जाती है। अब यही बात धीरे-धीरे राजनीतिक मुकाबले पर भी लागू होती दिखाई दे रही है। आज ‘पोस्ट-ट्रुथ’ सार्वजनिक विचार-विमर्श का एक बड़ा पहलू बनता जा रहा है। ‘पोस्ट-ट्रुथ’ उस स्थिति का नाम है जिसमें सच और तथ्यों की जगह मनगढ़ंत वृत्तांत ले लेते हैं।
एक समय था जब ‘पोस्ट-ट्रुथ’ का विषय अकादमिक बहस तक ही सीमित था, लेकिन आज यह आम राजनीति का हिस्सा बनता जा रहा है। गुमराह करने वाली जानकारी और बनावटी वृत्तांत के ज़रिये न केवल जनमत को ही प्रभावित किया जा रहा है, बल्कि शक और संदेह के बीज बोकर उन संस्थाओं को भी बदनाम किया जा रहा है जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार होती हैं । ‘पोस्ट-ट्रुथ’ के प्रभाव में मनगढ़ंत बातें तब तक दोहराई जाती हैं, जब तक वे सच जैसी प्रतीत न होने लगें। ऐसे में सार्वजनिक जीवन में में सिर्फ सच कमज़ोर और धुंधला ही नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे झूठ ही सच का रूप लेने लगता है। आज जब कांग्रेस और विपक्ष के कुछ नेता जानबूझकर विवादों, गलत जानकारी और झूठे दावों के ज़रिए अराजकता का माहौल बनाने में लगे हुए हैं, तो यह साफ दिखाई देता है कि भारत का राजनीतिक विमर्श भी ‘पोस्ट-ट्रुथ’ की इस प्रवृत्ति से अछूता नहीं है। यहां यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि इस लेख का मकसद न तो विपक्ष पर आरोप लगाना है और न ही यह दावा करना है कि संवैधानिक संस्थाएं आलोचना से परे हैं। वैचारिक मतभेदों के कारण लोकतंत्र में असहमति व मतभेद होना स्वाभाविक और ज़रूरी है। लेकिन लोकतंत्र में इन सबके बीच एक ‘सामाजिक सम्पर्क’ भी होता है कि राष्ट्रीय हितों को निजी, राजनीतिक या पार्टी हितों से ऊपर रखा जाए। आज जब इस ‘सामाजिक सम्पर्क’ पर बिना वजह और धोखे से हमला हो रहा है, तो सच सामने लाना ज़रूरी है।
लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत आज कई विपक्षी पार्टियां अपनी चुनावी हार के कारणों पर आत्म-चिंतन करने के बजाय चुनावी संस्थाओं और प्रक्रियाओं पर भंडा फोड़ती दिख रही हैं। कभी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) से छेड़छाड़ के आरोप लगते हैं और बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग की जाती है, कभी ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) पर विवाद खड़ा किया जाता है, तो कभी भारतीय चुनाव आयोग की छवि को धुमिल करने की कोशिश की जाती है।
2024 में ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम भारतीय चुनाव आयोग’ केस में सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम से जुड़े सभी संदेह खत्म कर दिए थे और बैलेट पेपर के सिस्टम पर वापस लौटने की मांग खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि बिना किसी ठोस तथ्य या आंकड़ों के सिर्फ शक के आधार पर बार-बार चुनाव प्रक्रिया पर संदेह करना निंदनीय और अनुचित है। इसके बावजूद आज तक ईवीएम पर शक पैदा करने का काम बंद नहीं हुआ है। अलग-अलग सरकारों के समय में मतदाता सूची को संशोधित करने के लिए समय-समय पर एसआईआर की जाती रही है। इसके लिए कानून में पहले से ही प्रावधान हैं।
2025 में एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए एक बुनियादी शर्त मतदाता सूचियों की शुद्धता है, और एसआईआर की प्रक्रिया सीधे चुनाव की विश्वसनीयता से जुड़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि मतदाता सूची का सही होना, पूरा होना और अखंडता को सुनिश्चित करना चुनाव आयोग की संवैधानिक ज़िम्मेदारी है। लेकिन ‘पोस्ट-ट्रुथ’ के इस दौर में इस आम प्रशासनिक प्रक्रिया को भी राजनीतिक विरोध का हथियार बना कर लोगों के मन में बेवजह शक पैदा किया जा रहा है। विपक्ष के इस दुष्प्रचार अभियान के तहत न सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त को लगातार टारगेट किया जा रहा है, बल्कि चुनाव आयोग जैसी भरोसेमंद और निष्पक्ष संवैधानिक संस्था की छवि को भी नुकसान पहुंचाया जा रहा है। यह तब किया जा रहा है जब मुख्य चुनाव अयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया में खुद विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। यहां यह समझना भी ज़रूरी है कि कांग्रेस सरकारों के दौरान मुख्य चुनाव अयुक्त की नियुक्ति मनमाने तरीके से की जाती थी और इस प्रक्रिया में किसी की राय तक नहीं ली जाती थी।
संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और आज़ादी का अपमान करने का कांग्रेस का यह इतिहास बहुत व्यापक रहा है। जैसे जब देश में पहले आम चुनाव भी नहीं हुए थे, तब की मौजूदा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ एक संवैधानिक संशोधन के ज़रिए बोलने की आज़ादी पर पाबंदियां बढ़ा दीं।
इसी तरह बाद में इमरजेंसी के दौरान भी कांग्रेस सरकार ने ऐसे संवैधानिक संशोधन किए जिनसे संविधान का पूरा स्वरूप ही बदल गया। जहां एक तरफ संवैधानिक संशोधन की प्रक्रिया से लगभग सभी ‘चैक एंड बैलेंस’ हटा दिए गए, वहीं दूसरी तरफ न्यायपालिका की समीक्षा की शक्तियों पर भी बहुत-सी पाबंदियां लगा दी गईं। नागरिकों के मौलिक अधिकारों का भी पूरी तरह से हनन किया गया। उस समय सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल नीरेन डे ने सुप्रीम कोर्ट में यहां तक कहा था कि अगर कोई पुलिसवाला निजी दुश्मनी के कारण किसी बेगुनाह व्यक्ति की हत्या भी कर दे तो उस व्यक्ति का परिवार न्याय के लिए अदालत नहीं जा सकता।
कांग्रेस पार्टी ने अपनी कारगुज़ारी से बार-बार यह संदेश दिया है कि जब भी संस्थाएं उसकी मज़र्ी के मुताबिक काम नहीं करेंगी, तब वह उनकी वैधता को ही कटघरे में (संदेह के घेरे में) खड़ा कर देगी। संस्थागत मर्यादा को कमज़ोर करने के मामले में इसने कार्यपालिका और नयायपालिका के साथ-साथ संसद को भी नहीं बख्शा है। जैसे इस साल लोकसभा स्पीकर के खिलाफ सिर्फ इसलिए अविश्वास प्रस्ताव लाया गया क्योंकि उन्होंने विपक्ष के नेता से सदन में नियमों का पालन करने की अपील की थी। इसी तरह जब आर्टिकल 370 हटाया गया और सुप्रीम कोर्ट का फैसला इसके पक्ष में आया, तो कई विपक्षी पार्टियों ने फैसले और प्रक्रिया पर ही सवाल उठाने शुरू कर दिए।
कांग्रेस की ‘पोस्ट-ट्रुथ’ राजनीति का शिकार राष्ट्रीय सुरक्षा भी हुई है। राहुल गांधी ने एक बार यह गुमराह करने वाला दावा किया था कि भारत की ज़मीन पर किसी दूसरे देश ने कब्ज़ा कर लिया है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी को फटकार लगाते हुए कहा था कि एक सच्चा भारतीय ऐसा कभी नहीं कहेगा।
मतभेदों का सम्मान करना हमारी सोच का एक अहम हिस्सा रहा है। उदाहरण के लिए, जब लोगों ने संसद से पास हुए 3 कृषि कानूनों पर चिंता जताई तो हमने न सिर्फ उन चिंताओं को सुना, बल्कि लोगों के हित में कानूनों को वापस भी ले लिया। आज यह समय की ज़रूरत है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ-साथ भारत के विकास को किसी की राजनीतिक हार से पैदा होने वाली निराशा का बंधक न बनने दिया जाए।

