सचिन पायलट की सक्रियता
कांग्रेस के महासचिव जोकि पंजाब के भी प्रभारी हैं, द्वारा चाहे देर से ही सही, प्रदेश में अपनी सक्रियता बढ़ाने की कवायद शुरू कर दी गई है। 16 अक्तूबर से 20 अक्तूबर तक अपने इस दौरे में वह प्रदेश में अमन-कानून की बिगड़ती स्थिति को मुख्य रूप से उभारने के लिए उन परिवारों से भी भेंट कर रहे हैं, जो गैंगस्टरवाद का निशाना बने रहे हैं। उन्होंने अक्सर यह भी कहा है कि गैंगस्टरों और नशे के व्यापारियों का आपसी गहन रिश्ता है। नि:संदेह इन दोनों गम्भीर समस्याओं ने विगत लम्बी अवधि से लोगों के सामने बड़ी चुनौतियां पैदा किए रखी हैं। सचिन पायलट भी बार-बार अपने बयानों में इनका ज़िक्र करते हैं और प्रदेश की मौजूदा सरकार को इसके लिए आरोपी ठहराते हैं। नि:संदेह सरकारों द्वारा लगातार बड़े यत्नों के बावजूद भी इन समस्याओं को नियंत्रण में नहीं लाया जा सका।
चाहे आम आदमी पार्टी की सरकार के नेताओं ने पिछले चुनावों से पहले यह घोषणा की थी कि वह कुछ महीनों में ही नशे की बीमारी से लोगों को निजात दिलाएंगे, परन्तु ऐसा हुआ दिखाई नहीं दिया, साथ ही इस बात को भी दृष्टिविगत नहीं किया जा सकता कि यह घटनाक्रम विगत लम्बी अवधि से जारी है। पिछली सरकारों ने भी इसे नियंत्रण में करने के लिए बड़े और कड़े प्रबन्ध किए थे। तीन बार अकाली-भाजपा सरकार और दो बार कांग्रेस की सरकार ने भी इस ़खतरनाक बीमारी को खत्म करने के लिए समय तक भी निर्धारित किए थे। कैप्टन अमरेन्द्र सिंह ने तो हाथ में गुटका साहिब पकड़ कर भरी सभा में यह दावा किया था कि वह सत्ता सम्भालते ही कुछ महीनों में इस बीमारी को खत्म कर देंगे परन्तु वह इसमें सफल नहीं हुए थे। इसलिए विपक्षी पार्टियों में बैठे इन राजनीतिज्ञों को इस मामले में नैतिक तौर पर इसलिए उंगली नहीं उठानी चाहिए, क्योंकि वह स्वयं भी इस संबंध में कटघरे में खड़े दिखाई देते हैं। अन्य प्रमुख राजनीतिक पार्टियां भी विगत लम्बी अवधि से चुनाव की तैयारियां कर रही हैं और वे अपनी-अपनी नीतियां भी बना रही हैं। इन पार्टियों के ढांचे में बड़ी दरारें पड़ी भी दिखाई दे रही हैं, परन्तु विगत महीनों में जिस तरह प्रदेश कांग्रेस पार्टी की फूट सामने आई और इसके नेताओं का जिस तरह आपस में ही टकराव होता रहा, उसने इस पार्टी की अब तक की चुनाव सक्रियता को बेहद धीमा करके रखा है। अभी तक भी पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर इस तरह उलझा दिखाई देता है कि उसके पास पंजाब की सुध लेने के लिए समय ही नहीं है। दूसरी तरफ पार्टी के भीतर गुटबंदी के कारण उसे यहां के प्रभारियों को भी बदलना पड़ा है।
सचिन पायलट एक सूझवान युवा राजनीतिज्ञ हैं, जिन पर पार्टी ने अब उम्मीद रखी है। वह राजस्थान की सरकार में उप-मुख्यमंत्री भी रहे हैं। दिल्ली में कांग्रेस की सरकारों के समय उनके पिता राजेश पायलट और उनका अपना भी बोलबाला रहा है परन्तु अपने प्रदेश राजस्थान की राजनीति में वह लम्बी अवधि तक अपनी पार्टी में उठे मतभेदों में भी उलझे रहे हैं, जिनका उस समय कोई सन्तोषजनक हल नहीं निकाला गया था। अब यह सोचने वाली बात होगी कि वह पंजाब के कांग्रेसियों को आगामी चुनावों के लिए एकजुट करने में कितने सफल हो सकेंगे।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

