सुरक्षा परिषद में भारत को स्थायी सदस्यता देने पर किन्तु-परन्तु क्यों ?
सवाल संयुक्त राष्ट्र के अस्तित्व का नहीं, उसकी संरचना और कार्यप्रणाली को बदलने की राजनीतिक इच्छाशक्ति का है। भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट और स्थाई सदस्यों के समान अधिकारों का प्रबल दावेदार है, इसलिए संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था के सुधारों के प्रति वह अत्यंत मुखर है। मगर क्या भारत की चाहत और चिंता का समाधान इतना आसान है।
आठ दशकों की लंबी यात्रा पूरी कर चुका बहुपक्षीय संगठन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद आज अपनी प्रासंगिकता के चौराहे पर खड़ा है। ईरान, इज़रायल, रूस-यूक्रेन के लम्बे खिंचते संघर्षों से लेकर म्यांमार और सूडान के गृहयुद्धों तक, वैश्विक कूटनीति के हर मोर्चे पर संयुक्त राष्ट्र की सीमाएं और विफलताएं खुलकर सामने आ चुकी हैं। हालांकि इन विफलताओं से यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि इस संस्था के अब सिधार जाने का समय है। उसे समाप्त कर देना चाहिए। आवश्यकता इसे अधिक जवाबदेह और प्रभावी बनाने की है। नि:संदेह उसकी सीमाएं हैं, लेकिन उसके बिना दुनिया में विवादों के समाधान, मानवीय संकटों के प्रबंधन और छोटे देशों को अपनी बात रखने के लिए उपलब्ध साझा मंच और कमज़ोर हो जाएगा। भारत भी दुनिया के कई देशों के साथ संयुक्त राष्ट्र में सुधार का समर्थक है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर का विचार है कि संयुक्त राष्ट्र को खारिज करने के बजाय इसे दुरुस्त करने की ज़रूरत है। विदेश मंत्री इस तर्क के साथ लगातार सुधार की मांग को उठा रहे हैं कि ईरान-इज़रायल संघर्ष, रूस-यूक्रेन युद्ध, म्यांमार का गृह संघर्ष और सूडान की हिंसा ने सुरक्षा परिषद की निर्णय क्षमता की सीमाएं उजागर की हैं। इन सभी संकटों की परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन समस्या एक ही है, वह यह कि जब किसी संघर्ष में स्थायी सदस्य खुद पक्षकार हो, उसका रणनीतिक सहयोगी उसमें शामिल हो या उसके महत्वपूर्ण हित दांव पर लगे हों, तब परिषद के लिए साझा निर्णय लेना कठिन हो जाता है। वैश्विक संकट अब किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं। युद्धों के प्रभाव, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, व्यापार, वित्तीय बाज़ारों और आपूर्ति श्रृंखलाओं तक पहुंचते हैं। बहुपक्षीय संस्थाओं की कमज़ोरी का मूल्य उन देशों को भी चुकाना पड़ता है, जो सीधे संघर्ष में शामिल नहीं होते।
भारत द्वारा सुरक्षा परिषद् सुधार में हो रही देरी पर गहरा एतराज़ जायज़ है और उसका यह कहना भी कि उसके साथ जापान, जर्मनी तथा ब्राज़ील यानी जी-4 समूह मानता है कि सुधार की प्रक्रिया को कुछ देशों के संकीर्ण हितों का बंधक नहीं बनाया जाना चाहिए। उसका इशारा मुख्यत: उन देशों और समूहों की ओर है, जो वर्तमान व्यवस्था में अपने प्रभाव को सुरक्षित रखना चाहते हैं अथवा प्रतिद्वंद्वी देशों को स्थायी सदस्य बनने से रोकते हैं। दरअसल संयुक्त राष्ट्र में सुधार के साथ भारत की चाहत न सिर्फ अपने लिए स्थायी सीट सुरक्षित करना है बल्कि स्थायी सदस्यों जैसे अधिकार पाने की भी है। मौजूदा स्थायी सदस्यों की स्थाई सीटों को बढ़ाने के प्रति अनिच्छा समझी जा सकती है। इटली, कनाडा के अलावा भारत विरोधी पाकिस्तान, तुर्किए, नई स्थायी सीटों में बढ़त की बजाय अस्थायी सीटें बढ़ाने के पक्षधर हैं। तर्क है कि स्थायी सीटों की संख्या बढ़ाने के बजाय निर्वाचित सदस्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाना चाहिए क्योंकि नए स्थायी सदस्य बनने से क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता बढ़ेगी और परिषद में नए शक्ति-केंद्र बन जाएंगे। यह दलील इस आधार पर अमान्य है कि मौजूदा पांच सदस्यों के विशेषाधिकार को बनाए रखने से भी निष्पक्षता की कोई गारंटी नहीं मिलती। ऐसे में भारत का कहना ठीक है कि जब तक स्थायी श्रेणियों और ‘वैश्विक दक्षिण’ का वास्तविक विस्तार नहीं होता, तब तक पांच प्रमुख देशों के एकाधिकार और निर्णय लेने के अधिकारों में कोई मौलिक बदलाव नहीं आ सकता।
सुरक्षा परिषद की सबसे बड़ी कमज़ोरी इसकी पांच सदस्यीय स्थायी संरचना और वीटो का विशेषाधिकार है। महाशक्तियों के परस्पर विरोधी हितों के कारण सीरिया, गाज़ा या यूक्रेन जैसे मानवीय संकटों पर भी प्रभावी कार्रवाई संभव नहीं होती। वीटो देशों में आम सहमति असंभव है। अमरीका अपने रणनीतिक सहयोगियों के विरुद्ध प्रस्तावों को रोकने की ताकत छोड़ेगा नहीं। रूस और चीन भी अपने सामरिक हितों से जुड़े मामलों में इस विशेषाधिकार को महत्वपूर्ण मानते हैं। ब्रिटेन और फ्रांस वीटो पर संयम के पक्ष में पहल कर चुके हैं, लेकिन उन्होंने भी इसे समाप्त करने के लिए कोई सर्वमान्य व्यवस्था स्थापित नहीं की है। सो, वीटो समाप्त करने या उसे नए सदस्यों तक विस्तारित करने पर सहमति मुश्किल ही है। ऐसे में एक समझौतावादी विकल्प यह है कि नए स्थायी सदस्य प्रारंभिक अवधि में वीटो का इस्तेमाल नहीं करेंगे और अधिकतम 15 वर्ष बाद इस पर विचार किया जायेगा। जर्मनी ने इस अंतरिम व्यवस्था का समर्थन किया ताकि वीटो के प्रश्न पर तत्काल सहमति न बनने की स्थिति में स्थायी सदस्यता के विस्तार का रास्ता खुल सके।
जहां तक भारत की स्थायी सदस्यता के दावे का प्रश्न है, तो भले ही पाकिस्तान या तुर्किये रोड़े अटकाएं दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, उभरती आर्थिक महाशक्ति और शांति स्थापना के अंतर्राष्ट्रीय अभियानों में सबसे बड़े योगदानकर्ता के रूप में भारत का दावा मज़बूत है। भारत को यह दिखाना होगा कि वह वैश्विक हितों को सर्वोपरि रखता है, हालांकि यूक्रेन युद्ध, गाज़ा संकट तथा ईरान युद्ध के मसले पर संयुक्त राष्ट्र में जिस तरह उसकी मत भिन्नता दिखी, रूस इज़राइल और अमरीका के हितों का समर्थन कूटनीतिक स्तर पर उसे किंचित कमज़ोर कर सकता है। नि:संदेह स्थायी सदस्यता का औचित्य तभी व्यापक रूप से स्वीकार्य होगा, जब भारत राष्ट्रीय हित और साझा वैश्विक ज़िम्मेदारी के बीच संतुलन स्थापित कर सके। चीन और अन्य क्षेत्रीय प्रतिद्वंदी भारत की स्थायी सदस्यता का प्रबल विरोध के बावजूद विशाल जनसंख्या, बढ़ती अर्थव्यवस्था, लोकतांत्रिक व्यवस्था, विकासशील देशों के हितों को सामने रखने की भूमिका भारत के स्थायी सदस्यता के दावे को मज़बूत बनाती है, परन्तु भारत को बिना वीटो के अधिकार वाली स्थायी सदस्यता मिली तो वह मौजूदा स्थायी सदस्यों से कम अधिकारों वाला सदस्य बन जायेगा। इससे सुरक्षा परिषद में भारत की उपस्थिति बढ़ेगी, लेकिन निर्णयों को रोकने या अपने विरुद्ध होने वाली कार्रवाई पर प्रभाव डालने की उसकी क्षमता समान नहीं होगी। संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में संशोधन के लिए आवश्यक प्रक्रिया इतनी कठिन है कि व्यापक समर्थन के बावजूद अंतिम परिणाम सुनिश्चित नहीं है। दूसरी ओर, उसके वीटो अधिकार पर अनिश्चितकाल तक पर सहमति टलती रही तो भारत को कोई अतिरिक्त अधिकार ही नहीं मिलेगा।
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