सियांग नदी को समझे बगैर उसे बांधने की ज़िद
अरुणाचल प्रदेश की सियांग घाटी में गत 30 सितम्बर को जो हुआ, वह एक विधायक के घर में तोड़फोड़ भर की खबर नहीं है। यह उस अविश्वास का विस्फोट है जो बरसों से एक नदी और उसके किनारे बसे लोगों के मन में जमा हो रहा था। यिंगकिओंग में आंदोलनकारियों ने स्थानीय विधायक के आवास में घुसकर तोड़फोड़ की और सड़कें रोकीं। दिते दिमे के पास एक पुलिस वाहन फूंक दिया गया। इसके दो दिन पहले गेकू में ग्रामीणों और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के बीच झड़प हो चुकी थी। हिंसा किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है। पर उससे बड़ा सवाल यह है कि एक पूर्व-व्यवहार्यता सर्वे के विरुद्ध पूरा इलाका इतना बेचैन क्यों है। सियांग नदी की अविरल धार को थामने से स्थानीय आदिवासी समुदाय की आशंका, भय और अविश्वास का हल निकालने में सरकार नाकाम रही है और यह अधीरता अब हिंसा के रूप में सामने या रही है।
प्रस्तावित सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना 11,000 मेगावाट की है। इसका बांध लगभग 300 मीटर ऊंचा होगा, जो एशिया महाद्वीप में अपनी तरह का सबसे ऊंचा बताया जाता है। सरकार इसे ऊर्जा, रोज़गार और जल सुरक्षा की परियोजना कहती है। साथ ही रणनीतिक तर्क भी है : तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो पर चीन के लगभग 60,000 मेगावाट के प्रस्तावित बांध के मुकाबले भारत को अपनी स्थिति मज़बूत करनी है। मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने खुद ऊपरी इलाकों से अचानक आने वाले तेज़ बहाव और सूखे महीनों की किल्लत को इस क्षेत्र की दोहरी चुनौती बताया है। सरकार यह भी कहती है कि पीएफआर केवल प्रारंभिक तकनीकी आकलन है। पर 2017 में नीति आयोग के प्रस्ताव के बाद से सात साल बीत चुके हैं और ग्रामीणों के विरोध के कारण अब तक सर्वे भी ठीक से नहीं हो पाया है। जब सर्वे की मशीनों के साथ अर्धसैनिक बल आएं और विरोध करने वाले दो स्थानीय वकील केंद्रीय मंत्री को ज्ञापन देने से पहले गिरफ्तार कर लिए जाएं, तो ‘सिर्फ सर्वे’ का आश्वासन लोगों को खोखला लगता है।
असुरक्षा की जड़ में पहली चीज़ हिमालय की भूगर्भीय प्रकृति है। सियांग घाटी दुनिया के सबसे युवा और भूकम्प के लिहाज़ से सबसे संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में आती है। यहां चट्टानें कमज़ोर हैं, ढलान खड़ी हैं और बारिश तेज़ होती है। 1950 का असम-तिब्बत भूकम्प, जिसकी तीव्रता 8.6 के आसपास आंकी गई, इसी पट्टी में आया था। उसने पहाड़ों को दरका दिया और भूस्खलन से नदियां कई जगह रुक गईं। जब ये अवरोध टूटे तो नीचे के इलाकों में भीषण बाढ़ आई। वर्ष 2000 में तिब्बत की यिगोंग घाटी में भूस्खलन से बनी झील फटी थी और सियांग में उसकी बाढ़ आई थी। स्थानीय लोग उसे आज भी नहीं भूले हैं। जिस घाटी में प्रकृति खुद नदी को बांधती और खोलती रही हो, वहां 300 मीटर ऊंची दीवार और अरबों घन मीटर पानी का भार जोड़ना भूगर्भ विज्ञान की दृष्टि से बड़ा जुआ है। जलाशय के वज़न से भूकम्पीय गतिविधि भड़कने की आशंका को दुनिया भर के वैज्ञानिक गंभीरता से लेते हैं।
जलवायु परिवर्तन ने इस जोखिम को और बढ़ा दिया है। सियांग को पानी तिब्बत के हिमनदों और बर्फ से मिलता है, जो तेज़ी से पिघल रहे हैं। हिमनद झीलों के फटने से आने वाली अचानक बाढ़ अब हिमालय की सच्चाई है। अक्तूबर 2023 में सिक्किम में तीस्ता-3 का चुंगथांग बांध ऐसी ही बाढ़ में बह गया। बांधों की रूपरेखा बीते दशकों के जल-आंकड़ों पर बनती है जबकि आने वाले दशकों की नदी उन आंकड़ों जैसी नहीं रहेगी। इसलिए जब आंदोलनकारी स्वतंत्र भू-वैज्ञानिक, भूकम्पीय और आपदा-जोखिम आकलन मांगते हैं तो वे कोई अनुचित शर्त नहीं रखते। वे वही मांग रहे हैं जो किसी भी ज़िम्मेदार परियोजना की पहली शर्त होनी चाहिए।
दूसरी चिंता गाद की है, जो पर्यावरण की दृष्टि से शायद सबसे कम समझी गई है। ब्रह्मपुत्र दुनिया की सबसे ज्यादा गाद ढोने वाली नदियों में है और सियांग उसमें बड़ा योगदान देती है। यह गाद नदी की उपजाऊ विरासत है। असम के बाढ़ मैदान, नदी के बीच बने द्वीप, माजुली और काज़ीरंगा के घास के मैदान, सब इसी गाद पर टिके हैं। बांध इसे जलाशय में रोक लेगा। इससे जलाशय अनुमान से जल्दी भरेगा, और नीचे बहने वाला साफ पानी तटों और तलहटी को काटेगा। तटबंधों की जड़ें खोखली होंगी और खेत कटेंगे। माजुली और असम के कटाव-पीड़ित गांव इसकी कीमत पहले ही चुका रहे हैं। बांध इस संकट को घटाएगा नहीं।
तीसरा पहलू बहाव की प्रकृति है। जलविद्युत परियोजनाएं बिजली की मांग के हिसाब से पानी छोड़ती हैं, यानी शाम की ऊंची मांग में बहाव बढ़ाती हैं और रात में घटाती हैं। नदी घंटों के भीतर चढ़ती-उतरती है जो उसके प्राकृतिक चक्र से उलट है। चीन के बांध का तर्क भी ठोस जांच मांगता है। यह मान लेना कठिन है कि भारत की ओर बना जलाशय तिब्बत से आने वाले पानी को नियंत्रित करने की गारंटी देगा।

