जंतर-मंतर की खामोशी, क्यों चाहिए गूंगा लोकतंत्र ?
सरकार के नए आदेश के मुताबिक जंतर-मंतर अब धरना-प्रदर्शन का ठिकाना नहीं रहेगा। दिल्ली पुलिस ने 11 अक्तूबर के आदेश से उसे अधिसूचित प्रदर्शन स्थलों की सूची से बाहर कर दिया है और अब रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड विरोध-प्रदर्शनों के लिए निर्धारित किए गए हैं। गृह मंत्रालय की समिति की सिफारिशों पर लिया गया यह फैसला महज़ जगह बदलने का प्रशासनिक निर्णय है या असहमति को सत्ता के गलियारों से दूर रखने की राजनीतिक कोशिश? असली सवाल यही है। सरकार की दलील में सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और राजधानी के संवेदनशील इलाकों का प्रबंधन स्वाभाविक रूप से आएगा। संसद, निर्वाचन आयोग और दूसरे महत्त्वपूर्ण संस्थानों के निकट बड़े जमावड़े यातायात से लेकर सुरक्षा तक अनेक चुनौतियां पैदा कर सकते हैं लेकिन लोकतंत्र की परीक्षा तब नहीं होती जब सब कुछ शांत हो, वह तब होती है जब नागरिक सरकार से असहमत हों और अपनी बात सार्वजनिक रूप से कहना चाहें।
जंतर-मंतर कोई साधारण सड़क नहीं था। वह उन लोगों का प्रतीक बन गया था जिनकी आवाज़ संसद तक नहीं पहुंचती थी। किसान हों, बेरोज़गार युवा, कर्मचारी, सामाजिक कार्यकर्ता या चुनावी पारदर्शिता पर सवाल उठाने वाले नागरिक-यहां पहुंचकर वे देश को बताते थे कि कोई शिकायत अब भी अनसुनी है। इस जगह की अहमियत उसकी भौगोलिक स्थिति से भी थी। सत्ता के केंद्र के पास खड़े होकर सत्ता से सवाल पूछना अपने आप में एक लोकतांत्रिक संदेश है।
सरकार का पक्ष यह हो सकता है कि प्रदर्शन का अधिकार बना हुआ है, केवल उसके लिए निर्धारित स्थान बदले हैं। यह तर्क पूरी तरह निराधार नहीं है। राजधानी में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना सरकार और पुलिस की जिम्मेदारी है लेकिन सवाल यह है कि विकल्प कितने सुलभ हैं, वहां पहुंचना कितना आसान है, मीडिया की निगाह और आम लोगों का ध्यान वहां तक कितना पहुंचेगा और क्या प्रदर्शनकारी बिना अनावश्यक बाधाओं के अपनी बात रख सकेंगे? कागज़ पर तीन स्थल उपलब्ध करा देना व नागरिकों को प्रभावी विरोध का अवसर देना दो अलग बातें हैं। बुराड़ी और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड जैसे स्थलों पर प्रदर्शनकारियों को भेजने से भीड़ का केंद्रीय दिल्ली पर दबाव कम हो सकता है लेकिन विरोध की दृश्यता और उसका राजनीतिक प्रभाव भी कम हुआ तो यह फैसला प्रशासनिक सुविधा से आगे निकल जाएगा। लोकतंत्र में असहमति को नियंत्रित करने और उसे सुनने के बीच एक महीन, मगर निर्णायक अंतर है।
इतिहास भी इस बहस को पुराना बताता है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों को लेकर पर्यावरण और स्थानीय निवासियों की शिकायतें पहले भी न्यायिक मंचों तक पहुंची थीं। 2017 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने वहां गतिविधियां रोकने और प्रदर्शनकारियों को वैकल्पिक स्थल पर भेजने का निर्देश दिया था। लेकिन 2018 में मज़दूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदर्शन के अधिकार और स्थानीय निवासियों के अधिकारों के बीच संतुलन की आवश्यकता पर जोर दिया। अदालत का संदेश यह नहीं था कि प्रदर्शन हर जगह, हर समय और किसी भी शर्त पर हो, संदेश यह था कि व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर लोकतांत्रिक अधिकार को मनमाने ढंग से समाप्त नहीं किया जा सकता। अब जंतर-मंतर को अधिसूचित स्थल की सूची से हटाने के फैसले की भी इसी कसौटी पर जांच होनी चाहिए। अदालत यह देख सकती है कि निर्णय के पीछे पर्याप्त प्रशासनिक आधार है या नहीं, विकल्प वास्तव में व्यवहार्य हैं या केवल औपचारिक और प्रतिबंध नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर अनुपातहीन असर तो नहीं डालता। हालांकि अदालत क्या आदेश देगी, इसका अनुमान पहले से नहीं लगाया जा सकता।
इस फैसले की राजनीतिक टाइमिंग भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण को लेकर उठे विवाद के बीच जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाया गया है। विपक्ष और कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) जैसे आंदोलनकारी समूह इसे विरोध की आवाज़ सीमित करने वाला कदम बता रहे हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में कथित पक्षपात के आरोपों को खारिज किया है और सरकार समर्थक पक्ष ऐसे आंदोलनों को राजनीतिक दबाव की रणनीति मान सकता है। आरोपों और जवाबों के बीच तथ्यात्मक जांच का रास्ता खुला रहना चाहिए।
सीजेपी के इस कदम को केवल कानून तोड़ने की कोशिश कहकर खारिज करना उतना ही अधूरा होगा, जितना हर अवज्ञा को स्वत: लोकतांत्रिक वीरता मान लेना। यदि आंदोलनकारी निर्धारित वैकल्पिक स्थलों पर भी प्रभावी प्रदर्शन नहीं कर पाते, तो उनका आरोप मजबूत होगा कि स्थानांतरण वस्तुत: आवाज़ को सीमित करने का उपाय है। लेकिन यदि वे शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर सकें और अपनी मांगें सार्वजनिक विमर्श में रख सकें, तो सरकार की यह दलील भी परखी जा सकेगी कि उसने प्रदर्शन का अधिकार समाप्त नहीं, केवल व्यवस्थित किया है।
इस पूरे प्रकरण में सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि नए स्थलों पर अनुमति की प्रक्रिया क्या होगी, क्षमता कितनी होगी, समय और सुरक्षा के नियम क्या होंगे तथा क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए पारदर्शी और समान मानदंड अपनाए जाएंगे। विपक्ष को भी केवल राजनीतिक लाभ के लिए टकराव बढ़ाने के बजाय मतदाता सूचियों और चुनावी निष्पक्षता से जुड़े आरोपों के ठोस प्रमाण सामने रखने चाहिए।जंतर-मंतर की जगह तीन नए मैदान ले सकते हैं। लोकतंत्र में असहमति की जगह कौन लेगा? कोई मैदान नहीं। सरकारें आती-जाती हैं, प्रशासनिक आदेश बदलते हैं, मगर नागरिक का सवाल पूछने का अधिकार सत्ता की कृपा नहीं है। जंतर-मंतर को सूची से हटाना संभव है, उसे विरोध की स्मृति से मिटाना आसान नहीं। सरकार यदि इस फैसले से व्यवस्था का संदेश देना चाहती है, तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि व्यवस्था के नाम पर आवाज़ दबने का संदेश न जाए। लोकतंत्र की मजबूती विरोध की अनुपस्थिति में नहीं, बल्कि विरोध को सुनने के धैर्य में दिखाई देती है।

