अभी भी पूसा-44 को पसंद करते हैं किसान
धान की पूसा-44 किस्म जो आईसीएआर-इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीच्यूट (आईएआरआई) द्वारा विकसित की गई है, केन्द्र की फसलों की किस्मों एवं गुणवत्ता को प्रमाणिकता देने वाली समिति (सीवीआरसी) द्वारा 1994 में जारी करते समय इसकी बिजाईर् (पौध सहित) से पकने तक का समय 145 दिन बताया गया था। यह किस्म जारी होने से पहले ही पंजाब में कई स्थानों पर बोई जाती थी। इसका बीज किसानों को रखड़ा यंग फार्मर्स एसोसिएशन (वाईएफए) से प्राप्त हुआ, जहां एसोसिएशन के फार्म पर इसके परीक्षण और प्रयोग किए गए थे। यह किस्म सभी दूसरी किस्मों से अधिक उत्पादन देने के कारण कई वर्ष धान की काश्त के अधीन कुल रकबे के 70 प्रतिशत हिस्से पर बोई जाती रही है।
इसका बीज रखड़ा और करनाल आईएआरआई क्षेत्रीय केन्द्र से लेने के लिए किसानों की लंबी कतारें लगती रहीं। किसानों ने इस किस्म से 40 क्विंटल प्रति एकड़ से ज़्यादा पैदावार हासिल की है, चाहे औसत 36-38 क्विंटल प्रति एकड़ था। बिशनपुर छन्ना (पटियाला) के प्रगतिशील किसान राजमोहन सिंह कालेका ने इस किस्म का उत्पादन पंजाब में अन्य किस्मों से अधिक प्राप्त होने पर पंजाब सरकार के साथ 2018 में ‘कृषि करमण पुरस्कार’ केन्द्र से प्राप्त किया था। आज भी उन्होंने अपने कुल 30 एकड़ रकबे में से 13 एकड़ पर पूसा-44 किस्म बोई है। वह पिछले तीन-चार साल से अपना ही बीज इस्तेमाल कर रहे हैं, क्योंकि पंजाब राज्य बीज प्रमाणन अथॉरिटी द्वारा इसके बीज का प्रमाणन बंद कर दिया गया था और आईएआरआई ने भी इसका ब्रीडर बीज बनाना बंद कर दिया है। दो दशक से चावल की काश्त वाले कुल रकबे के 70 प्रतिशत भाग में काश्त की जा रही इस किस्म को अभी तक भी पीएयू से प्रमाणिकता नहीं दी। कई किसान दूसरे राज्यों से इस किस्म का बीज लाकर अभी भी काश्त कर रहे हैं, जो अपना बीज इस्तेमाल कर रहे हैं, चाहे इससे बोए गए रकबे में पैदावार कम हो गई है।
मूंडखेड़ा (पटियाला) के किसान भुपिन्दर सिंह ने पंतनगर से बीज लाकर 15 एकड़ में बोया है। वह इस किस्म की काश्त नहीं छोड़ रहे। कई किसान जैसे पवन कुमार (टोनी) हरियाणा से बीज लाकर इस किस्म की अभी भी काश्त कर रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार अभी भी धान की काश्त वाले कुल रकबे में से 15 प्रतिशत भाग में इस किस्म और इससे संबंधित किस्म जैसे पीली पूसा, डोगर पूसा आदि की काश्त होती है। किसान इस किस्म की सब किस्मों से अधिक पैदावार होने के कारण, इसका आंधी-तेज़ हवाओं से मुकाबला करने और न गिरने एवं शैलरों वाले इसका दाना सख्त होने व टोटा बहुत कम निकलने के कारण तथा चावल की वसूली अधिक होने की वजह से पसंद करते हैं।
राजमोहन सिंह कालेका जैसे प्रगतिशील किसानों और वाईएफए के सदस्य कहते हैं कि इस किस्म में इतनी खूबियां होने के बावजूद और किसानों को इतना लम्बा समय खुशहाल करने के बाद भी सरकार द्वारा इसकी काश्त क्यों बंद की जा रही है और आईएआरआई इस किस्म का ब्रीडर बीज बनाने से क्यों पीछे हट गई? इस किस्म का विकास करने वाली आईएआरआई इसके विरोध के आगे क्यों झुक गई? कालेका सहित प्रगतिशील उत्पादकों तथा अन्य किसानों का कहना है कि कुछ तत्वों का निजी तौर पर इस किस्म के फैलाव से नुकसान हो रहा था। पंजाब में अब खरीफ के मौसम में मक्के के साथ दूसरी फसल लेने का फसली-चक्र आ रहा है और इसके लिए पानी की ज़रूरत पूसा-44 से ज़्यादा है। पंजाब प्रिज़र्वेशन ऑफ सब-स्वाइल वाटर एक्ट-2009 लागू होने के बाद पूसा-44 किस्म की काश्त न तो 15 जून से पहले या पंजाब सरकार की बताई तारीख से पहले की जाती थी और न ही इसकी पानी की खपत खरीफ में उभर रहे दो फसली-चक्र से अधिक है। यह किस्म इसलिए किफायती है क्योंकि बाद में गेहूं बोने वाले किसान बिना पानी के इसकी सीलन में गेहूं की काश्त कर रहे हैं। कम समय में पकने वाली किस्मों और हाइब्रिड के दाने का ज़्यादा टोटा होने की वजह से मंडी में इन किस्मों की कीमत पूसा-44 से बहुत कम मिल रही है। कई मंडियों में इन किस्मों का दाम एमएसपी से 200 रुपये प्रति क्विंटल तक कम मिल रहा है। अब पराली की गांठ बाधने वाली मशीनों और प्लांटों वाले पराली खरीदकर ले जा रहे हैं और सरकार द्वारा मशीनरी सब्सिडी पर दी जा रही है, ताकि किसान फसल के अवशेष न जलाएं।
बरनाला, संगरूर, मोगा, लुधियाना, बठिंडा, फरीदकोट, पटियाला, फतेहगढ़ साहिब, मुक्तसर साहिब और मालवा के किसान पूसा-44 के बंद होने से बहुत निराश हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि पूसा-44 का रकबा कम होकर कुछ बासमती की काश्त के अधीन चला गया, जिससे फसली-विभिन्नता को बढ़ावा मिला है। प्रगतिशील किसानों का कहना है कि किसानों को पूसा-44 को अलविदा कहने के लिए मजबूर करना उचित नहीं है। किसान एक-दूसरे से लेकर जो पुराना बीज इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे उत्पादन में कमी आएगी।
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