लौट कर आये लोग

सपना देखने को जब एक गुनाह मान लिया गया था, और टूटे सपनों की गठरी ढोना एक बोझ, तो उन्होंने यहां से लुप्त होने में अपनी भलाई समझी थी। लुप्त होने के लिए उनके पास कई जगह थीं। आदमी से डंकी बन जाना और हर दुर्लभ एवं खतरनाक रास्ता पार करते हुए विदेश की सरहद पर चले जाओ। ऊंचे स्वर में चिल्लाओ, ‘जहांपनाह, हम अपने देश के मारे हैं, वहां हमारा आखेट करने का शौक चर्राया है, हमें अपनी शरण में लेकर हमारी जान बचाइए, हम आपके देश के निर्माण की सेवा सेंत-मेंत और रोटी-पानी से ही कर देंगे।’ खुल जा सिम-सिम की तरह दरवाज़ा खुलता है, और आप अपने देश से निकल यूं राहत की सांस लेते थे।
लेकिन कितने दिन? जो आया उस पर बंधुआ मज़दूर होने का टैग लग गया। यह साला तो बेदाम बिकता है और हमसे ड्योढ़ी मेहनत करता है, इसलिए जन्मजात बंधुआ मज़दूर है। इसके पूर्वज भी तो हमारे गुलाम थे और हमारी चाकरी अपना सौभाग्य मानते थे। अब ये आये हैं, बंधुआ मज़दूर कहलाने का अभिमान करते हुए। यहां दूसरे नहीं, चौथे दर्जे का नागरिक बन कर जीने के लिए भी तैयार हैं। वापस नहीं जाएंगे ये, क्योंकि वहां भी तो गुलामी है। मुलम्मा जड़ी गुलामी जो मुफ्त की खैरात की बलैयां लेती है, और हर बुरी औरत के भाग्य को कर्मों का फल मान कर एक दीर्घ उच्छवास के साथ अपना जीवन काट देती है अगले जन्म में बेहतर ज़िन्दगी की उम्मीद करते हुए लेकिन गरीब का या अयाचित का कोई दूसरा जन्म नहीं होता। उसे तो बस यही जीवन बार-बार इसी प्रकार जीने की सज़ा मिली है।
लेकिन विदेशी मूल का उनका अपना मज़दूर ऐसे लोगों की गिड़गिड़ाहट क्यों स्वीकार करे? यह प्रवासी यहां रहेगा तो हमारी चुपड़ी रोटी बांट हमें भी रुखी सूखी खाने पर विवश कर देगा। इसलिए इसे हथकड़ी-बेड़ी पहना कर निकालो, ताकि कहीं यहां वापस न लौट आये, लेकिन गरीबों की तो पीठ पर दांत उगे होते हैं न! वे अपनी पीठ पर एक और लात पड़ती देख कर भी हंसते हैं, गद्गद् हो कर हंसते हैं, और फिर डंकी बन कर तस्कर बन जाना अपना सौभाग्य समझते हैं।
लेकिन यहां यही तो लौटे हुए लोग नहीं। जो डिजिटल होकर भी उसका ज्ञान-विज्ञान नहीं, केवल उसका नारा या घोषणा पढ़ें। शिक्षा संस्थानों को अनुदान इस पढ़ाई का मिले, और नतीजा आत्मा के बिना खड़ी होती हुई इमारतें। ‘जो तेरी इस बज़्म से परीशां निकलेगा।’ डिजिटल ज्ञान का बैज चिपका कर, लेकिन सीख कर आये अपना जन्मजात गुण बनारसी ठगबाज़ी। लोग कहते हैं कि डिजिटल हो जाने और लोगों के साइबर हो जाने के बाद चैट पैट की बैसाखियों से ठगियों का वरदान सीख लिया। जनाब ऐसी-ऐसी मौलिक ठगियां सीखने लगे, कि चैट पैट के सुझाये मार्ग भी शरमा जाएं।
एशिया में नम्बर वन होकर रिकार्ड बनाना हमारा शौक है। अभी हमने बच्चे पैदा करने में रिकार्ड बनाया और अब ठगी करने में भी अपना रिकार्ड बनाने लगे। रिकार्ड स्तर पर साइबर ठगी कर ली हमने। अपराध तंत्र तोड़ने की बड़ी-बड़ी घोषणाओं को हमने धत्ता बताया। जी हां एक और नई घोषणा के साथ, लेकिन परनाला वहां का वहां रहा। पहले पुलिस के जी साहब के पास अपनी शिकायत की एफ.आई.आर. लिखाने का विध्यांचल लांघो। उसके बाद न अपराधी मिलेगा और न आपका खोया पैसा। लोग कहते हैं अपने देश में हास्य व्यंग्य की कमी है। लोग बस रोते बिसूरते हैं, लेकिन इन अपराधियों में तो यह कमी नहीं। पैसे आपके खोये, और आपको चिढ़ाने वाले फोन आ रहे हैं, ‘बस लगा लिया ज़ोर, अब अपने खोजी पुलिस वालों को कहो, अपना खाता संभाल कर रखें। अब उनकी बारी है। मियां की जूती अब मियां के सिर बजेगी। खाता खाली लोग, छाती पीटते लोग अब इन आवाज़ उठाते लोगों में शरीक होने आये थे।’
और इनमें शरीक होने आये थे वे ज़ीरो बैलेंस वाले जन-धन खाते जिन्होंने इन साइबरदानों को अपने खाते किराये पर दे दिये थे और आए थे वे नौजवान जो अपने हर इम्तिहान को पेपर लीक का ग्रहण लगता देखते हैं और आये थे वे भूले-बिसरे लोग जो हमेशा सोचते रहे कि लोकतंत्र में सत्ता पलटने में उनका मत पत्र बहुत बड़ी शक्ति है। अब पता चला कि एस.आई.आर. की नई सूची में उनका नाम मृतक हो गया।
 सब लौट कर आये और वक्त के हुक्मरानों से शिकायत करने चले लेकिन कैसे करें शिकायत। सड़कों पर बैरिकेड हैं, और पुलिस की कुटाई है। और आवाज़ उठाने का जो स्थान बरसों से था, उसका वजूद ही मिट गया। देश अनुशासनबद्ध है, और लौटे हुए लोग कर-बद्ध, इसलिए उन्हें दूर मैदानों के पते दिए जा रहे हैं, कि उन्हें तलाशिये, इजाज़त लीजिए, फिर शिकायत के लिए गला फाड़िये।  लेकिन ऐसी हालत में आपको शायराना हो जाने का कोई मतलब नहीं, कि कह दें कि ‘यह जुबांबन्दी है कैसी तेरी महफिल में, यहां तो बात करने को भी तरसती है जुबां मेरी।’ अजी छोड़िये ये तरस वरस की बातें। देश द्रोही और अराजक हो जाने का परिचम झेलते लोगों के लिए हमारे पास कोई तरस नहीं। 
 

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