राजनीतिक माहौल में गर्माहट

इस समय गम्भीर वोट प्रक्रिया को लेकर दिल्ली में एक घमासान मचा नज़र आता है। इसका एक कारण यह भी है कि केन्द्रीय प्रशासन द्वारा इस बार जंतर-मंतर में विरोध प्रदर्शन कर रही पार्टियों और संगठनों को इकट्ठा नहीं होने दिया गया। मैट्रो स्टेशनों का बंद होना, यातायात साधनों में बड़ी रुकावट और बड़ी संख्या में पुलिस की तैनाती ने विपक्षी पार्टियों के समर्थकों को इकट्ठा नहीं होने दिया। कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं ने भी इस मामले पर दिल्ली में इकट्ठे होकर आंदोलन करने की गुहार लगाई थी। इससे पहले कॉकरोच पार्टी ने जुलाई के महीने में जंतर-मंतर में लम्बा आंदोलन जारी रखा था। 20 जुलाई को संसद की ओर कूच करने पर बड़े झगड़े हुए थे, जिनमें आंदोलनकारी और पुलिस कर्मी घायल हुए थे। इस संबंधी अनेक तरह की याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हैं, जिनकी सुनवाई भी जारी है।
इस बार सरकार कॉकरोच जनता पार्टी को इकट्ठे होने का मौका नहीं देना चाहती थी, जिसमें वह बड़ी हद तक सफल हुए हैं। चाहे राहुल गांधी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और कुछ अन्य नेताओं को साथ लेकर दिल्ली में जो प्रदर्शन किए गए थे, उनमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाना, गहन संशोधन के अमल को रोकने की मांग और वोट चोरी रोकना शामिल था। वोट चोरी का मुद्दा पिछले लम्बे समय से राहुल गांधी का पहला राजनीतिक मुद्दा बना रहा है, जिस संबंधी उन्होंने कांग्रेस पार्टी को समय-समय पर देश में आंदोलन करने और दूसरी पार्टियों को साथ लेकर, इसके विरोध में ललकार की गुहार लगाई रखी और इलैक्ट्रॉनिक मशीनों को दोषपूर्ण साबित करने का पूरा यत्न किया, परन्तु वह इस संबंधी अब तक कोई पक्का सबूत देने में असमर्थ रहे हैं। राष्ट्रपति ने भी वोट चोरी के मामले में राहुल तथा उनके साथ मिलने गए नेताओं को कोई ठोस सबूत लिखित रूप में देने की बात कही, जो विगत लम्बे समय के शोर-शराबे के बावजूद राहुल तथा उनके साथी सुप्रीम कोर्ट या चुनाव आयोग तथा अब राष्ट्रपति को देने में विफल रहे, परन्तु ऐसा न करने की स्थिति में भी राहुल का अब तक यह राग जारी है और इस संबंध में वह महीनों तक लगातार लड़ाई जारी रखने की बात कर रहे हैं। जहां तक मुख्य चुनाव आयुक्त का संबंध है, उन पर चुनाव सुधार संबंधी प्रक्रिया को बेहद जटिल बनाने तथा इस कारण देश में करोड़ों मतदाताओं को सूचियों से बाहर निकालने संबंधी कड़ी आलोचना भी सहन करनी पड़ी है। सर्वोच्च न्यायालय भी इस संबंध में अनेक मामलों की सुनवाई कर रहा है, परन्तु जिस प्रकार विपक्षी पार्टियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने, विशेष सूचियों की प्रक्रिया को रोकने तथा इलैक्ट्रॉनिक मशीनों के ज़रिये वोट चोरी करने के आरोप लगाए हैं, उससे विपक्षी पार्टियों तथा सरकार के बीच कड़ा टकराव हो रहा है, जिसके बढ़ने की सम्भावना भी बनी हुई है। राहुल तथा उनके साथियों द्वारा चुनाव आयोग के भाजपा के साथ मिलकर हेराफेरी करने के आरोपों संबंधी दोनों पक्षों ने कड़ा रुख अपनाया हुआ है, जो देश की राजनीति को कड़े टकराव की ओर धकेलता दिखाई दे रहा है।  
हम पहले भी तथा अब भी इस बात के समर्थक रहे हैं कि ऐसे मामलों पर ठोस सबूतों तथा पुख्ता तथ्यों के आधार पर विचार किया जाना ज़रूरी है। इसलिए देश का सर्वोच्च न्यायालय ही समूचे विवरण के बाद किसी परिणाम पर पहुंच सकता है, परन्तु बन चुका ऐसा माहौल अभी सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का इंतज़ार करने से हिचकिचा भी रहा है और उसकी ओर संदेह की अंगुलियां भी उठा रहा है। नि:संदेह ऐसा टकराव लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा बना दिखाई दे रहा है, जिसका समाधान सभी पक्षों को कुछ मामलों पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके उसके फैसले का इंतज़ार करना ही कहा जा सकता है। टकराव की राजनीति जहां देश के विकास को बे्रक लगाएगी, वहीं स्थिति को और भी गम्भीर तथा बेहद जटिल बनाने में भी सहायक होगी।

    —बरजिन्दर सिंह हमदर्द 

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