पंजाब में निरन्तर पांव पसारता कैंसर रोग 

पंजाब में कैंसर जैसे नामुराद रोग का दानव एक बार फिर जैसे अनियंत्रित होने लगा है। इसका पता इस एक तथ्य से भी चल जाता है कि प्रदेश में विगत तीन वर्षों में कैंसर रोग के एक लाख 26 हज़ार नये रोगी अस्पतालों में दर्ज किये गये हैं। इस रोग का सर्वाधिक प्रभाव मालवा के ज़िलों में पाया गया है हालांकि प्रांत के अन्य ज़िलों में भी इस रोग ने अपने पैने दांत गढ़ाये हैं। स्थिति आज यह हो गई है कि मालवा का प्रत्येक क्षेत्र कैंसर के अजगर से ख़ौफज़दा है। कैंसर के उपचार के लिए मालवा से चलने वाली कई रेलगाड़ियों को कैंसर एक्सप्रैस कहा जाने लगा है। केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से पेश आंकड़ों के अनुसार यह रोग सरकार और प्रशासन के सतत् एवं निरन्तर प्रयासों के बावजूद बढ़ता गया है, किन्तु इस स्थिति ने इस रोग  के प्रति सरकार और सत्ता-व्यवस्था की ओर से किये जाते प्रयासों की सार्थकता पर भी अनेक प्रश्न-चिन्ह लगाये हैं। इंडियन कौंसिल ऑफ मेडीकल रिसर्च एवं नैशनल कैंसर रजिस्टरी कार्यक्रम के अनुसार विगत तीन वर्षों अर्थात 2023 से लेकर 2026 तक पंजाब में कैंसर के रोगियों में तीन गुणा तक वृद्धि हुई है। वर्ष 2023 में ऐसे मरीज़ों की संख्या 4,337 थी जो 2026 में 1,26,821 हो गई है। यह वृद्धि लगभग 57.6 प्रतिशत बनती है।
कैंसर मैडीकल रिसर्च की भाषा में यह एक ऐसा नामुराद रोग है जिसका उपचार भी बहुत पीड़ादायक और महंगा होता है। इस रोग के सही कारणों का वैज्ञानिक आज भी अध्ययन कर रहे हैं किन्तु खान-पान भी इसके बढ़ने के कारणों में एक हो सकता है। इस रोग के उपचार से संबंधित दवाएं बहुत महंगी भी होती हैं, और बहुत सहजता और आसानी से उपलब्ध भी नहीं होतीं। ग्रामीण इलाकों में तो ये और भी दूभर हो जाती हैं, और ग्रामीण रोगियों को इनके लिए बड़े शहरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। सरकारों द्वारा कैंसर के रोगियों हेतु उपलब्ध कराई जाती दवाओं और अन्य सहायता सामग्री के बावजूद इसका उपचार बहुत दुर्लभ, दूभर और श्रम-साध्य होता है। इस रोग में मृत्यु दर भी निरन्तर बढ़ती जाती है हालांकि निरन्तर इच्छा-शक्ति और अपनों के सहयोग से अनेक लोगों ने इस पर काबू पाकर अपनी आगामी ज़िन्दगी को जिया है। ऐसे में माना जा सकता है कि सरकारों और प्रशासन की सहायता से इस रोग का सही उपचार उपलब्ध कराके इस रोग को मात दी जा सकती है। इसके लिए यह एक बात भी बहुत ज़रूरी हो जाती है कि इस रोग के संकेतों की सही समय पर जांच कर ली जाए और फिर उसी के अनुरूप उसका उपचार भी किया जाए। जांच के उपरांत इसका पता चल जाने पर इसके उपचार की सही विधि अपनाई जानी चाहिए। इस चरण पर अस्पतालों और खासकर सरकारों का दायित्व बढ़ जाता है। ग्रामीण और निर्धन परिवारों के रोगियों के लिए सरकारी उपचार हेतु सरकारों के दरवाज़े खुलने चाहिएं।
हम समझते हैं कि लाख यत्नों और घोषणाओं के बावजूद सरकारें इस मामले में उतना आगे नहीं आ पा रहीं जितना कि उनसे अपेक्षा रहती है। कैंसर के गरीब और यहां तक कि मध्यम-वर्गीय परिवारों के रोगियों के लिए यह स्थिति बार-बार मृत्यु से दस्त-पंजा किये जाने जैसी हो जाती है। न दवाइयों की सहज प्राप्ति, न अस्पताल की सुविधा, तिस पर दूर-दराज के अस्पतालों में आवागमन की सुविधा का न होना। इन तमाम कारणों के दृष्टिगत कैंसर का रोगी मृत्यु से पूर्व मृत्यु जैसी स्थितियों से दो-चार होने लगता है। केन्द्र सरकार की आयुष्मान जैसी योजनाएं कभी-कभार गरीब रोगियों का हाथ अवश्य थामती हैं, किन्तु अधिकतर अस्पताल ऐसी योजनाओं के अन्तर्गत, उपचार करने से कन्नी कतराने लगते हैं, इसमें भी कोई दो राय नहीं।
हम समझते हैं कि नि:संदेह यह रोग नामुराद और घातक है, किन्तु आज यह लाइलाज तो कदापि नहीं रहा। सहज उपचार, सरकारी मदद और रोगी एवं उनके पारिवारिक सदस्यों की दृढ़ इच्छा-शक्ति से इस अजगर को मात दी जा सकती है। आवश्यकता एक ओर जहां सरकारी योजनाओं के तहत घोषित इलाज एवं दवाइयां उपलब्ध कराने और वित्तीय लाभ प्रदान किये जाने की है, वहीं अस्पतालों में मानवीय व्यवहार अपनाये जाने की भी बड़ी ज़रूरत है। इस संदर्भ में कैंसर को पराजित कर चुके लोगों द्वारा चलाये जाते अभियानों को प्रोत्साहन दिया जाना भी ज़रूरी है। कैंसर रोग पर काबू पाना किसी एक पक्ष की ज़िम्मेदारी नहीं। केन्द्र सरकार, प्रदेश सरकार और खासकर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग की इस मोर्चे पर समान ज़िम्मेदारी बनती है। सामाजिक स्तर पर जन-सहयोग एवं संगठनों का योगदान भी उतना ही लाज़िमी है।

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