कैंसर की दवाइयों की कीमतें कम करने के लिए पहल
केन्द्र सरकार ने कैंसर की दवाइयों को सस्ता करने के लिए एक बड़ा कदम उठाते हुए फार्मास्युटिकल कम्पनियों का लाभ 30 प्रतिशत तक सीमित करने का फैसला किया है, अभिप्राय कैंसर की दवाइयों की प्रचून बिक्री करने वाले मैडीकल स्टोर 30 प्रतिशत से अधिक लाभ नहीं ले सकेंगे। इन दवाइयों में ब्रांडेड, जेनेरिक, देसी और आयात की गईं सभी दवाइयां शामिल होंगी। सरकार द्वारा लिया गया यह फैसला इस महीने के अंत तक लागू हो सकता है। कहा जा रहा है कि इससे 110 दवाइयों की कीमतें कम होंगी, जिनमें 35 पेटेंट दवाइयां भी शामिल होंगीं। सरकार के दावे अनुसार इस कदम से दवाइयों की कीमतों में 70 प्रतिशत तक की कमी हो जाएगी।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि विगत लम्बी अवधि से लोगों द्वारा शिकायतें की जा रही थीं कि कैंसर जैसी गम्भीर बीमारी की दवाइयां, जिन्हें जीवन रक्षक दवाइयों की श्रेणी में शामिल किया जा सकता है, विभिन्न कम्पनियों और प्रचून विक्रेताओं द्वारा इन दवाइयों को बहुत ऊंची कीमतों में बेचा जाता है। इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय में भी कई बार याचिकाएं दायर की गई हैं। 29 सितम्बर को सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कड़ी टिप्पणियां की थीं। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात का भी गम्भीर संज्ञान लिया था कि फार्मास्युटिकल कम्पनियों द्वारा दवाइयों के अधिक से अधिक रेट (एम.आर.पी.) दवाइयों के पैकेट या पत्तों पर वास्तविक कीमतों से बहुत ज्यादा लिखे जाते हैं। इस कारण मरीज़ों की व्यापक स्तर पर लूट होती है। सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ, जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता शामिल थे, ने एक उदाहरण के रूप में कहा कि 2700 रुपये कीमत वाली दवाई की एम.आर.पी. 27000 रुपये तक लिखी जा रही है। उन्होंने कहा कि यह दवाई कम्पनियों की दिन-दहाड़े लूट और मरीज़ों का कत्लेआम करने वाली बात है। सर्वोच्च न्यायालय के उक्त न्यायाधीशों ने सरकार से इस मुनाफाखोरी पर प्रतिबंध लगाने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की थी और कम्पनियों को प्रचून बिक्री पर लाभ 16 प्रतिशत तक सीमित रखने का सुझाव दिया था। इसके बाद 7 अक्तूबर को सर्वोच्च न्यायालय की इसी पीठ द्वारा इस मुद्दे पर एक बार फिर से सुनवाई करते हुए केन्द्र सरकार को इस संबंध में एक विशेष समिति स्थापित करके उसके दो महीनों के निर्धारित समय में रिपोर्ट लेकर दवाई कम्पनियों की मुनाफाखोरी पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया था। उपरोक्त पीठ ने दवा कम्पनियों द्वारा डाक्टरों से मरीज़ों के लिए अपनी दवाइयां लिखवाने के लिए उन्हें तोहफे देने, नकद प्रोत्साहन देने और यात्राएं करवाने के अपनाए जाते अनैतिक तरीकों को भी रोकने की मांग की है।
चाहे केन्द्र सरकार ने यह दावा किया है कि वह लम्बी अवधि से कैंसर की दवाइयों को सस्ता करने के लिए कार्यशील थी परन्तु स्पष्ट रूप में यही कहा जाएगा कि विगत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने कैंसर की दवाइयों के मुद्दे पर मरीज़ों की होती लूट का जो गम्भीर संज्ञान लिया था, उसकी रौशनी में ही केन्द्र सरकार उपरोक्त कदम उठाने के लिए विवश हुई है। चाहे केन्द्र सरकार ने यह कदम सर्वोच्च न्यायालय में इस मुद्दे पर हो रही सुनवाई के प्रभाव अधीन ही उठाया हो, फिर भी यह सही दिशा में एक बड़ी पहल है और इस संबंध में प्रभावी नीति बनाई जानी चाहिए और इसे सख्ती से लागू भी करना चाहिए। सरकार के ऐसे यत्नों से बड़ी सीमा तक मरीज़ों को कैंसर की महंगी दवाइयों से राहत मिल सकती है।

