आज हिंसा का मूल कारण है मानसिक स्वास्थ्य संकट

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प्रत्येक व्यक्ति का स्वभाव दयालु, प्यार करने वाला, हमदर्द और आनंदमयी होता है। कोई भी बच्चा बिना वजह नहीं रोता। वे भूखे, नींद में या भयभीत होने पर रोते हैं। इसी तरह अगर कोई हिंसक है, तो उसके पीछे कोई वजह होती है। अगर किसी में हमदर्दी की कमी है, तो उसके पीछे भी कोई कारण होता है। और अगर हम सच में इसकी जड़ तक देखते हैं, तो हमें अकेलापन, डर, अस्वीकार की भावना और अपनेपन की कमी मिलेगी। जब कोई शारीरिक रूप से बीमार होता है, तो हम उसे अस्पताल भेज देते हैं। जब उसका व्यवहार बिगड़ जाता है, तो हम उसे जेल भेज देते हैं। लेकिन जेल में होने के बाद भी, हम उसे वे साधन और तकनीकें प्रदान नहीं करते जो उसे अपने व्यवहार को सुधारने और उसकी भावनाओं को समझने और बदलने के लिए ज़रूरत होती हैं।
मानसिक स्वास्थ्य संकट आज दुनिया में हो रही आधी से ज़्यादा हिंसा का मूल कारण है। मानसिक स्वास्थ्य आज दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। इसलिए प्रत्येक वर्ष 10 अक्तूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। चाहे विकासशील या विकसित देशों में, युद्धग्रस्त इलाके में या शांतिपूर्ण समाजों में—यह हम सभी को प्रभावित करता है। यह बहुत चिंता की बात है कि हर 42 सैकेंड में कोई न कोई अपनी जान ले लेता है। असंख्य युवा आक्रामक और हिंसक हो रहे हैं या अवसाद में जा रहे हैं। भारत अपनी आध्यात्मिक परम्परा के ज़रिए विश्व को इस मानसिक स्वास्थ्य संकट का समाधान करने में मदद दे रहा है। 
हमें आमतौर पर घर या स्कूल में अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना नहीं सिखाया जाता है। कई बार अकेलापन महसूस होना स्वाभावक है—दौलत, परिवार और दोस्तों के साथ भी, कोई उदास या भीतर से अकेला महसूस कर सकता है। यह अकेलापन, जो आज एक बड़े मानसिक स्वास्थ्य संकट के रूप में उभर रहा है, इसलिए है क्योंकि हमने खुद के साथ रहना और अपने भीरत शांति ढूंढना नहीं सीखा है। अगर हम यह सीखते हैं, तो हमारे अंदर की खुशी हमारे आस-पास के सभी लोगों तक फैलना शुरू हो जाएगी।
हमारी सांस एक स्वस्थ दिमाग की चाबी है। एक स्वस्थ मन की निशानियां क्या हैं? आपके चेहरे पर एक मुस्कान जो कोई आपसे छीन नहीं सकता, और अपने भीतर ऐसा विश्वास कि आप किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं। एक स्वस्थ मन वह होता है जो आलोचना स्वीकार कर सकता है और स्वस्थ एवं रचनात्मक आलोचना पेश करने की हिम्मत भी रखता है। यह निडर और विनम्र होने की योग्यता है। प्रत्येक भावना शरीर के एक खास हिस्से में खास संवेदना पैदा करती है। यह हमारे सांस लेने से भी संबंधित है। जब हम उदास होते हैं, तो हमारे सांस लेने का तरीका अलग होता है, और जब हम खुश होते हैं, तो यह अलग होता है। जब आप गुस्से में, निराश या ईष्यालु होते हैं, तो हमें अक्सर पता नहीं होता कि उन भावनाओं का क्या करना है और उन्हें अंदर ही रखना है, लेकिन यह इस तरह है जैसे आपकी सांस आपको कह रही हो :
‘मैं दिन-रात तुम्हारे अंदर आती और जाती रहती हूं। अगर तुम मुझ पर थोड़ा-सा ध्यान दोगे, तो मैं तुम्हें खुश रखूंगी, तुम्हारी आत्मा को ऊर्जावान और खुश रखूंगी और तुम्हारी ऊर्जा को जीवित रखूंगी।’ 
दुनिया भर में लाखों लोगों ने सांस लेने की सामान्य तकनीक और ध्यान को अपनाया है और उनकी ज़िन्दगी बदल गई है। उदाहरण के लिए सुदर्शन क्रिया ने बहुत-से लोगों को अवसाद और चिन्ता को दूर करने में मदद की है। यह तकनीक हमें अपने मन का मालिक बनना सिखाती है, न कि उनका गुलाम।

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