पर्दे पर ही नहीं, वास्तव में भी क्रांतिवीर थे नाना पाटेकर
‘आ गये मेरी मौत का तमाशा देखने।’ भीड़ के सामने यह कहते हुए नाना पाटेकर ने एक सवाल किया जो फिल्म ‘क्रांतिवीर’ से भी बड़ा हो गया—ये मुसलमान का खून, ये हिंदू का खून... बता इसमें मुसलमान का कौन-सा, हिंदू का कौन सा... बता? इस सीन की खास बात ये थी कि यह कभी लिखा नहीं गया था। कैमरा के सामने आते ही नाना ने बस बोलना शुरू कर दिया था। इसके वर्षों बाद उन्होंने कहा था कि उस दिन जो वह बोले थे, उसका एक शब्द भी उन्हें याद नहीं है। वह शूटिंग से पहले बीमार थे, हृदय समस्या को लेकर अस्पताल में भर्ती थे, लेकिन जब कैमरा रोल हुआ तो, प्रताप जीवित हो उठा, मोनोलॉग अपने आप मुंह से निकलने लगा। फिर स्क्रीन पर जो शेष रहा, वह हिन्दी सिनेमा की सबसे यादगार अदाकारियों में से एक है। शायद नाना पाटेकर को याद करने का सबसे अच्छा तरीका यही है। वह स्टार नहीं थे। उन्हें ‘लीजेंडरी एक्टर’ कहना भी दुरुस्त न होगा। दरअसल, वह एक ऐसे दुर्लभ एक्टर थे, जो संभवत: यह नहीं जानते थे कि किरदार कहां खत्म होता है और वह कहां शुरू हो जाते हैं। 8 अक्टूबर, 2026 की सुबह भारतीय सिनेमा ने अपनी इस दुर्लभ चमक को खो दिया।
नाना एक कार्यक्रम के सिलसिले में गोवा में थे। कार्यक्रम के बाद जब वह रात में अपने गोवा स्थित मकान में आराम कर रहे थे, तो उनके सीने में तेज़ दर्द उठा। डॉक्टरों को बुलाया गया। वह तब तक बेहोश हो चुके थे। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने लगभग 45 मिनट तक उन्हें होश में लाने का प्रयास किया। सुबह 5:20 पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। वह 75 वर्ष के थे। नाना के अंदर कुछ बहुत ही खूबसूरत छुपा हुआ था—शिक्षक, जैसा कि जावेद अख्तर ने उनके बारे में एक बार कहा था। अगर एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन का गुस्सा यह था, ‘तुम मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकते हो?’ तो नाना का गुस्सा था, ‘तुम दुनिया के साथ ऐसा कैसे कर सकते हो?’ लेकिन नाना का यह गुस्सा केवल स्क्रीन तक सीमित नहीं था बल्कि यह कहना अधिक सही होगा कि दुनिया की चिंता से भरा उनका यह गुस्सा स्क्रीन पर भी व्यक्त हो जाता था। इसलिए यह आश्चर्य नहीं है कि धर्मनिरपेक्षता उनके व्यक्तित्व का अटूट हिस्सा थी और सादगी भरा जीवन व्यतीत करने वाले नाना ने अपनी बेशतर पूंजी गरीब किसानों की मदद करने में खर्च कर दी। उन्होंने नाम फाउंडेशन की स्थापना की, 1.5 करोड़ रुपये से लक्ज़री कार खरीदने की योजना रद्द कर दी और आत्महत्या करने वाले किसानों के पीड़ित परिवारों को सीधे 15-15 हज़ार रूपये के चेक देकर मदद की। बाद में नाना ने इस राशि को बढ़ा कर 25,000 रुपये भी किया।
दरअसल, नाना जज़्बात से क्रांतिवीर थे, मंच पर नटसम्राट थे और ‘वेलकम’ शख्सियत थे, जिनके निधन से पांच दशक लम्बे करियर पर विराम लग गया है, जिसमें गंभीर अदाकारी के साथ कॉमेडी भी थी व परेशानहाल किसानों कि सेवा भी। ‘परिंदा’ का गैंग्स्टर, ‘प्रहार’ का सैनिक, ‘खामोशी’ का दिल टूटा शिक्षक, ‘अब तक छप्पन’ का निर्दयी पुलिसकर्मी, ‘राजनीति’ का नेता और ‘वेलकम’ के उदय शेट्टी को कौन भूल सकता है। नाना जहां एक पल में आपको डरा सकते थे, वहीं दूसरे पल आपको हंसा भी सकते थे। फिर अगले सीन में वह आपकी हमदर्दी भी बटोर सकते थे। यह था नाना का जादू। वह अपनी अदाकारी से आपको प्रभावित करने का प्रयास नहीं करते थे बल्कि किरदार से मुलाकात करा देते थे। सवाल यह है कि यह सब नाना में आया कैसे? एक जनवरी 1951 को मुरुड-जंजीरा (रायगढ़ ज़िला, महाराष्ट्र) में संजनाबाई व दिनकर पाटेकर के घर में जन्मे विश्वनाथ पाटेकर, जिन्हें दुनिया नाना पाटेकर के नाम से जानती है, को बचपन में ही भूख व अपमान का अर्थ मालूम हो गया था। नाना ने मात्र 13 वर्ष की आयु में ही काम करना शुरू कर दिया था। काम पर जाने के लिए रोज़ाना मीलों पैदल सफर करना और दिनभर में केवल एक बार भोजन करके जीवित रहना, ने इतना कुछ सिखाया कि ‘भूख व अपमान’ उनके दो गुरु बन गये, जैसा कि उनका खुद का कहना था।
परिवार की मदद करने के लिए वह स्कूल के बाद फिल्म पोस्टर पेंट करने लगे, एक वक्त के खाने के साथ 35 रुपये प्रति माह मिलते थे। इस संघर्ष ने उनमें सेवा व लड़ने का जज़्बा विकसित किया, जो उन्हें सिनेमा से भी आगे लेकर गया। ‘प्रहार’ (1991) जो उनके निर्देशन में बनी पहली फिल्म थी, के लिए उन्होंने टेरीटोरियल आर्मी के साथ गहन सैन्य ट्रेनिंग ली। कारगिल युद्ध (1999) के दौरान उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से जंग में हिस्सा लेने की अनुमति मांगी, यह कहते हुए कि उन्होंने कमांडो कोर्स पूर्ण किया हुआ है और उन्हें राष्ट्रीय-स्तर पर राइफल शूटर का अनुभव है। नाना ने कभी अपने सिनेमा से भी समझौता नहीं किया। तीन राष्ट्रीय पुरस्कार—‘परिंदा (1989), ‘क्रांतिवीर’ (1995) व ‘अग्निसाक्षी’ (1997), चार फिल्मफेयर पुरस्कार— ‘परिंदा’, ‘अंगार’, ‘क्रांतिवीर’ व ‘अपहरण’ और इनके अतिरिक्त 2013 में पद्मश्री मिला। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



