पाकिस्तान की गिरती दशा
आज विश्व भर के अधिकतम देश अपनी विकास दर का ध्यान रखते हैं। प्रसन्नतापूर्वक अपनी जनता को बताते हैं। पाकिस्तान एक ऐसा देश है जो विकास दर से नहीं अपनी नकारात्मकता से जाना जाता है। पाकिस्तान में महंगाई अपने उच्चतम स्तर पर है। उद्योग-धंधे की हालत खस्ता है। नागरिक अधिकार नहीं के बराबर हैं। अंदरुनी बगावत ने हालत और भी पतली कर रखी है। अंदरुनी हथियारबंद बगावतें पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के लिए दिन-ब-दिन बेहद घातक सिद्ध हो रही है। दक्षिण एशिया के आतंकवाद व सुरक्षा हालात पर नज़र रखने वाली संस्था ‘साउथ एशिया टैररिज्म पोर्टल (एस.ए.टी.पी.) के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार पाकिस्तानी सेना व सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह अंदरुनी मोर्चा साल-दर-साल अधिक खूनी तथा बेकाबू होता चला जा रहा है।
एस.टी.पी. द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ 2 वर्ष 2023 से 2025 के बीच ही सुरक्षा बलों के जानी नुकसान में 131 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। जो जानकारी उपलब्ध है, उसके अनुसार 2023 में 512 सुरक्षा कर्मी मारे गये हैं, परन्तु 2024 में ही यह संख्या 41.7 प्रतिशत बढ़कर 754 हो गई। 2025 में मौतों का आंकड़ा 63 प्रतिशत बढ़कर 1229 हो गया, जबकि अभी तक के 8 महीनों से ही 957 सुरक्षा कर्मी मारे गए। पाकिस्तानी सुरक्षा बलों का नुकसान इन दो राज्यों बलोचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में अधिक हुआ। प्रांत खैबर पख्तूनख्वा में जहां तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टी.टी.पी.) विद्रोही समूह सक्रिय है। बलोचिस्तान की बलोटा लिब्रेशन फ्रंट (बी.एल.ए.) ने पाकिस्तानी सेना की जड़े हिला कर रख दी हैं।
ऐसे में पाकिस्तान को अपने पड़ोसी देशों से संबंध सुधारने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए थी, परन्तु दु:खद है कि भारत के साथ उसका रिश्ता आरम्भ से ही शत्रुता का रहा। भारत को भी इस दुश्मनी भरी चुनौती के लिए अब तक अरबों रुपये खर्च करने पड़े हैं। पाकिस्तान जब अपना अस्तित्व ही नहीं सम्भाल पा रहा। लंबे समय तक वहां की जनता को तानाशाही फरमान झेलने पड़े हैं। आतंकवाद को बढ़ावा देना सदा पाकिस्तान की एक नीति रही है, जिस कारण भारत को तथा अन्य किसी भी देश को खतरा हो सकता है। इस बदलाव ने एक तो पाकिस्तान को विकास की डगर तक पहुंचाया ही नहीं, दूसरा पाकिस्तान ने एक स्टेट के रूप में अपना आत्म-विश्वास खोया है, जिसका खमियाजा वहां की मासूम जनता को झेलना पड़ा है। वहां अंदरुनी शांति गैर-मामूली चीज हो चुकी है। ज्यादा धन जनता के उत्थान की जगह सैन्य कार्रवाई और आतंकवादियों को पालने में खर्च होता रहा है। पाकिस्तानी तालिबान वहां इस्लामिक शरीयत वाला शासन स्थापित करना चाहते हैं। इसीलिए हालात सामान्य नहीं हो रहे। खैबर पख्तूनख्वा में अपने अड्डों के अतिरिक्त सीमा पार अफगानिस्तान में भी हमलावर कार्रवाइयों में लिप्त हैं। कभी उसका मित्र रहा अफगानिस्तान उसकी गलत नीतियों के कारण दुश्मन बन गया है।
शासन की अधिक शक्तियां मुनीर के पास चले जाने से जन-पक्षीय फैसला लेना पाकिस्तानी सरकार के लिए कठिन है ही। प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ बेचारे होकर रह गए हैं। मुनीर ने प्रशासन संबंधी शक्तियां अपने हाथ में ले ली हैं। उन्होंने फरमान जारी कर दिया कि इन चारों प्रांतों को 12 प्रशासनिक क्षेत्रों में बांटा जाए, जिससे सिंध में बड़ा बवाल छिड़ गया है। पाकिस्तानी जनता को अब एकजुट होना ही पड़ेगा।

