बासमती के अच्छे दाम से किसान संतुष्ट
धान और बासमती के उत्पादन में और बासमती के दाम में हुई वृद्धि से किसानों के चेहरों पर मुस्कुराहट आई है। चाहे आने वाली रबी सीज़न के लिए गेहूं की एमएसपी जो केन्द्र द्वारा निर्धारित की गई है, उसमें गत वर्ष के मुकाबले सिर्फ 25 रुपये प्रति क्विंटल वृद्धि करके इसे 2610 रुपये किया गया है। उत्पादन लागत को देखते हुए यह वृद्धि बहुत मामूली है, जो बढ़ रही उत्पादन लागत की बिल्कुल पूर्ति नहीं करती। इसने किसानों को निराश किया है।
पंजाब में धान-गेहूं का फसल चक्र मुख्य है। धान का बड़ा आशाजनक उत्पादन आ रहा है और जो फसल खड़ी है, वह अच्छे उत्पादन का भविष्य दर्शाती है। बासमती की पूसा बासमती-1509 किस्म 4600 रुपये प्रति क्विंटल तक बिक रही है। अब तक किसानों को 4300 से 4600 रुपये प्रति क्विंटल का दाम मिला है। पूसा बासमती-1509 का उत्पादन भी औसतन 22 क्विंटल प्रति एकड़ से ज़्यादा आ रहा है और किसानों को 1.10 लाख रुपये प्रति एकड़ की कमाई हो रही है। बासमती समेत धान 32.75 लाख हेक्टेयर से अधिक रकबे में लगाया गया है जिसमें एक अनुमान के अनुसार लगभग 6.90 लाख हेक्टेयर में बासमती की किस्में हैं। इनमें सबसे ज़्यादा रकबे पर कम समय में पकने वाली पूसा बासमती-1509 किस्म लगाई गई। विशेषज्ञों और निर्यातकों का अनुमान है कि अगले वर्ष बासमती की काश्त का रकबा और बढ़ेगा तथा फसली-विभिन्नता में बासमती अहम भूमिका निभाएगी। उत्तर प्रदेश के किसानों ने तो बासमती की ज़्यादा कीमत प्राप्त की है। वहां 15 जून से पहले धान की काश्त पर कोई पाबंदी नहीं है। उत्तर प्रदेश के किसानों ने अगेती ही अपनी फसल हरियाणा की मंडियों में लाकर अधिक दाम पर बेच दी।
पंजाब जी.आई. ज़ोन में होने के कारण यहां की मिट्टी बासमती पैदा करने के लिए ज़्यादा अनुकूल है और यहां की बासमती उपभोक्ताओं को अधिक पसंद है। 2025-26 में भारत से 50 हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा कीमत की 65.2 लाख मीट्रिक टन बासमती निर्यात की गई, जिसमें हरियाणा समेत पंजाब का योगदान 40 प्रतिशत से ज़्यादा है। इसका मध्य-पूर्व देशों को अधिक निर्यात किया गया। बासमती की घरेलू खपत भी दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। गत वर्ष भारत में 154 मिलियन टन चावल का उत्पादन हुआ था। इस वर्ष पंजाब में 180 लाख टन धान की सरकारी कीमत पर खरीद करने का लक्ष्य रखा गया है। चाहे केंद्र और पंजाब सरकार ने धान की पूसा-44 किस्म जो सभी किस्मों से अधिक उत्पादन देती है, की काश्त बंद करने के लिए इसका बीज पैदा करना बंद कर दिया है, परन्तु फिर भी किसानों द्वारा 15 प्रतिशत तक रकबे पर पूसा-44 किस्म तथा उससे संबंधित किस्मों के नाम पर बिजाई की गई है। इसके पुराने बीज का इस्तेमाल करके भी किसान पूसा-44 किस्म से अन्य सभी किस्मों से ज़्यादा उत्पादन लेने की उम्मीद रखते हैं। अभी तक पूसा-44 किस्म के बराबर उत्पादन देने वाली कोई किस्म विकसित नहीं हुई। आगामी वर्ष कम समय में पकने वाली पी.आर.-126 और हाइब्रिड किस्मों की बजाय किसानों का रुझान पूसा बासमती-1509 किस्म की ओर अधिक बढ़ रहा है। आलू आदि उगाने वाले भी पूसा बासमती-1509 की काश्त करेंगे, जिससे उन्हें अधिक लाभ होगा।
सरकार द्वारा पराली को ज़मीन में दबाकर उपजाऊ शक्ति बढ़ाने और अवशेष जलाने की प्रथा को बंद करने के लिए मशीनरी सब्सिडी पर देकर यत्न किए जा रहे हैं, लेकिन फिर भी कुछ अगेती पकने वाली फसल के उत्पादक अमृतसर, तरनतारन आदि ज़िलों में अवशेष को आग लगा रहे हैं, जिससे प्रदूषण पैदा होने के अलाव ज़मीन की उपजाऊ शक्ति कम होती है। चाहे रिपोर्टें यह दर्शाती हैं कि दिल्ली में धुएं की वजह पंजाब में धान के अवशेष जलाना नहीं है, परन्तु फिर भी केंद्र सरकार पराली जलाने के रूझान को रोकने के लिए मशीनरी सब्सिडी देकर पंजाब सरकार को खुलकर मदद दे रही है।
लंबे समय में पकने वाली पूसा बासमती-1121 किस्म उपभोक्ताओं की बहुत पसंदीदा रही है और बड़े पैमाने पर निर्यात की जाती थी। अब इसकी जगह पूसा बासमती-1509 ने ले ली है, जो पकने में कम समय लेती है और सभी किस्मों से ज़्यादा निर्यात की जाती है। आईसीएआर-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) डॉ. विश्वनाथन सी. के अनुसार पूसा में बासमती और धान की किस्मों पर अनुसंधान तेज़ी से किया जा रहा है और अधिक लाभकारी, विकसित किस्में अधिसूचना के बाद जल्द ही किसानों तक पहुंचने की संभावना है, जिससे उनकी आय बढ़ेगी।

