मुश्किल समय में से गुज़र रहे हैं चुनाव आयोग और सरकार
संड़कों पर हंगामा है। पुलिस और सरकार परेशान है। ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर जद्दोजहद है। दोनों तरफ से रस्साकसी है। बीच का रास्ता फिलहाल बंद है। सुलह होगी इसकी संभावना काफी कम दिखती है। हालात ऐसे बन गये हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त को देर सबेर जाना ही पड़ेगा, या फिर सरकार को देश पर तानाशाही लगानी पड़ेगी। अगर ऐसा हुआ तो मोदी सरकार के लिये बचना नामुमकिन हो जायेगा। भारत के इतिहास में ये पल क्रांतिकारी हैं। मुझे नहीं मालूम कि क्रांति होगी या नहीं लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि ये वक्त सरकार और आयोग दोनों के लिये भारी है। सिर्फ एक ही रास्ता है- ज्ञानेश कुमार अपना पद छोड़ें। दूर-दूर तक ये बात फैल गई है कि चुनाव आयोग के जरिये चुनावी प्रक्रिया को मोदी सरकार अपने पक्ष में कर रही थी। हालांकि, इस आरोप में कितना दम है, ये तो जांच के बाद ही पता चलेगा।
भारत के इतिहास में बैलेट पेपर लूटे गये हैं। चुनाव में हत्याएं कराई गई हैं। कमजोर तबके को वोट देने नहीं दिया गया है लेकिन ऐसा पहली बार हो रहा है कि पूरी चुनावी प्रक्रिया ही संदेह के घेरे में आ गई है। आरोप ये लग रहे हैं कि हरियाणा का हो या फिर महाराष्ट्र का, बिहार का हो या फिर बंगाल का, चुनावों को लूटा गया है। और आयोग ने इस खेल में भाजपा की मदद की है। विपक्ष के वोटों को काटा गया है और भाजपा के समर्थक वोटों को बढ़ाया गया है। लोकतंत्र में अगर चुनाव ही संदिग्ध हो गये तो फिर लोकतंत्र का क्या मतलब? लिहाजा जो आवाज़ें सड़कों से आ रही हैं वो लोकतंत्र को बचाने के लिये हैं, ये एक जुनून का नाम है। ऐसे में ये दुआ ज़रूर की जानी चाहिये कि सड़क और सत्ता की लड़ाई में सड़क की जीत हो ताकि भारत के लोकतंत्र पर जो दाग लगे हैं वो मिट जाये, जो घटाघोप अंधेरा छाया हुआ है वो दूर हो। एक बार फिर नये सिरे से लोकतंत्र का सूरज चमके।
2014 के बाद से भारत के लोकतंत्र को लूटने की कोशिश की जा रही है, ऐसा लोग मानते हैं। धीरे-धीरे विरोध की आवाजों को दबाया गया। असहमति को देशद्रोह की संज्ञा दी गई। मीडिया को पूरी तरह से पंगु कर दिया गया है। न्यायपालिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गये हैं। जनता का भरोसा मुख्य न्यायाधीश समेत जजों पर कम हुआ है। जब न्यायपालिका का ये हाल है तो बाकी के संस्थानों के बारे में क्या कहे? 2014 के पहले कैग हो या फिर दूसरे संस्थान, वो सरकार के खिलाफ अपनी रिपोर्ट दिया करते थे। कोयला घोटाला हो या फिर टेलीकॉम स्कैम, इतने बड़े मुद्दे इसलिये बने क्योंकि कैग ने अपनी रिपोर्ट में मनमोहन सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया था और रिपोर्ट की आड़ में मीडिया ने सरकार की वो छवि बना दी थी कि प्रधानमंत्री मनमनोहन सिंह को कहना पड़ा था कि ‘इतिहास उनका आंकलन ज्यादा उदारता से करेगा’। ये वो जमाना था जब टीवी एंकर रोज मनमोहन सिंह का बेधड़क इस्तीफा मांगते थे और उनकी नौकरी को कोई खतरा नहीं था। जिस भी मंत्री पर आरोप लगे, उसे देर सबेर अपना पद छोड़ना पड़ा। दिलचस्प बात ये है कि मोदी सरकार आने के बाद भी मनमोहन सरकार के ऊपर लगा एक भी आरोप सच साबित नहीं हुआ। टेलीकाम हो या फिर कोयला घोटाला, सभी आरोपी बाइज्ज़त बरी हो गये। अब ये कहना मुश्किल है कि कैग की रिपोर्ट में लगे आरोप किसी बड़ी साजिश का हिस्सा थे लेकिन किसी ने ये आरोप नहीं लगाया कि मीडिया हो या दूसरे संस्थान, उनको मनमोहन सिंह के समय बंधक बना लिया गया था। मीडिया आजाद था और चुनावों की साख और आयोग की ईमानदारी पर किसी को कोई शक नहीं था।
आज भाजपा विपक्ष पर ये आरोप लगाती है कि वो संवैधानिक संस्थानों की साख पर बट्टा लगा रही है, उनको कमजोर कर रही है। देश दुनिया में भारत की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा है लेकिन 2014 के पहले जब भाजपा विपक्ष में थी तो उसके आरोपों पर तब की सरकार और सत्ताधारी पार्टी ने ये नहीं कहा था कि भारत के लोकतंत्र को खोखला किया जा रहा है, या फिर किसी विदेशी साजिश का हिस्सा है। ये महज इत्तेफाक नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश के खिलाफ चार सबसे वरिष्ठ जजों ने प्रेस कांफ्रैंस कर के लोकतंत्र पर खतरे की बात की थी। ऐसा पहले कभी भी भारत के इतिहास में नहीं हुआ था। ये भी पहली बार हुआ कि चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों के हवाले से एक अखबार ने खबर छापी कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार मनमाने फैसले कर रहे हैं और चुनाव में धांधली की जा रही है। ये आवाज़ें संवैधानिक संस्थाओं के अंदर से आयी थीं। इसका अर्थ साफ था कि संस्थाओं को जब अंदर से हाईजैक कर लिया गया और पानी नाक के ऊपर बहने लगा तो संस्था ने ही बगावत कर दी। हालांकि ये भी सच है कि जजों की प्रेस कांफ्रैंस के बाद भी न्यायपालिका की हालत सुधरी नहीं, उल्टे ऐसे ऐसे फैसले हुए कि सुप्रीम कोर्ट की साख रसातल में चली गई।
कॉकरोच जनता पार्टी का गठन दरअसल सुप्रीम कोर्ट के विरुद्ध जनविद्रोह का ऐलान था। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने जब बेरोज़गार युवाओं को कॉकरोच और परजीवी कहा तो बच्चों के सब्र का बांध टूटा और जंतर मंतर पर जो सैलाब आया उसने मोदी सरकार की जड़ें हिला दीं। अब वही सैलाब फिर सड़कों पर मचलने को बेताब है और सरकार फिर वहीं, गलती दोहरा रही है। सवाल ये है कि क्या इतिहास खुद को दोहरायेगा?
भारत के लोकतंत्र के लिये ये उचित है कि सड़क और सरकार के बीच के हर संघर्ष में सड़क की जीत हो। सरकार की हार भारत के संविधान के मुताबिक सरकार को या फिर किसी भी नेता को तानाशाह बनने से रोकती है। पूरे सिस्टम को जनता के प्रति जवाबदेह बनाती है। इंदिरा गांधी को एक समय ये म़ुगालता हो गया था कि वो सर्वशक्तिमान हैं और कोई उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। जनता सड़कों पर उतरी, तो देश में आपातकाल लागू कर दिया गया लेकिन चुनाव में जनता ने बदला ले लिया और इंदिरा गांधी अपना चुनाव तक हार गई। ये सड़क की जीत थी लेकिन जब जनता को लगने लगा कि जनता पार्टी की सरकार बदले की राजनीति कर रही है तो 1980 में जनता ने उन्हें भी धूल चटा दी। सड़क ने फिर उन्हीं इंदिरा पर भरोसा जताया जिसे वो कुछ साल पहले रुखसती का रास्ता दिखा चुकी थी। भाजपा को भारतीय लोकतंत्र के इस सच से परिचित होना चाहिये क्योंकि उसने जनता पार्टी के प्रयोग को अपनी आंखों के सामने असफल होते देखा था। उसे अपने अनुभव से मालूम होना चाहिये कि लोकतंत्र में तानाशाही के लिये जगह नहीं है। जनता भले ही सत्ता के सूत्र किसी नेता या दल को दे दे लेकिन वो उसे तानाशाही की छूट नहीं देती। वो उससे जवाबदेही की उम्मीद रखती है और जब जवाबदेही का रिश्ता टूटता है तो फिर सड़क को फिर से ज़िंदा होना पड़ता है।



