चुनाव आयोग पर उठते सवाल
एक बार फिर भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के त्याग-पत्र की मांग ज़ोर से उठी है। दिल्ली और मुम्बई में विशेष रूप से भारी जनसमूह हुए हैं। जिनमें कई राजनीतिक पार्टियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्र संगठनों ने भाग लिया। इन रोष प्रदर्शनों में यह भी चेतावनी दी गई है कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त ने त्याग-पत्र न दिया तो इसके विरुद्ध आंदोलन को और भी तेज़ किया जाएगा। जिस समय से केन्द्रीय चुनाव आयोग द्वारा मतों के पुनरीक्षण का कार्य शुरू किया गया है, उसी समय से यह प्रक्रिया अनेक विवादों में घिरी रही है। दो दशकों के बाद मतदाता सूची के पुनरीक्षण का किया जाना स्वयं में ही त्रुटि भरपूर प्रक्रिया है, क्योंकि इसे लगातार निर्धारित समय में ही किया जाना चाहिए।
देश में 90 करोड़ से अधिक मतदाताओं की सही विवरण तैयार करना स्वयं में बहुत विशाल कार्य है। लाखों ही मतदाताओं का जगह बदल लेना, लाखों का इस समय में निधन हो जाना, भारी संख्या में दोहरे मतदाता बनना एक बेहद उलझी प्रक्रिया है। चुनाव आयोग के इस संशोधन में बड़ी कमी यह खटकती रही है कि उनकी ओर से इस प्रक्रिया को बेहद कठिन और जटिल बना दिया गया, जबकि इसका पारदर्शी और आसान बनाया जाना बेहद ज़रूरी था, इसकी जटिलताओं में जन-साधारण भी एक तरह से उलझ कर रह गया है। काटे गए या दर्ज किए गए बहुत-से मतदाताओं की संख्या इतनी बड़ी है, जो अनेक आशंकाओं के साथ-साथ उलझनों की ओर भी इशारा करती है। इस संशोधन में लगभग 13 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से बाहर निकाल दिए गए हैं। विवरण के अनुसार 2.8 करोड़ मतदाता मृतक पाए गए। 6.3 करोड़ जगह बदल गए, लगभग 3 करोड़ ़गैर-हाज़िर बताए गए। एक करोड़ मतदाता डुप्लीकेट, जिनका दो जगहों पर वोट बना था, दर्शाए गए हैं। जो बड़ी संख्या में स्थान बदल गए उनके दूसरे स्थान पर वोट बने हैं या नहीं यह निर्धारित करना भी एक उलझन भरा मामला है। इस संबंध में समय-समय पर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी आदेश दिए हैं।
विगत दिवस केन्द्रीय चुनाव आयोग के सदस्यों के आपसी मतभेद उजागर होने के कारण इस मामले ने और भी अधिक तूल पकड़ लिया है। चाहे चारों ओर से दबाव के कारण अब चुनाव आयोग द्वारा अपने राज्य के चुनाव अधिकारियों को यह निर्देश दिए गए हैं कि वह रह गए (छोड़े गए) और नए मतदाताओं को शामिल करने के लिए शीघ्र उनके क्षेत्रों में काम शुरू करें जहां मतदाता सूची के पुनरीक्षण का कार्य पूरा हो चुका है। इस पूरे समय में चुनाव आयोग का प्रभाव पक्षपात और भेदभाव वाला बना रहा है। इसमें पारदर्शिता की कमी दिखाई देती रही है, जिसने इस संवैधानिक संस्था की कारगुज़ारी पर बड़े प्रश्न-चिन्ह खड़े कर दिए थे। अदालत को बनी इस जटिल स्थिति को हर हाल में सुलझाने की ज़रूरत होगी।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

