दवाओं के ज़रिए लोगों की लूट पर सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी

मेरे पिता के गुर्दे से स्प्लीन (तिल्ली) तक पस फैल गया था। स्थानीय अस्पताल के डॉक्टरों के कहने पर एमआरआई करवाई गई तो एक इमेजिंग सेंटर ने इस ‘कैंसर’ घोषित किया। फिर पिता को दिल्ली के एक बड़े निजी अस्पताल में लेकर गया, जहां डॉक्टरों ने उसी एमआरआई को देखकर कहा कि ‘घबराने की कोई बात नहीं है, कैंसर नहीं सिर्फ पस है, जो चौथी जनरेशन के एंटी-बायोटिक इंजेक्शनों से सूख जायेगी’। यह इंजेक्शन नस में दिन में सुबह, दोपहर व शाम को तीन बार लगना था और वह भी लगातार 20 दिन तक। अस्पताल की डिस्पेंसरी से एक इंजेक्शन 1500 रुपये का मिला, जोकि उसकी एमआरपी थी यानी 4500 रुपये रोज़ का खर्चा सिर्फ इंजेक्शन का था। तीन दिन बाद पिताजी को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई, इस शर्त के साथ कि इंजेक्शन का शेष कोर्स घर पर पूरा करना था। घर लौटने के बाद शाम को हमारे फैमली डॉक्टर कुशलक्षेम के लिए आये, उन्होंने दवा का नुस्खा देखने के बाद कहा कि इंजेक्शन वह खरीदकर लायेंगे। वह एक इंजेक्शन मात्र 500 रुपये के हिसाब से लेकर आये। उनके इस सहयोग से हमारा इंजेक्शनों पर जो खर्चा रोज़ाना 4500 रुपये का हो रहा था, वह घटकर 1500 रुपये का रह गया। अपने फैमली डॉक्टर की वजह से हमारी तो 3000 रुपये प्रति दिन की बचत हो गई बल्कि राहत मिल गई, लेकिन उन लोगों का क्या जिनको निजी अस्पताल की डिस्पेंसरी से ही एमआरपी पर दवा खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है, खासकर उस समय जब वह अपने किसी कैंसर रोगी की तिमारदारी में लगे हुए हों। 
गौरतलब है कि कैंसर की जो दवा खुदरा विक्रेता को 2700 रुपये में मिलती है, उसकी अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) 27,000 रुपये तक रखी जा रही है। फिर निजी व कॉर्पोरेट अस्पताल मरीज़ों को सिर्फ अपनी या नामित फार्मेसियों से ही महंगी दवाएं खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। यह मिसाल देते हुए, कुछ दिन पहले, सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर व अन्य जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों में 10 गुना तक के इस भारी अंतर पर कड़ी नाराज़गी जतायी और इस ‘दिन दहाड़े डकैती’ को ‘नरसंहार’ कहा। सुप्रीम कोर्ट की यह नाराज़गी एकदम दुरुस्त है, क्योंकि व्यक्ति इतना रोग से नहीं मरता है, जितना इलाज के भारी भरकम खर्च (बल्कि लूट) से टूट जाता है। कैंसर का इलाज कराते हुए कुछ परिवार तो ज़बरदस्त आर्थिक तंगी में आ जाते हैं और कुछ पैसा न होने की वजह से अपने प्रियजन को तड़पता व मरता हुआ देखने के लिए मजबूर हो जाते हैं। 
बहरहाल, न्यायाधीश विक्रमनाथ व न्यायाधीश संदीप मेहता की पीठ ने सभी दवाओं पर एक समान 16 प्रतिशत मुनाफा (मार्जिन) लागू करने पर बल दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि उन आरोपों की जांच करे जिनमें कहा गया है कि निजी व कॉर्पोरेट अस्पताल मरीज़ों को केवल अपनी या नामित फार्मेसियों से ही महंगी दवाएं खरीदने के लिए बाध्य करते हैं। अदालत ने यह भी कहा है कि इस तरह की अत्यधिक वसूली का बोझ अंतत: आम जनता, करदाताओं और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के खज़ाने पर पड़ता है। ध्यान रहे कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने देश के 19 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को भी निर्देश दिया था कि वे कैंसर को एक ‘अधिसूचित करने योग्य बीमारी’ घोषित करने पर विचार करें। इस संदर्भ में अगली सुनवायी 12 अक्तूबर, 2026 को होगी। यह सुनवायी कैंसर की दवाओं की एमआरपी, अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसी द्वारा मरीज़ों को बाहर से दवा न खरीदने देने और कृत्रिम रूप से महंगे दामों पर दवाएं बेचने के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका पर हो रही है, जिसमें मरीज़ों के शोषण और अधिक दाम वसूलने का मुद्दा उठाया गया है। कैंसर दवाओं की मनमानी कीमतों और अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दो अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई हैं। अदालत इन्हें एक साथ सुन रही है। एक पीड़ित परिवार मुख्य याचिकाकर्ता है। 
इस पीड़ित परिवार ने अपने व्यक्तिगत दुर्भाग्यपूर्ण अनुभव के बाद इंसाफ के लिए गुहार लगायी है। पीड़ित परिवार ने अपने और अन्य पीड़ितों के अनुभवों के आधार पर याचिका दायर की है, जिसमें यह आरोप भी लगाया गया है कि जेनेरिक दवाएं मांगने पर मरीज़ों को दुत्कारा जाता है। दूसरी याचिका में पंजीकृत डॉक्टरों द्वारा सस्ती जेनेरिक दवाएं न लिखे जाने और फार्मा कम्पनियों व फुटकर विक्रेताओं द्वारा दवाओं की कीमतों में की जा रही अनैतिक मुनाफाखोरी के खिलाफ आवाज़ उठायी है। इस याचिका में मांग की गई है कि ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) आर्डर, 2013 के तहत सख्त नियम लागू किये जायें ताकि कीमतों में होने वाली लूट को रोका जा सके। दरअसल, मरीज़ों को जो अत्यधिक महंगी दवा बेचकर ठगा जाता है, वह वास्तव में धोखाधड़ी और लूट का स्पष्ट मामला है। फुटकर विक्रेता को जिस दाम पर दवा मिलती है और उस पर जो एमआरपी दर्ज किया जाता है, के बीच में जो भारी अंतर रहता है, उसके लिए ज़िम्मेदार कौन है? इस पर सरकार व अधिकारी खामोश क्यों हैं? जो मरीज़ महंगी दवा खरीद न पाने के कारण समय-पूर्व ही दम तोड़ देते हैं उनकी ‘मौत’ (जिसे सुप्रीम कोर्ट नरसंहार कहता है) का दोषी कौन है? फिर ऊंची कीमतों पर दवाओं की खरीदारी करा के अस्पताल सरकारी योजनाओं जैसे सीजीएचएस, डीजीएचएस व आयुष या अन्य मेडिकल बीमा योजना के तहत इसका पैसा वसूलते हैं, एक संगठित आपराधिक गिरोह की तरह। 
यह आम जनता के टैक्स का पैसा है, विशेषकर इसलिए भी कि आयुष योजना के तहत जो इलाज होता है, उसकी पूरी कीमत का भुगतान करदाताओं को करना पड़ता है, जो वास्तविक खर्च से अक्सर कई गुना अधिक होता है। इसे एक घटना से समझिये। मेरे गुर्दे में पथरी हो गई, 21 एमएम की, जिसका ऑपरेशन कराना ज़रूरी हो गया था। यूरोलोजिस्ट मेरा परिचित था। उसने मुझसे मालूम किया कि क्या मेडिकल बीमा है? मैंने कहा कि न बीमा है और न ही कोई सरकारी कार्ड है। डॉक्टर ने मुझसे कुछ नहीं कहा। मेरे टैस्ट, ऑपरेशन, दवा व अस्पताल में दो दिन ठहरने का खर्च 30,000 रुपये आया। मेरे बराबर वाले बिस्तर पर लेटे मरीज़ के भी गुर्दे से पथरी निकाली गई थी, उसका कैशलेस मेडिकल बीमा था, उसका बिल बना 2,65,000 रुपये का। मुद्दा सिर्फ कैंसर व अन्य रोगों की दवाओं की भारी भरकम कीमत वसूलने और डॉक्टरों द्वारा जेनेरिक दवाएं न लिखने का ही नहीं है बल्कि नकली दवाओं का भी है। 
सुप्रीम कोर्ट में ही दायर एक अन्य जनहित याचिका में नकली कैंसर दवाओं व जीवनरक्षक इंजेक्शन का मसला उठाया गया है और इस गंभीर समस्या को संगठित अपराध की श्रेणी में शामिल करने व प्रभावी कार्रवाई की मांग की गई है। यह सही है कि इन मामलों पर अदालत विचार कर रही है, लेकिन इसका संज्ञान लेने व सभी नागरिकों को सस्ता सुलभ उपचार उपलब्ध कराने की ज़िम्मेदारी सरकारों की है। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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