महंगाई, ब्याज व रुपये को लेकर संतुलन की बड़ी चुनौती

आगामी 5 से 7 अक्तूबर 2026 को होने वाली मौद्रिक नीति समिति की बैठक के पहले ही फिज़ा में यह सवाल तैर रहा है कि महंगाई लगातार ऊपर जा रही है, साथ ही कच्चे तेल की कीमतें नई ऊंचाइयां छू रही हैं। ऐसे में आशंका है कि आरबीआई अपनी इस बैठक में रेपो रेट बढ़ायेगी। रेपो रेट दरअसल वह ब्याज दर है, जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकाल के लिए पैसा उधार देता है। इस रेपो रेट का आम लोगों के जीवन से सीधा संबंध है। भारत में होम लोन, वाहन लोन और कई तरह के दूसरे लोन की ब्याज दरें सीधे रेपो रेट से तय होती हैं। अगर रेपो रेट यानी रिजर्व बैंक द्वारा बैंकों से लिए जाने वाले ब्याज दर में बढ़ोत्तरी होती है, तो बैंक सीधे-सीधे आम लोगों को दिये गये लोन की ब्याज दरों को बढ़ा देते हैं, जिससे देश के आम मध्यवर्गीय घरों का पहले से तंग बजट और भी तनावपूर्ण हो जाता है।  देश में करीब 13 करोड़ लोग अलग-अलग जरूरतों के लिए, लिए गये कर्ज की हर महीने ईएमआई चुकाते हैं। अगर आगामी 5 से 7 अक्तूबर की मौद्रिक नीति  बैठक में आरबीआई महंगाई दर पर लगाम लगाने के लिए रेपो रेट बढ़ायेगी, तो इसका असर सीधे लगभग 13 करोड़ परिवारों के ऊपर पड़ेगा। आरबीआई द्वारा रेपो रेट बढ़ाये जाने की आशंका इसलिए प्रबल हो रही है, क्याेंकि इस साल जुलाई महीने में महंगाई दर (सीपीआई) जहां 4.45 प्रतिशत थी, वह अगस्त में बढ़कर 4.82 प्रतिशत हो गई। आरबीआई का मंहगाई दर को 4 प्रतिशत में रोक कर रखने का लक्ष्य है इसलिए लगता है कि पिछले लगभग डेढ़ सालों से रेपो रेट में जो बढ़त नहीं हो रही थी, शायद आगामी मौद्रिक नीति की बैठक में यह सिलसिला बरकरार न रह सके क्योंकि जहां सम्पूर्णता में महंगाई दर इस समय 4.82 प्रतिशत से ऊपर है, वहीं खाद्य महंगाई दर 5.95 प्रतिशत से भी ज्यादा है, जबकि यह जुलाई में 5.52 प्रतिशत थी। अगर इसे भी ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में अलग-अलग देखें तो इस समय ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महंगाई दर 6.13 प्रतिशत है। महंगाई दर के साथ-साथ इस समय एक अमरीकी डॉलर लगभग 96 रुपये का हो चुका है जबकि ब्रेंट क्रूड 104 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है।
ये सारी स्थितियां ऐसी हैं, जिनसे मौद्रिक नीति की आगामी बैठक में रेपो रेट को ज्यों का त्यों रख पाना शायद बहुत मुश्किल होगा। इसलिए जानकारों का अनुमान है कि अक्तूबर माह से शुरू हो रहे त्यौहारी मौसम में आम लोगों पर महंगाई की छाया मंडरा रही है। रिजर्व बैंक के सामने न सिर्फ ब्याज दरों को बढ़ने से रोकने की चुनौती है बल्कि महंगाई को काबू में रखने और आर्थिक विकास गति को बनाये रखने का भी कठिन लक्ष्य है। इसलिए देश के केंद्रीय बैंक के सामने महंगाई, ब्याज दरों और रुपये को डॉलर के मुकाबले स्थिर बनाये रखने की कड़ी चुनौती है। जिस तरह महंगाई दर लगातार ऊपर जा रही है, रुपया डॉलर के मुकाबले टूट रहा है और कच्चे तेल की कीमतें भू-राजनीतिक समीकरणों के तनावपूर्ण होने के कारण लगातार दबाव बनाये हुए हैं।  
ऐसे में अगर आरबीआई यह तय करे कि अगले तीन महीने और देख लेते हैं, तो लगभग 13 करोड़ ईएमआई भरने वालों को इस त्यौहारी सीजन में बढ़ने वाली ब्याज दरों से राहत मिल सकती है। आरबीआई का यह साहसी फैसला दीवाली की खरीदारी को भी पंख लगा सकता है क्योंकि भारत में दीवाली के मौके पर पूरे साल भर में होने वाली खरीदारी का लगभग 30 से 35 प्रतिशत पूरा हो जाता है। इससे देश की अर्थव्यवस्था को काफी मजबूत प्रोत्साहन मिलता है। 
अगर आरबीआई रुपये को मजबूत बनाने के लिए ब्याज दर बढ़ाते है, तो विनिमय दर, पूंजी प्रवाह और आयातित महंगाई के सभी व्यापक असर सामने आएंगे। लब्बोलुआब यह कि आरबीआई के सामने बड़ी विकट स्थिति है। एक तरफ कुआं है तो दूसरी तरफ खाईं है। इसलिए कहा जा रहा है कि मौद्रिक नीति समिति की आगामी बैठक तनी हुई रस्सी पर संतुलन साधने जैसी होगी।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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