कौन बनेगा पंजाब कांग्रेस का नया प्रधान ?

कुर्सी तो सिर्फ एक है और कितने सवाली उसके?
किस की है किस्मत में लिखी ये वक्त बतलाएगा।
इन कालमों में लगातार लिखा जा चुका है कि पंजाब कांग्रेस के प्रधान अमरिन्दर सिंह राजा वड़िंग को बदला जा सकता है परन्तु उनको सम्मान से हटाया जाएगा। अब वही हो रहा है। राजा वड़िंग के इस्तीफे के बाद चर्चा गर्म है कि अब पंजाब कांग्रेस का नया प्रधान कौन बनेगा?
हमारी जानकारी के अनुसार राहुल गांधी और कांग्रेस हाईकमान ने एक नया सर्वे करवाया है, जिसमें हिन्दू, जट्ट और दलित चेहरों के बारे में सर्वे करके 3 पैनल पेश किए गए हैं। हिन्दू चेहरों में 4 नाम बताए जाते हैं। सबसे पहले और मज़बूत चेहरा विजय इंद्र सिंगला का है। वह कांग्रेस प्रधान मल्लिकार्जुन खड़गे के करीबी माने जाते हैं। वैसे भी वह गुटबाज़ी से काफी बचकर चले हैं। पहले भी उनके नाम पर लगभग फैसला हो ही गया था परन्तु बीच में लटक गया था। दूसरे नम्बर पर पूर्व स्पीकर राणा के.पी. सिंह और भारत भूषण आशू के नाम हैं। राणा के.पी. प्रधान राजा वड़िंग के नज़दीकी बताए जाते हैं। वैसे वह भी खुलकर किसी पक्ष के साथ नहीं चले जबकि आशू सोनिया गांधी के एक नज़दीकी एम.पी. के खास हैं। एक नाम जो पंजाब में ज्यादा चर्चित नहीं परन्तु प्रधानगी की दौड़ में शामिल बताया जा रहा है, वह अमित विज का है। वह हाईकमान में काफी विचरण करते रहते हैं। जट्ट सिख चेहरे में सबसे पहले नाम परगट सिंह का लिया जा रहा है। दूसरे नम्बर पर सुखजिंदर सिंह रंधावा और विपक्षी दल के नेता प्रताप सिंह बाजवा बताये जाते हैं। पाठकों के लिए एक हैरानी का बात होगी कि सुखबिंदर सिंह सुख सरकारिया का नाम तीसरे नम्बर पर है। चाहे एक की पुष्टि नहीं हो सकती परन्तु चर्चा है कि सुख सरकारिया का नाम श्रीमती सोनिया गांधी को एक कांग्रेस छोड़ चुके बड़े नेता ने मुझाया है जबकि जट्ट सिख चेहरों में गुरजीत सिंह औजला का नाम भी लिया जा रहा है हालांकि इस समय किसी दलित के प्रधान बनने के आसार काफी कम हैं, क्योंकि चुनाव मुहिम कमेटी के प्रमुख के रूप में अघोषित तौर पर चरणजीत सिंह चन्नी ही पंजाब में सबसे बड़े नेता के रूप में दिखाई देंगे। फिर यह कांग्रेस की संतुलन बनाये रखने की नीति के अनुकूल भी नहीं, परन्तु फिर भी दलित चेहरों में पहला नाम चरणजीत सिंह चन्नी और दूसरा नाम डा. अमर सिंह का लिया जा रहा है। वैसे भी हाईकमान की मज़र्ी है कि वह इन सभी चर्चित नामों को छोड़कर किसी अन्य अचर्चित चेहरे को भी आगे ला सकती है।
ताज में कांटे भी हैं तो फिर्क है किसको
सर रहे या न रहे बस कि ताज चाहिए।
समस्या सिर्फ नशे की नहीं
आज भी शायद कोई फूलों का तोहफा भेज दे,
तितलियां मंडरा रही हैं कांच के गुलदान पर।
शाकेब जलाली का यह शेयर पंजाबियों की आशा जैसा है। हर बार जब भी प्रधानमंत्री या गृहमंत्री ने पंजाब आना होता है तो बहुत चर्चा होती है कि पंजाब को अब कुछ खास देकर जाएंगे। पंजाब के लोग भी तितलियों की तरह ही खाली गुलदान के आस-पास आशाओं के चक्कर लगाने लगते हैं, कि शायद इस बार कुछ फूल पंजाब की झोली में पड़ जाएं परन्तु हर बार यह आशा और गहरी निराशा में बदल जाती है। इस बार भी गृहमंत्री अमित शाह की पंजाब यात्रा ऐसी ही रही है। बेशक उन्होंने पंजाबियों और सिखों की सभी पारम्परिक, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मांगों के बारे में वह कुछ नहीं बोले। बेशक यह मौका भाजपा की नशा मुक्त यात्रा के अंतिम चरण का था और इस में नशे की बात प्रमुखता से उठानी ज़रूरी थी। उन्होंने 31 दिसम्बर, 2029 तक पंजाब में से नशा खत्म करने की बात कही बशर्ते कि पंजाबी पंजाब में भाजपा का शासन लेकर आएं। यह ठीक है कि नशा पंजाबियों के लिए एक बहुत बड़ी समस्या है और पिछली दो सरकारें बनने में नशा हटाने के वायदों का बड़ा हाथ भी था परन्तु पंजाब सिर्फ नशे की समस्या में नहीं घिरा हुआ। इसके साथ-साथ केन्द्रीय सरकारों द्वारा पैर-पैर पर किए जाते धक्के भी इसकी मुश्किलों का कारण हैं। पंजाबी कैसे विश्वास करें कि यदि भाजपा को शासन सौंप दें तो पंजाब में से नशा खत्म हो जाएगा। कहा जा रहा है कि पंजाब में नशा सीमापार ड्रोन के द्वारा आ रहा है परन्तु सीमा से 50 किलोमीटर तक केन्द्रीय एजेंसी बी.एस.एफ. का कंट्रोल भी तो है। उसकी सीधी ज़िम्मेदारी केन्द्रीय गृह मंत्रालय ही है परन्तु बी.एस.एफ. यह नशा तस्करी रोकने में पूरी तरह असफल क्यों है? बाकी नशा पंजाब में दूसरे राज्यों से आता है और उन राज्यों और गुजरात से  लेकर हरियाणा तक और महाराष्ट्र से लेकर राजस्थान तक हर जगह भाजपा की ही राज्य सरकारें हैं, क्यों नहीं नशा पंजाब में आने से पहले ही पकड़ लिया जाता? हां यह नहीं कि सिर्फ भाजपा ज़िम्मेदार है, पंजाब की सरकारों की ज़िम्मेदारी भी है, चाहे वह ‘आप’ सरकार है या पहले की कांग्रेस या अकाली-भाजपा सरकारें थीं। आप केन्द्र सरकार द्वारा पंजाब के प्रति फज़र् पूरा करो, पंजाबी आपको सिर आंखों पर बिठा लेंगे। हमें चाहे अपना मुकद्दर अंधेरा दिखाई दे रहा है परन्तु हमने अभी भी सुबह की आशा छोड़ी नहीं : 
नये दौर का है मुकद्दर अंधेरा, 
मगर फिर भी ‘आशा’ सहर ढूंढते हैं।
(आशा प्रभात)
भाजपा शासित राज्यों में नशा?
दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता,
तुम को भी तो अंदाज़ा लगाना नहीं आता।
वसीम बरेलवी का यह शेयर केन्द्र सरकार और पंजाबियों दोनों पर सटीक रहता है। हम पंजाबियों को अपने दु:खों की दास्तां सुनानी नहीं आती और शायद केन्द्र को भी हमें मामलों की कोई थाह नहीं है। गृह मंत्री अमित शाह ने पंजाब में भाजपा सरकार बनने पर पंजाब में से नशा खत्म करने का वायदा तो किया है परन्तु क्या सिर्फ सरकार बदलने के साथ पंजाब में से नशा खत्म हो जाएगा? ज़रा भाजपा का रिकार्ड देखिये। पिछले 25 वर्ष से गुजरात में भाजपा का शासन है, 12 वर्ष से डबल इंजन की सरकार है। पिछले 25 वर्षों में गुजरात में 1 लाख, 36 हज़ार किलो अलग-अलग तरह का नशा पकड़ा गया है। यह आम माना जाता है कि पकड़ा गया नशा वास्तव में तस्करी का एक छोटा हिसास होता है। गुजरात में मुंदरा पोर्ट पर एक बार में 3000 किलो हैरोइन पकड़ी गई, जो भारत में पकड़ी गई सबसे बड़ी खेप है। महाराष्ट्र में तो कई नशा बनाने वाली लैबोटरियां या फैकटरियां भी पकड़ी गई हैं। महाराष्ट्र में पिछले 5 वर्षों में 11,000 करोड़ रुपये से अधिक के नशे पकड़े गए हैं। राजस्थान की सीमा पर भी ड्रोन उतर रहे हैं। उत्तर प्रदेश चरस और राजस्थान अफीम व पोस्त की तस्करी में अग्रणी बताया जाता है। हरियाणा में भी तो भाजपा की सरकार है परन्तु हरियाणा में भी नशा आए दिन बढ़ता जा रहा है। 2022 में तो हरियाणा में नशे के कारण आत्महत्या के 73 मामले थे, जबकि पंजाब में 54 थे। यह ठीक है कि पंजाब से हरियाणा में नशे के केस कम हैं परन्तु फिर भी देश की राष्ट्रीय औसत से ज्यादा हैं। इसलिए सिर्फ सरकार बदलने के साथ नशा खत्म नहीं होगा। नशा खत्म करने के लिए पंजाब की अन्य समस्याओं का हल भी ज़रूरी है। सबसे ज़रूरी है कि राजनीतिज्ञों, गैंगस्टरों और तस्करों का गठबंधन तोड़ा जाए और नौजवानों को अच्छे भविष्य की आशा दिखाई जाए।
दवाइयां : दिन दहाड़े डकैती?
ज़िंदगी इक कशमकश है ज़िंदगी तूफान है
कौन कैहंदा है कि मरना जीन तों आसान है।
उस्ताद राम नाथ मुसाफिर का यह शेयर दवाइयों की कीमतों के बारे में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी कि ‘यह दिन-दिहाड़े डकैती’ है पढ़ कर याद आया क्योंकि आज के युग में जीने के लिए दवाइयां बहुत ज़रूरी है और सबसे ज्यादा लूट भी दवाइयों में ही हो  रही है। अदालत में पेश तथ्यों में सामने आया है कि कैमिस्ट को 2700 रुपये में मिलने वाली कैंसर की दवाई की एम.आर.पी. 27000 रुपये लिखी हुई है। 3520 रुपये वाले टीके की कीमत 22437 है। इससे अलग रिपोर्टों के अनुसार 11 रुपये का आई.वी. सैट 325 रुपये में बिकता है। कई दवाइयों पर 52 गुणा तक महंगे रेट की एम.आर.पी. लिखी हुई मिलती है। कुछ ही दिन पहले मैंने खुद एक दोस्त कैमिस्ट से एक दवाई ली तो 75 प्रतिशत कम रेट पर मिली। सबसे बुरी बात तो यह है कि डाक्टर मरीज़ को मजबूर करते हैं कि दवाई सिर्फ उनके अस्पताल या बताई गई कम्पनी या उनके पसंद के कैमिस्ट से ही खरीदी जाए। असल समस्या यह है कि ड्रग प्राईस कंट्रोल आर्डर सिर्फ 10 से 18 प्रतिशत दवाइयों पर ही लागू है। बाकी दवाइयों की जो मज़र्ी कीमत लिखो, कोई रोक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया है कि सभी ज़रूरी दवाइयां (ज़रूरी क्यों, सभी क्यों नहीं?) और 16 प्रतिशत मुनाफे की हद लगाई जाए। यह पहले ही ड्रग प्राईस कंट्रोल अधीन लागू है परन्तु हमारी सुप्रीम कोर्ट के सुयोग्य जजों को निवेदन है कि वे सुझाव नहीं, आदेश दें और इस आदेश को एक समयबद्ध तरीके के साथ लागू भी करवाएं, ताकि लोग अपने जीने के अधिकार को मान सकें।
-मो. 92168-60000

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