बहुत देर कर दी जनाब! आते आते

पंजाब विधानसभा के चुनाव निकट आ रहे हैं, परन्तु प्रदेश कांग्रेस में विगत कई महीनों से आपसी कशमकश चलती आ रही है। अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को अप्रैल, 2022 में प्रदेश पार्टी अध्यक्ष बनाया गया था। पिछले 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में वह लुधियाना से लोकसभा सदस्य चुने गए थे। उससे पहले नवजोत सिंह सिद्धू पार्टी अध्यक्ष थे। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने राजा वड़िंग के नेतृत्व में 7 लोकसभा सीटों पर जीत प्राप्त की थी। प्रदेश चुनाव निकट होने के कारण पार्टी द्वारा राजा वड़िंग को ही अध्यक्ष पद पर बनाए रखने का फैसला किया गया था, परन्तु जुलाई महीने में हाईकमान के इस फैसले की घोषणा के बाद पंजाब कांग्रेस में हड़कंप मचा दिखाई दिया।
चाहे उस समय हाईकमान द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को चुनाव के लिए प्रचार कमेटी का प्रमुख घोषित किया गया था और प्रताप सिंह बाजवा पहले की तरह विपक्ष के नेता बनाए रखे गए थे, परन्तु इस फैसले से पार्टी के भीतर जो हंगामा मचा था, उसके समाधान के लिए हाईकमान द्वारा पंजाब कांग्रेस के प्रभारी भूपेश बघेल को यह कार्य सौंपा गया था, जिन्होंने पंजाब में सभी पक्षों से सम्पर्क बनाने का यत्न किया परन्तु इसमें वह सफल न हो सके, क्योंकि चरणजीत सिंह चन्नी और उनके साथियों ने राजा वड़िंग के विरुद्ध बगावती स्वर अपनाए रखे थे और यह आरोप भी लगाया कि भूपेश बघेल एक तरह से राजा वड़िंग की सहायता कर रहे हैं। यहां तक कि प्रदेश पार्टी द्वारा उस समय आयोजित की गई रैलियों और कान्फ्रैंसों में भी चन्नी के समर्थकों के अतिरिक्त और भी कई बड़े कांग्रेसी नेता अक्सर ़गैर-हाज़िर ही रहे। 
भूपेश बघेल स्थिति को सम्भाल पाने में सफल न हो सके। इसलिए सितम्बर के पहले सप्ताह पार्टी ने भूपेश बघेल के स्थान पर सचिन पायलट को पंजाब प्रभारी नियुक्त करने की घोषणा कर दी। पायलट कुछ सीमा तक पंजाब के कांग्रेसियों की खींचतान को ठीक करने में सफल ज़रूर हुए, क्योंकि जब वह 15 सितम्बर को प्रदेश पार्टी द्वारा ‘आप’ सरकार के विरुद्ध चंडीगढ़ में किए गए प्रदर्शन में शामिल हुए तो उस प्रदर्शन में सभी कांग्रेसी गुट शामिल हुए थे, परन्तु इसके बावजूद यह अंतर्कलह पूरी तरह खत्म न हो सकी, जिसके दृष्टिगत अब राजा वड़िंग के स्थान पर नया प्रदेश अध्यक्ष लगाने की नीति अपनाई गई है। 
पिछले महीनों में जहां कांग्रेसी आपस में लड़ते-झगड़ते रहे, वहीं सत्तारूढ आम आदमी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और कुछ टुकड़ों में बंटे अकाली दलों ने अपनी गतिविधियां तेज़ रखीं और अपने-अपने ढंग से आगामी चुनाव में पूरी तैयारी से उतरने के लिए वह अपनी योजनाबंदी करते रहे। इस समय में कांग्रेस की हालत पुलों के नीचे से बहुत-सा पानी बह जाने जैसी प्रतीत होने लगी है। राहुल गांधी जैसे  नेता पिछले इस पूरे समय में पंजाब के आगामी चुनाव के लिए कोई क्रियात्मक कदम उठाने में असमर्थ रहे। इसकी बजाय वह चल रहे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम में ही व्यस्त या उलझे रहे। छोटे-से पंजाब को उन्होंने अपने जरनैलों के हाथ सौंप दिया और ये जरनैल भी बदलते रहे। ऐसी स्थिति में प्रदेश नेतृत्व की गुत्थी और भी उलझी दिखाई देने लगी है। चुनावों के निकट आकर पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष बदलना युद्ध में घोड़ा बदलने वाली कवायद है। इससे पार्टी का आंतरिक संकट कितना हल होगा और पार्टी चुनाव में कितनी एकजुटता व सामर्थ्य से लड़ेगी, यह देखना अभी शेष है। यहां निम्नलिखित ये पंक्तियां ज़रूर सही बैठती हैं—
बहुत देर कर दी
जनाब! आते आते

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द 

#बहुत देर कर दी जनाब! आते आते