खेतों से उठता धुआं
पंजाब की एक मुख्य फसल धान की आवक मंडियों में शुरू हो गई है। पिछले कई दशकों से यह फसल किसी न किसी रूप में पंजाब की आर्थिकता को बड़ा योगदान देने में सहायता करती रही है। इस बार भी केन्द्र सरकार की ओर से इसकी अदायगी के लिए 42 हज़ार, 786 करोड़ की राशि आरक्षित रखने के प्रबंध किए गए हैं। एक अनुमान के अनुसार इस बार 180 लाख मीट्रिक टन फसल मंडियों में आने की संभावना है, जिसकी खरीद के लिए 1800 से भी अधिक केन्द्र स्थापित किए गए हैं। जहां इस फसल का आसानी से मंडीकरण होने के कारण किसान वर्ग के लिए यह पहली या दूसरी पसंद बनी रही है, वहीं समय के व्यतीत होने से इसके नकारात्मक प्रभाव भी सामने आते रहे हैं। पानी सदियों से पंजाब का प्राकृतिक खज़ाना माना जाता रहा है। इस धरती को नदियों की धरती कहा जाता है। आज भी यदि यहां पांच नहीं तो 3 नदियां ज़रूर बह रही हैं। समय व्यतीत होने पर ज़िन्दगी की तज़र् बदलने से औद्योगीकरण और शहरीकरण के प्रभाव से कभी साफ और स्वच्छ नदियों का पानी अब बेहद दूषित और काला दिखाई दे रहा है, जो मनुष्य के लिए और फसलों के लिए भी ़खतरनाक सीमा तक हानीकारक बन चुका है।
कभी यह धरती कुओं वाली थी, फिर नलकों वाली बनी और अंग्रेज़ों के समय इस पानी के इस्तेमाल के लिए नहरें भी निकाली गईं परन्तु फसलों की काश्त का तरीका बदलने से सिंचाई के स्रोत भी बदल गए। पहले कुओं से, फिर ट्यूबवैलों और अब सबमर्सीबल ट्यूबवैलों से सिंचाई हो रही है। आज छोटे से पंजाब में लगे लाखों सबमर्सीबल ट्यूबवैलों ने भूमिगत पानी पाताल तक पहुंचा दिया है। प्रदेश के ज्यादातर क्षेत्र ‘डार्क ज़ोन’ घोषित किए गए हैं। ‘डार्क ज़ोन’ का मतलब यहां भूमिगत पानी खत्म होने के निकट हो। नि:संदेह पंजाब के लोग पानी का उचित इस्तेमाल करने में लापरवाह रहे हैं और इसके इस्तेमाल के स्थान पर लगातार दुरुपयोग किया जा रहा है। शहरों और कस्बों में उद्योगों से लेकर अन्य संस्थानों और घरों में इसके दुरुपयोग ने प्रदेश में सूखे जैसे हालात पैदा कर दिए हैं। प्रदेश की दूसरी मुख्य फसल के रूप में यदि व्यापक स्तर पर धान लगाया जाता है तो उसके लिए भी अथाह पानी का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए यह फसल भूमिगत पानी को कम करने का एक कारण बनी दिखाई देती है। इसलिए कृषि वैज्ञानिक विगत लम्बी अवधि से बहुत चिंताजनक स्थिति में धान के स्थान पर वैकल्पिक फसलों की काश्त करने की बात करते आ रहे हैं। विगत अवधि में इसका एक और नकारात्मक पहलू भी उजागर हुआ। गेहूं और धान की कटाई के बाद बचे अवशेष को खेतों में आग लगाने का सिलसिला लगातार जारी है, जिसने इन मौसमों में पंजाब के अतिरिक्त अन्य साथ लगते क्षेत्रों को भी प्रदूषित करने में बड़ा योगदान डाला है। पिछले कई दशकों से तत्कालीन सरकारें इस नकारात्मक रुझान को रोकने के लिए पूरा ज़ोर लगा चुकी हैं। लोगों को जागरूक करने के लिए प्रत्येक पक्ष से बड़े यत्न किए गए और कड़ी चेतावनियां भी जारी की गईं, परन्तु अब तक इसके गलत रुझान को बंद कर पाने में विफल ही सिद्ध हुई हैं।
केन्द्र सरकार ने भी फसलों के अवशेषों के प्रबंध के लिए समय-समय पर अरबों रुपये की बड़ी राशि भेजी है और ज़रूरी मशीनरी भी संबंधित वर्ग को उपलब्ध करवाई गई है। बुआई के लिए हैप्पी सीडर और सुपर सीडर औज़ारों के इस्तेमाल हेतु भी आर्थिक सहायता और रियायत की योजनाओं को अमल में लाने के बड़े यत्न किए गए हैं। समय-समय पर ऐसा करने वालों को भारी जुर्माने और संबंधित किसानों की ज़मीनों में लाल इंदराज भी किए गए हैं। इस बार भी प्रशासन पूरे योजनाबद्ध ढंग से सतर्कता दिखा रहा है परन्तु इसके बावजूद मंडियों में धान की फसल आते ही पंजाब को दूषित और ज़हरीले धुएं ने घेरना शुरू कर दिया है। कुछ दिनों में ही दर्जनों मामले सामने आए हैं। पिछले वर्ष भी ऐसा ही घटित हुआ था और पांच हज़ार से अधिक मामले भी दर्ज किए गए थे, करोड़ों का जुर्माना भी किया गया था परन्तु इसके बावजूद यह प्रचलन अभी भी जारी है, जिसे अब पूरी सतर्कता से रोकना सरकार की बड़ी ज़िम्मेदारी बन गई है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

