प्राकृतिक आपदा से अभी भी जूझ रहा नेपाल

चीन-नेपाल सीमा के पास हिमालय में ग्लेशियर खिसकने की घटना के लगभग एक महीने बाद, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे, गुस्साए नेपाली देश और विदेश में बड़ी संख्या में लोगों की रैलियों में तुरंत ‘पर्यावरण न्याय’ की मांग कर रहे हैं। दुख की बात है कि दुनिया की सबसे बुरी प्राकृतिक आपदाओं में से एक पर अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग कार्य उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा है।
नेपाल ने सबसे ज़्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाले औद्योगिक देशों से इस आपदा के लिए आम प्रणालीगत जवाबदेही की मांग करने में कोई देर नहीं की। इसने इस मामले में अमरीका के साथ-साथ अपने सबसे करीबी पड़ोसियों भारत और चीन का नाम लिया। कुल मिलाकर दुनिया भर के पर्यावरणविद इस बात से सहमत हैं कि बढ़ता वैश्विक तापमान और बढ़ता पर्यावरण प्रदूषण बर्फ  की चोटियों और ग्लेशियरों के पिघलने के मुख्य कारण हैं, जिससे अक्सर प्राकृतिक आपदाएं आती हैं। लेकिन जैसा कि आम तौर पर ज़्यादातर छोटे देशों के साथ होता है, जब वे झगड़े वाले मुद्दों पर बड़ी ताकतों से भिड़ते हैं, तो ज्याद आगे नहीं बढ़ पाते। नेपाल भी अपनी शिकायत को लेकर ज़्यादा आगे नहीं बढ़ पाया। वैसे भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के अधीन अमरीका तो वैश्विक तापमान बढ़ने को दुनिया के पर्यावरण के लिए लिए खतरा भी नहीं मानता!
भारत और चीन दोनों ने तुरंत जवाब दिया और नेपाल को बड़ी मात्रा में बचाव कार्यकर्ता और राहत सामग्री भेजी जबकि काठमांडू में आधिकारिक भावनाओं पर कोई राजनयिक प्रतिक्रिया नहीं दी। संयुक्त राष्ट्र ने भी ़500 लाख की तुरंत आपदा कम करने वाली मदद का वादा किया, लेकिन काठमांडू में मौजूद पर्यवेक्षक ने शिकायत की कि ‘प्रगति’ धीमी थी। जैसे-जैसे समय बीतता गया, नेपाल में भूस्खलन और ज़मीन की तबाही का भयानक पैमाना और साफ होता गया। नेपाल के मीडिया में बताए गए आधिकारिक आहतों ने अपनी कहानी खुद बयां की। अब तक मरने वालों की संख्या लगभग 1470 की पुष्टि हुई है, जबकि लगभग 5800 लोग लापता हैं। 
चीन के पास लांगथांगलिरुंग नदी के किनारे प्रकृतिक तबाही और बहुत बड़ी थी। 26 अगस्त को चीन से नेपाल और आस-पास के इलाके में लगभग 17,000 फुट की ऊंचाई पर बहने वाली नदी में एक झटके के बाद, पिघली हुई बर्फ, चट्टानों और पेड़ों की एक बड़ी लहर नीचे ल्हेंडे नदी के निचले हिस्से में एक अस्थिर ग्लेशियर से लगभग 2500 फुट नीचे गिर गई। बाद में विश्लेषकों ने इस प्रक्रिया को एक बड़ी नदी की बुलेट ट्रेन जैसा बताया जो गुरुत्वाकर्षण की मदद से तेज़ रफ्तार से नीचे की गहराई में गिर रही थी। शुरुआती झटके का असर जिससे नदी खिसकने लगी, रिक्टर स्केल पर 5.3 आंका गया था।
शुरू से आखिर तक, शुरुआती तबाही सिर्फ 20 मिनट या उससे ज़्यादा समय तक चली, लेकिन इसने तबाही और आर्थिक नुकसान का ऐसा निशान छोड़ा जिसके असर को संभालने में दशकों लग सकते हैं। शुरुआती अनुमानों से पता चला कि अगले कुछ सालों में नेपाल, जो चीन और भारत जैसे दो बड़े देशों के बीच फंसा हुआ एक बेबस और कम सुविधाओं वाला देश है, को ठीक होने के लिए कम से कम ़5 अरब की अल्पावधि और दीर्घावधि मदद की ज़रूरत होगी। कम से कम 80,000 लोगों की ज़िंदगी किसी न किसी तरह से बिखर गई है। मरने वालों और लापता लोगों में छोटी फैक्टरियों और दुकानों में काम करने वाले मज़दूर, एशियाई लोगों समेत बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक और तीर्थयात्री शामिल थे। मारे गए या घायल हुए ज़्यादातर लोग नेपाल और भारत से थे।
यह अच्छी बात थी कि चीन और भारत से मिली बड़ी मदद के अलावा अलग-अलग देशों से पहले ही काफी सामान की मदद मिल चुकी है। हालांकिए नेपाल में कुछ जानकार भविष्य को लेकर अभी भी परेशान हैं। संयुक्त राष्ट्र और उसकी एजंसियों जैसे सबसे बड़े अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर या बड़े विकसित देशों के साथ इस बारे में कोई खास बातचीत नहीं हुई है कि नेपाल को जिस तरह की लगातार मदद मिलनी चाहिए, उसे पक्का करने के लिए एक बड़ी, समय पर, अल्पावधि और दीर्घावधि योजना की सख्त ज़रूरत है।
इन हालात में यह कोई अजीब बात नहीं है कि काठमांडू में अभी चल रहे बड़े जलविद्युत परियोजनाओं के भविष्य के बारे में बहुत बातें हो रही हैं। नेपाल को अपना घाटा पूरा करने और भविष्य में अपने आर्थिक विकास को निश्चित करने के लिए और ज़्यादा बिजली की ज़रूरत है। मुख्य रूप से भारत की मदद से वह अपनी पैदा की गई जलविद्युत का एक छोटा हिस्सा नियमित तौर पर बांग्लादेश को बेचता है। यह भविष्य में भारत को भी अपनी बिक्री बढ़ाकर और ज़्यादा धन कमाने की योजना बना रहा है।
लेकिन पर्यावरणवादियों और विशेषज्ञों को लगता है कि यह मामला दोधारी तलवार है। नेपाल को अपनी अर्थव्यवस्था को विकसित करते हुए और पर्यावरण को बचाते हुए सावधानी से संतुलन बनाना होगा। बड़ी प्राकृतिक आपदा सीधे तौर पर इसके सबसे बड़े राजस्व कमाने वाले पर्यटन उद्योग पर असर डालती है। लेकिन हिमालय के भविष्य पर बड़े पैमाने पर पनबिजली बनाने वाली परियोजनाओं का खतरा मंडरा रहा है। बड़े पैमाने पर खुदाई और सुरंग बनाने के साथ-साथ भारी-भरकम इमारतों और बैरकों के निर्माण से हिमालय की अपेक्षाकृत नई पर्वत श्रृंखलाओं की नींव कमज़ोर हो जाती है। हालांकि ऐसी औद्योगिक गतिविधियों से काफी कमाई हुई है और स्थानीय अर्थव्यवस्थाएं मजबूत हुई हैं, लेकिन प्राकृतिक आपदाओं के कारण पनबिजली और अन्य परियोजनाओं का आधार ही पल भर में नष्ट हो जाता है। इस संदर्भ में नेपाल और भारत के अधिकारी कम से कम 13 प्रमुख पनबिजली उत्पादन और उससे जुड़ी परियोजनाओं के भविष्य पर फिर से विचार कर रहे हैं। (संवाद)

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