सिर्फ डिग्री रोज़गार की गारंटी नहीं, कौशल भी ज़रूरी

घर में खाली बैठा एक शिक्षित युवा धीरे-धीरे अपने ही परिवार पर आर्थिक बोझ बनने लगता है। बेरोज़गारी से पैदा होने वाली निराशा, चिंता और आक्रोश कई बार उसे नशे, अपराध या आत्मघाती विचारों की ओर ले जा सकते हैं। यही वजह है कि युवाओं की बेरोज़गारी को सिर्फ आंकड़ा मान कर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। नीति आयोग के एक आंकड़े के अनुसार देश में लगभग 8.25 प्रतिशत स्नातक ही ऐसे हैं, जिन्हें उनकी शैक्षणिक योग्यता और डिग्री के अनुरूप काम मिल रहा है। इसका अर्थ यह है कि बड़ी संख्या में युवा डिग्री हासिल करने के बावजूद रोज़गार बाज़ार की अपेक्षाओं के अनुरूप कौशल नहीं रखते। यही विरोधाभास तब दिखाई देता है, जब सरकारी चपरासी, सफाईकर्मी या अन्य निम्न पदों की सीमित रिक्तियों के लिए लाखों आवेदन आते हैं और उनमें उच्च शिक्षित युवा भी शामिल होते हैं।
आज भारत अपनी विशाल युवा आबादी को अपनी सबसे बड़ी ताकत के रूप में प्रस्तुत करता है। अंतर्राष्ट्रीय मंचों, निवेशक सम्मेलनों और राजनीतिक भाषणों में अक्सर यह बताया जाता है कि देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। लेकिन केवल बड़ी युवा आबादी किसी देश को आर्थिक शक्ति नहीं बना सकती। युवाओं के हाथों में रोज़गार, कौशल और सही दिशा होना भी उतना ही ज़रूरी है। यदि बड़ी संख्या में युवा शिक्षा, रोज़गार और प्रशिक्षण से बाहर हो जाएं तो जनसांख्यिकीय लाभांश अवसर के बजाय गंभीर सामाजिक-आर्थिक चुनौती बन सकता है।
नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 15 से 29 वर्ष की आयु के लगभग 8.75 करोड़ युवा न तो शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, न रोज़गार से जुड़े हैं और न ही ऐसा कोई तकनीकी या व्यावसायिक प्रशिक्षण ले रहे हैं, जो उन्हें भविष्य में रोज़गार के योग्य बना सके। इतनी बड़ी युवा आबादी का बेकार रहना केवल आर्थिक नुकसान नहीं है। बेरोज़गारी लंबे समय तक बनी रहे तो व्यक्ति के आत्मविश्वास, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक जीवन पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए इस समस्या को रोज़गार, शिक्षा और मानसिक-सामाजिक सुरक्षा, तीनों पक्षों से देखने की आवश्यकता है।
देश में कालेजों और निजी विश्वविद्यालयों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। हर वर्ष लाखों विद्यार्थी डिग्रियां हासिल करते हैं, लेकिन डिग्री मिलने के बाद रोज़गार की वास्तविक दुनिया में उन्हें कठिन प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। इससे स्पष्ट होता है कि केवल डिग्री हासिल करना रोज़गार की गारंटी नहीं है। समस्या की एक बड़ी वजह शिक्षा और उद्योग की ज़रूरतों के बीच बढ़ता अंतर है। कई संस्थानों में अभी भी ऐसे पाठ्यक्रम पढ़ाए जाते हैं, जिनमें व्यावहारिक प्रशिक्षण और बदलती तकनीक की अपेक्षाकृत कम जगह है।
यदि कोई इंजीनियर चार वर्ष की पढ़ाई पूरी करने के बाद उद्योग में इस्तेमाल होने वाली सामान्य मशीन की समस्या पहचानने में भी सक्षम नहीं है, तो उसके लिए रोज़गार हासिल करना कठिन होना स्वाभाविक है। इसलिए शिक्षा को डिग्री-केंद्रित व्यवस्था से निकालकर कौशल और रोज़गारोन्मुख व्यवस्था में बदलना ज़रूरी है। इस समस्या का समाधान केवल कालेज के अंतिम वर्ष में प्रशिक्षण शुरू करने से नहीं होगा। कौशल विकास की शुरुआत स्कूली शिक्षा के दौरान ही होनी चाहिए। विद्यार्थियों को पुस्तकीय ज्ञान के साथ-साथ तकनीकी और व्यावसायिक गतिविधियों से परिचित कराया जाना चाहिए। जर्मनी और जापान जैसे देशों में शिक्षा और व्यावहारिक प्रशिक्षण के बीच बेहतर तालमेल के उदाहरण मिलते हैं। वहां विद्यार्थियों को कक्षा में पढ़ाई के साथ उद्योग और कार्यस्थल से जुड़ा व्यावहारिक अनुभव भी दिया जाता है। भारत में भी व्यावसायिक काम को सम्मान मिलने की आवश्यकता है। जब तक समाज में हाथ से काम करने वाले कुशल व्यक्ति को कमतर समझने की मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक लाखों युवा केवल सरकारी नौकरी की प्रतीक्षा में अपने महत्वपूर्ण वर्ष गंवाते रहेंगे।
दुनिया चौथी औद्योगिक क्रांति के दौर से गुज़र रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), रोबोटिक्स और मशीन लर्निंग के कारण कई दोहराव वाले कामों का स्वरूप बदल रहा है। डेटा एंट्री और कुछ नियमित कार्यालयी कार्यों में स्वचालन बढ़ रहा है। लेकिन तकनीकी बदलाव केवल रोज़गार समाप्त नहीं करता, नए रोज़गार के अवसर भी पैदा करता है। पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के कारण ग्रीन जॉब्स का क्षेत्र तेज़ी से महत्वपूर्ण हो रहा है। सौर ऊर्जा संयंत्रों में इंस्टॉलेशन और रखरखाव, विंड टर्बाइन संचालन, ऊर्जा प्रबंधन और आधुनिक विद्युत ग्रिड जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित तकनीशियनों की ज़रूरत बढ़ रही है। इसी तरह इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ते उपयोग से बैटरी रिपेयरिंग, इलेक्ट्रिक मोटर, बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम और स्मार्ट चार्जिंग जैसे क्षेत्रों में नए अवसर पैदा हो रहे हैं। कृषि क्षेत्र में ड्रोन से फसल सर्वेक्षण, सटीक कीटनाशक छिड़काव, सेंसर आधारित सिंचाई और हाइड्रोपोनिक्स जैसी तकनीकें ग्रामीण युवाओं के लिए रोज़गार के नए रास्ते खोल सकती हैं। साइबर सुरक्षा, डेटा एनालिटिक्स और अन्य तकनीकी क्षेत्रों में भी प्रशिक्षित लोगों की मांग बढ़ रही है। 
इतने बड़े देश में बेरोज़गारी और कौशल की समस्या का समाधान केवल सरकारी बजट और योजनाओं से नहीं हो सकता। उद्योग जगत को भी इसमें सक्रिय भूमिका निभानी होगी। कालेजों में पढ़ाई और उद्योग की वास्तविक ज़रूरतों के बीच तालमेल बढ़ाने के लिए विद्यार्थियों को व्यावहारिक अनुभव देना ज़रूरी है। विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम निर्धारण में उद्योग जगत के विशेषज्ञों को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि बदलती तकनीक और रोज़गार बाज़ार की ज़रूरतों के अनुसार पाठ्यक्रम समय-समय पर अपडेट होते रहें।चुनौती केवल नई नौकरियां पैदा करने की नहीं, बल्कि शिक्षा, कौशल और रोज़गार के बीच मज़बूत और व्यावहारिक संबंध स्थापित करने की भी है।
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