विकसित भारत का सपना और प्रतिभा पलायन

आज़ादी के आठ दशक पूरे होने की ओर अग्रसर भारत आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। वर्ष 2047 में देश अपनी स्वतंत्रता का शताब्दी वर्ष मनाएगा। इसी को ध्यान में रखते हुए 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प लिया गया है। प्रधानमंत्री से लेकर आम नागरिक तक, सब इस स्वप्न को साकार करने के प्रयासों में जुटे हैं। इस स्वप्न के समांतर एक यक्ष प्रश्न लगातार हमारी सामूहिक चेतना को झकझोर रहा है—यदि हम वास्तव में विश्व के शीर्ष विकसित देशों की कतार में खड़े होना चाहते हैं, तो वे कौन-सी खामियां हैं जो आज भी हमें गरीबी, अवसरों की कमी और सामाजिक विषमता के भंवर से बाहर नहीं निकलने दे रही हैं? क्या केवल आर्थिक आंकड़ों की वृद्धि से कोई देश विकसित बन सकता है, या इसके लिए सामाजिक और नीतिगत नींव का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है?
दुनिया के तमाम विकसित देशों के इतिहास और वर्तमान ढांचे का अध्ययन करें, तो एक मौलिक सत्य उभरकर सामने आता है। समृद्ध राष्ट्रों में प्रशासनिक, शैक्षणिक अथवा व्यावसायिक क्षेत्रों में चयन का प्राथमिक मानदंड केवल और केवल प्रतिभा होता है। वहां जाति, नस्ल या जन्म के आधार पर संवैधानिक रूप से किसी के साथ न तो भेदभाव किया जाता है और न ही योग्यता को दरकिनार कर विशेषाधिकार बांटे जाते हैं। इसके विपरीत भारत में जब मेधा और योग्यता को दरकिनार कर अवसर बांटे जाते हैं, तो उसका परिणाम प्रतिभा पलायन के रूप में सामने आता है।
आज यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है कि दुनिया की सबसे दिग्गज टेक कंपनियों को ऊंचाई पर ले जाने वाले भारतीय मूल के लोग ही हैं। हमारे देश के मेधावी युवा, जिन्हें स्वदेश में अपनी योग्यता और कठोर परिश्रम के अनुरूप सम्मान और अवसर नहीं मिल पाते, वे विदेश की ओर रुख कर लेते हैं। दुनिया के विकसित राष्ट्र प्रतिभा का स्वागत करते हैं, उसकी कद्र करते हैं और उसे पल्लवित होने का माहौल देते हैं। परिणामस्वरूप, भारत की प्रतिभाएं दूसरे देशों को महाशक्ति और विकसित राष्ट्र बनाने में अपना अमूल्य योगदान देती हैं जबकि हमारा अपना देश अपनी ही प्रतिभा, अपने मानव संसाधन से वंचित रह जाता है। यह एक अत्यंत दुखद विरोधाभास है कि हम विकसित भारत का सपना तो देख रहे हैं, परंतु उस सपने को सच करने वाले प्रतिभाशाली मस्तिष्कों को बाहर जाने पर मजबूर कर रहे हैं। राजनीतिक वर्ग और सरकारों को इस कड़वी सच्चाई का सामना करना ही होगा कि हमारी नीतियां देश को जोड़ने और मेधा को प्रोत्साहन देने के बजाय वोट बैंक के आधार पर समाज को विभाजित करने की ओर अधिक केंद्रित हो गई हैं। 
आज देश का युवा नीति, सिद्धांत और उद्देश्य से भटकता हुआ प्रतीत हो रहा है। योग्यता की उपेक्षा ने युवाओं में गहरी निराशा और दिशाहीनता पैदा की है जिससे उनकी ऊर्जा सकारात्मक राष्ट्र-निर्माण में लगने के बजाय अनावश्यक सामाजिक संघर्षों में व्यर्थ हो रही है।
विकसित भारत का लक्ष्य केवल एक आकर्षक नारा या रात में देखा गया सुंदर सपना बनकर न रह जाए, इसके लिए आज ही कठोर और साहसिक निर्णय लेने की आवश्यकता है। नेताओं, सरकार और संपूर्ण समाज को इस आत्मघाती व्यवस्था पर गंभीर चिंतन करना होगा। यदि हमें वास्तव में 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है, तो हमें प्रतिभा के सम्मान की संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। हमें ऐसे वातावरण का निर्माण करना होगा जहां योग्यता को उसकी जाति नहीं, बल्कि उसकी क्षमता और समर्पण के आधार पर पहचाना जाए। जब देश की नीति और नीयत में प्रतिभा को सर्वोच्च सम्मान मिलेगा, तभी प्रतिभा पलायन रुकेगा और हमारे देश के युवा अपनी मातृभूमि को विश्व की सर्वोच्च आर्थिक व बौद्धिक शक्ति बना सकेंगे। बुनियादी कमियों को नज़रअंदाज़ करके केवल नारों के बल पर विकसित भारत का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। (अदिति)

#विकसित भारत का सपना और प्रतिभा पलायन