हिन्दू संस्कृति का पुरातन नगर है भुवनेश्वर
भवन-ईश्वर से भुवनेश्वर शब्द बनता है जिसका शाब्दिक अर्थ है ईश्वर का निवास। वर्तमान उड़ीसा राज्य की राजधानी भुवनेश्वर पर्यटन का महत्वपूर्ण केंद्र बिन्दु बन गया है जहां कलात्मकता के साथ-साथ प्राकृतिक और धार्मिकता का वातावरण बिखरा पड़ा है। भुवनेश्वर में एक समय में मंदिरों की तादाद बहुत अधिक थी जो आज घटते-घटते पांच सौ के करीब रह गई है। भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर विश्व प्रसिद्ध है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार लिट्टी और वसा नाम के दो भयंकर राक्षसों का देवी पार्वती ने यहीं पर वध किया था तब संग्राम के समय देवी पार्वती को तीव्र प्यास लगने के कारण भगवान शिव ने एक कूप बनाकर सभी पवित्र नदियों को उनके योगदान के लिए बुलाया था जो कालान्तर में बिन्दु सरोवर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
अनादिकाल से भुवनेश्वर शैव संप्रदाय का मुख्य केन्द्र रहा है। काशी की तरह ही यहां शिव मंदिरों की अधिकता है। इसी कारण से इसे लोग गुप्त काशी भी कहते हैं। कहीं-कहीं इसे शाम्भव क्षेत्र भी कहा गया है। पुराणों में इसे एकाम्र क्षेत्र कहा गया है। हावड़ा वाल्टेयर लाइन पर कटक खुरदा रोड के बीच में कटक से 18 मील दूर भुवनेश्वर स्थित है जो अपने प्राचीनतम नाम कलिंग से भी जाना जाता है। भुवनेश्वर में कई दर्शनीय स्थल हैं।
लिंगराज मन्दिर : यह मंदिर शैव और विष्णु दोनों को समर्पित है। मंदिर का मुख्य विग्रह आठ फिट मोटा तथा करीब एक फुट ऊंचा ग्रेनाइट से बना है जो आधा शिव आधा विष्णु है। यह विग्रह चपटा तथा अगठित विग्रह हैं। मूल रूप से बुद-बुद लिंग है। शिला में बुदबुदाकार उठे हुए अंकुर भागों को बुद-बुद लिंग कहा जाता है। यह चक्राकार होने से हरि-हरात्मक लिंग माना जाता है, इसी कारण से यहां हरि-हर मंत्रा से पूजा की जाती है। कुछ लोगों की मान्यता है कि यह लिंग त्रिभुजाकार है। इस कारण से इसे हरगौर्यात्मक तथा आकार में बड़ा होने के कारण कालरूद्रात्मक भी कहा जाता है। यहां भक्तगणों को शिवलिंग को छूने की छूट है। वे स्वयं इसकी पूजा कर सकते हैं। एक विशेषता यहां की और भी है कि अन्य स्थानों पर मुख्य आयुध के रूप में त्रिशूल का ही अस्तित्व रहता है जबकि यह हिन्दुस्तान का पहला मंदिर है जहां मुख्य आयुध धनुष है। यह मंदिर ऊंचे परकोटे के भीतर विद्यमान है। मंदिर में चारों ओर चार द्वार हैं। मुख्य द्वार जो सिंहद्वार कहलाता है, उसमें प्रवेश करने पर भगवान गणेश का मंदिर है। आगे नन्दी स्तम्भ है उसके आगे भोग मंडप है। फिर नाट्य मंदिर व मुखशाला हैं। इसके आगे श्रीमंदिर है।
मंदिर की पूजा पद्धति के अनुसार सर्वप्रथम बिन्दु सरोवर में स्नान किया जाता है। फिर वासुदेव के दर्शन किये जाते हैं, पश्चात गणेश पूजा और गोपालनी देवी तथा उसके पश्चात् शिवजी के वाहन नंदी की पूजा और फिर लिंगराज की पूजा की जाती है। लिंगराज मंदिर लम्बे-चौड़े कैम्पस में स्थित है जिसमें और भी कई मंदिर हैं। पूरा मंदिर कैम्पस स्थापत्य कला की भव्यता से ओत-प्रोत है। सूक्ष्म नक्काशी, उत्कृष्ट मूर्ति कला का यह मंदिर जीता जागता नमूना है। इस मंदिर में कलिंग और द्रविड़ स्थापत्य कला तथा बौद्धकाल का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। लिंगराज मंदिर में सनातन विधि से पूरे चौबीस घंटे पूजा होती रहती है।
बिन्दुसागर झील : यह सुविस्तृत सरोवर है जो 1300 फुट लम्बा तथा 700 फुट चौड़ा है। इसके चारों ओर पत्थर लगे हैं। समस्त तीर्थों का जल इसमें डाला गया है। यह बहुत पवित्र माना जाता है। सरोवर के बीच में एक मंदिर अवस्थित है। वैशाख के महीने में यहां चंदन यात्रा का उत्सव होता है।
खण्डगिरि व उदयगिरि गुफाएं : भुवनेश्वर से 8 किमी. दूर पश्चिमी-उत्तरी भाग में खंडगिरि व उदयगिरि की गुफाएं अवस्थित हैं। खण्डगिरि एक सौ तैंतीस तथा उदयगिरि एक सौ अठारह पुट ऊंची है। उदयगिरि की गुफाओं में बौद्ध धर्म का प्रभाव दृष्टिगत होता है जबकि खण्डगिरि की गुफाओं में जैन धर्म की झलकियां दृष्टिगत हैं। यह चट्टानों को काटकर बनाई गई हैं। अलग-अलग आकृतियों की उक्त गुफाएं दो हजार साल पुरानी हैं। उदयगिरि में जहां 18 गुफाएं हैं वहीं खंडगिरि में 11 गुफाएं हैं। दीवारों की नक्काशी वशिलालेख दर्शनीय हैं।
धौली : यह भुवनेश्वर से 8 किमी. दूर स्थित है। यह वही स्थान है जिस पहाड़ी पर सम्राट अशोक को ले जाकर बौद्ध भिक्षु ने कलिंग युद्ध में मारे गये लोगों के जीवन की वास्तविकता पर प्रकाश डाला था। सम्राट अशोक पर बौद्ध भिक्षुक का इतना प्रभाव पड़ा कि उसकी सोच हाथों-हाथ ही बदल गई और बाद में उसने युद्ध न करने की प्रतिज्ञा की। इस प्रकार संसार को एक नया धर्म प्रचारक मिला जिसने भारत से बाहर भी बौद्ध धर्म का प्रचार किया।
नन्दन कानन वन : भुवनेश्वर से 25 किमी. दूर 400 हैक्टेयर भूमि में फैला नन्दन कानन वन उड़ीसा का प्रसिद्ध वानस्पतिक उद्यान है जहां झील के साथ चिड़ियाघर है। सुबह 10 बजे से सायं पांच बजे तक उचित मूल्य लेकर गाड़ियों में बिठाकर सैलानियों को घुमाया जाता है। यह उद्यान सफेद बाघाें के लिए प्रसिद्ध है। उद्यान में शेर, तेंदुए, भूरे भालू, काले भालू, घड़ियाल, अजगर, किंग कोबरा सहित अन्य जानवर हैं। कई किस्मों के स्वदेशी पौधों तथा विभिन्न प्रकार के पेड़ों की सुगंध एवं हरियाली से यहां का प्रत्येक दृश्य रोमांचित करता है।
संग्रहालय : वैसे तो भुवनेश्वर में तीन संग्रहालय है मगर राज्य संग्रहालय की कुछ बात ही निराली है। यह शहर के बीच में स्थित है। यहां प्राचीन कलाकृतियां, प्राचीन हथियारों, स्थानीय शिल्पकला, कबिलाई परंपरा इत्यादि से संबंधित संग्रहीत वस्तुओं को देखा जा सकता है। सिक्कों, शिलालेखों, ताम्बे, कांसे की प्लेटों, ताड़ पत्रों पर लिखी पाण्डुलिपियों आदि को देखकर के उड़ीसा के वैभव को स्वीकार किया जा सकता है। उड़ीसा रेल, सड़क एवं वायु मार्ग से देश के विभिन्न भागों से जुड़ा हुआ है। राजधानी भुवनेश्वर में ठहरने व खाने-पीने का उचित बंदोबस्त है। (उर्वशी)





