शब्दों से परे

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अगले दिन सुबह फिर काव्या उठी। उसने फोन उठाया। स्क्रीन पर कई नोटिफिकेशन थे, लेकिन वह खास संदेश नहीं था जैसा हर सुबह सात बजे आता था। काव्या को थोड़ा अजीब सा लगा। उसने समीर का चैट खोला। आखिरी संदेश दो दिन पुराना था। काव्या ने सोचा कि शायद समीर बीमार होगा या किसी काम में बहुत व्यस्त होगा। उसने खुद कोई संदेश नहीं भेजा और अपने काम के लिए निकल गई।
तीन दिन बीत गए। चार दिन बीत गए। पूरा एक सप्ताह गुजर गया। समीर की तरफ से कोई संदेश नहीं आया। समीर ने खुद को बहुत सख्ती से रोक रखा था। कई बार सुबह उठकर उसकी उंगलियां अपने आप काव्या का नाम फोन में तलाशने लगती थीं, लेकिन वह खुद को यह याद दिलाकर रोक लेता था कि काव्या को उसकी कोई परवाह नहीं है।
लेकिन दूसरी तरफ काव्या के भीतर एक अजीब सी हलचल शुरू हो गई थी। हर सुबह जब वह अपना फोन उठाती, तो उसकी आंखें अनजाने में ही उस एक संदेश को तलाशने लग जाती थीं। वह संदेश जो कभी उसे एक अनावश्यक औपचारिकता लगता था, आज उसकी अनुपस्थिति उसे बेचैन कर रही थी। काव्या को महसूस होने लगा कि उसकी सुबह की शुरुआत अधूरी सी है। वह कॉफी पीते हुए अक्सर समीर के पुराने संदेशों को स्क्रॉल करके देखने लगी। उसने ध्यान दिया कि कैसे हर सुबह समीर ने बिना नागा किए उसे याद किया था। उसने महसूस किया कि कैसे समीर के उन छोटे-छोटे शब्दों में एक अनकही परवाह छिपी होती थी। काव्या को खुद पर गुस्सा आने लगा कि उसने कभी उस इंसान के प्रयासों की कद्र नहीं की, जिसने लगातार उसे एक सकारात्मक ऊर्जा देने की कोशिश की थी।
आठवें दिन की सुबह काव्या से रहा नहीं गया। उस सुबह शहर में हल्की बारिश हो रही थी। मौसम में एक अजीब सी उदासी और साथ ही एक सुकून भी था। काव्या ने अपनी बालकनी में खड़े होकर बारिश को देखा और फिर एक गहरी सांस लेकर अपना फोन उठाया। उसने समीर का चैट खोला और टाइप करना शुरू किया। उसकी उंगलियां थोड़ी कांप रही थीं। उसने बस इतना लिखा, आज गुड मॉर्निंग नहीं भेजा?
समीर उस समय अखबार पढ़ रहा था। फोन की स्क्रीन रोशन हुई। उसने काव्या का नाम देखा तो उसके चेहरे पर एक आश्चर्य भरी मुस्कान आ गई। उसे यकीन नहीं हुआ कि काव्या ने खुद उसे संदेश भेजा है। उसने संदेश पढ़ा और उसके मन का सारा संशय एक पल में धुल गया। समीर ने मुस्कुराते हुए तुरंत टाइप किया और जवाब भेजा, मैंने सोचा कि जब मैं संदेश नहीं भेजूंगा, तो आपको मेरी कमी महसूस ही नहीं होगी। मुझे लगा कि शायद मेरे संदेश आपको परेशान करते हैं?
काव्या उस जवाब को देखकर एक पल के लिए निशब्द रह गई। उसकी आंखों में हल्की सी नमी आ गई थी। उसने महसूस किया कि कैसे हम अक्सर उन चीजों और उन लोगों को बहुत हल्के में ले लेते हैं जो हमारे जीवन में बिना किसी शोर-शराबे के मौजूद रहते हैं। काव्या ने अपने दिल की बात को शब्दों में पिरोया और जवाब दिया, कुछ लोगों की आदत इतनी प्यारी होती है कि उनके बिना पूरा दिन अधूरा सा लगता है। मुझे पहले कभी एहसास नहीं हुआ, लेकिन पिछले एक हफ्ते से मेरी सुबह-सुबह जैसी नहीं लग रही थी। आपकी उस छोटी सी आदत ने मेरी ज़िंदगी में एक बहुत खूबसूरत जगह बना ली थी, जिसका मुझे खुद भी अंदाजा नहीं था।
समीर यह पढ़कर बहुत भावुक हो गया। उसने कभी नहीं सोचा था कि उसका वह छोटा सा प्रयास काव्या के दिल में इतनी जगह बना लेगा। उसने काव्या को जवाब दिया, मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई काव्या। कभी-कभी हमें लगता है कि हमारे छोटे कदमों का कोई मोल नहीं, लेकिन आज आपने मुझे अहसास दिलाया कि खामोश प्रयासों की भी गूंज होती है।
उस सुबह दोनों ने अपने-अपने घरों की बालकनी में खड़े होकर बारिश को देखा। भले ही वे मीलों दूर थे, लेकिन उस दिन उनके बीच की सारी दूरियां खत्म हो गई थीं। उस एक पल ने उनको यह समझा दिया था कि रिश्ते सिर्फ बड़े-बड़े वादों, लंबी मुलाकातों या बहुत सारे शब्दों से नहीं बनते। रिश्ते तो उन छोटे-छोटे एहसासों, उस निरंतर परवाह और उन अनकही आदतों से बनते हैं जो धीरे-धीरे हमारी रूह का हिस्सा बन जाते हैं। उस दिन के बाद से उनकी सुबह कभी अधूरी नहीं रही। (सुमन सागर) (समाप्त) 

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