बुढ़िया के बाल की कहानी क्या है ?
‘दीदी, क्या आपने कभी एक पतली सी लकड़ी पर गोल गोल लपेटे हुए बुढ़िया के बाल खाये हैं?’
‘तुम कॉटन कैंडी की बात कर रहे हो। अरे वो तो मैंने बचपन में बहुत खायी है, खासकर मेलों में घूमते हुए।’
‘हां, मुंह में घुल जाने वाली ये कैंडी आज भी गली-मोहल्लों में मिल रही है, जो बच्चों की तो फेवरेट है ही, लेकिन मैंने इसे बड़ों को भी बहुत चाव से खाते हुए देखा है।’
‘पर क्या तुम इसके बनने की कहानी जानते हो? क्या तुम्हें मालूम है कि किसने रुई जैसी दिखने वाली इस मीठी सी कॉटन कैंडी का अविष्कार किया?’
‘नहीं, बताइये?’
‘दरअसल, कॉटन कैंडी जिसे हम भारतीय बुढ़िया के बाल कहते हैं, सबसे पहले अमरीका में बनी थी।’
‘और किसने इसे बनाया था?’
‘विलियम्स जेम्स मोरिसन नाम के एक डेंटिस्ट थे। उन्हें नई-नई चीजों को ईजाद करने का शौक था। उन्होंने ही कॉटन कैंडी का अविष्कार किया था।’
‘किस सन में?’
‘साल 1897 में मोरिसन ने जॉन सी व्हार्टन नामक एक हलवाई के साथ मिलकर एक मशीन का अविष्कार किया। इस अनोखी मशीन में ही गर्म चीनी घुमाकर कैंडी तैयार की जाती थी।’
‘और इसका नाम कॉटन कैंडी रखा।’
‘नहीं, मोरिसन ने मशीन को फेयरी फ्लॉस के नाम से पेटेंट कराया था, जिसका मतलब है परियों का सूती धागा।’
‘फिर इसका नाम कॉटन कैंडी कैसे पड़ा?’
‘मोरिसन ने तो कैंडी का नाम फेयरी फ्लॉस ही रखा था, लेकिन फिर 1920 में एक अन्य डेंटिस्ट डॉ. जोसफ लास्को ने एक ऐसी ही मिलती-जुलती मशीन बनायी और कैंडी को एक सरल नाम दिया कॉटन कैंडी। डॉ. जोसफ की मशीन की बनी कैंडी बिल्कुल रुई जैसी थी, जिस वजह से लोगों ने भी इस नाम को अपना लिया। शुरू-शुरू में यह कैंडी सफेद रंग में बिकती थी, संभवत: इसी वजह से भारत में इसे बुढ़िया के बाल कहा गया। आज तो इसकी पहचान हल्के गुलाबी और नीले रंग से जुड़ गई है।’
‘वैसे ये पॉपुलर कैसे हुई?’
‘मोरिसन ने अपनी मशीन को 7 माह तक चलने वाले मेले में रखा, 68,000 कैंडी बेचीं और 5 लाख डॉलर कमाये।’
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर

