मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध तेज़ होता आन्दोलन

विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन का नया राजनीतिक आख्यान यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मोहरे हैं, जिनके ज़रिए भारत के चुनावी लोकतंत्र को अगुवा कर लिया गया है। इसलिए इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि भाजपा सीईसी ज्ञानेश कुमार और प्रधानमंत्री मोदी का बचाव करने की पूरी कोशिश कर रही है, क्योंकि अब प्रधानमंत्री मोदी सीधे तौर पर ‘इंडिया’ गठबंधन के निशाने पर हैं। 2 अक्तूबर से सीईसी के विरोध में आन्दोलन तेज़ हो गया है, जो पूरे हफ्ते यानी 8 अक्तूबर तक चलेगा। इसके अलावा भारत के सर्वोच्च न्यायालय और अन्य उच्च न्यायालयों, खासकर बॉम्बे उच्च न्यायालय में सीईसी और मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर)  के खिलाफ कई मामलों की सुनवाई होगी।
इसके साथ हीए सीईसीऔर ईसी (चुनाव आयोग) की नियुक्ति के लिए 2023 के अधिनियम से जुड़े मामले में एक नया मोड़ आया है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के एक जज ने बंटा हुआ फैसला दिया था, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से कानून के तहत सीईसी को उनकी नियुक्ति के मामले में भी मदद मिली। आरोप है कि जज का बेटा सीईसी के वकीलों के पैनल में शामिल हैं। मामला इसलिए भी पेचीदा है क्योंकि उसी जज ने हाल ही में सीईसी ज्ञानेश कुमार की बेटी और नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम को राहत देते हुए एक फैसला सुनाया था। उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा लगाई गई सख्त टिप्पणियों और 5 लाख रुपये के जुर्माने पर रोक लगा दी थी। हाई कोर्ट ने नोएडा में मज़दूरों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान शामिल एक छात्रा, क्टिविस्ट को एनएसए के तहत हिरासत में लिए जाने के मामले को रद्द कर दिया था।
हालांकि आम धारणा यह है कि सीईसी ज्ञानेश कुमार अब तक सर्वोच्च न्यायायल और उच्च न्यायालयों में अपने और अपने निर्णयों से जुड़े मामलों को सफलतापूर्वक संभालते रहे हैं। लेकिन आने वाले कुछ दिनों में उन्हें बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है जब इन मामलों की सुनवाई होगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके कई फैसलों को बाकी दो चुनाव आयुक्तों ने भी ‘ग़ैर-कानूनी’ और ‘बिना अधिकार के लिए गए फैसले’ बताया था, जबकि उन्होंने अपने फैसलों को ईसीआई के सर्वसम्मत फैसले के तौर पर पेश किया था। 2 अक्तूबर के बाद जब सीईसी के खिलाफ आन्दोलन तेज़ हो गया है, तो इसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दे रही है। इसमें न सिर्फ इंडिया ब्लॉक की पार्टियां, बल्कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) के बैनर तले जेन-जेड, सिविल सोसाइटी और आम लोग भी बड़ी संख्या में शामिल हो रहे हैं।
सीईसी के खिलाफ यह आंदोलन, जो असल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाता है, अब एक नए और मज़बूत चरण में प्रवेश कर रहा है। पहले वोट चोरी का मुद्दा सिर्फ कांग्रेस का था, लेकिन अब यह पूरे ‘इंडिया’ ब्लॉक का मुद्दा बन गया है। इस हफ्ते 2 से 8 अक्तूबर तक देशव्यापी ‘लोकतंत्र बचाओ’ विरोध प्रदर्शन होंगे, 6 अक्तूबर को विपक्षी सांसद ईसीआई तक मार्च करेंगे, सीजेपी ने 2 अक्तूबर से ‘जेल भरो’ आन्दोलन और प्रदर्शन शुरू कर दिया है, और देश के सभी ज़िलों में कई अन्य विरोध रैलियां होंगी।
चुनावी आख्यान में बदलाव साफ दिख रहा है। अगले साल की शुरुआत में होने वाले अहम राज्य चुनावों से ठीक पहले ‘वोट चोरी’ का नारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाता है। विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार को हटाने के साथ-साथ प्रधान मंत्री के इस्तीफे की भी मांग की है। ‘इंडिया’ ब्लॉक ने इस आन्दोलन को न सिर्फ सड़कों पर, बल्कि संसद और अदालतों तक भी ले जाने की योजना बनाई है। वे ‘सीईसी और अन्य ईसी नियुक्ति अधिनियम 2023’ की धारा 16 को भी चुनौती देने की योजना बना रहे हैं, जो सीईसी को मुकद्दमों या उनके खिलाफ कार्रवाई से आजीवन सुरक्षा देती है। यह हफ्ता सीईसी ज्ञानेश कुमार के लिए मुश्किल भरा होगा, क्योंकि उन्हें  ईसीआई (भारतीय चुनाव आयोग) के भीतर संस्थागत अलगाव महसूस हो रहा है। वहां दो चुनाव आयुक्त उनके सभी फैसलों का समर्थन नहीं कर रहे हैं, खासकर उन फैसलों का जो ‘गैर-कानूनी’ और ‘अनधिकृत’ हैं। विश्वसनीयता खोने के कारण, उन्हें आयोग के भीतर, न्यायपालिका में और देश भर में राजनीतिक स्तर पर मामलों से निपटने में मुश्किल होगी। उनके अतीत, वर्तमान और भविष्य के कामों की जांच न्यायपालिका, राजनीतिक दलों, सिविल सोसाइटी और उन सभी लोगों द्वारा की जाएगी जो देश के चुनावी लोकतंत्र की रक्षा करना चाहते हैं। इसलिए सीईसी के लिए सबसे बड़ी समस्या ज़रूरी नहीं कि विरोध प्रदर्शन ही हों। अब यह साबित करने की ज़रूरत बढ़ती जा रही है कि आयोग के फैसले स्वतंत्र जांच, अंदरूनी असहमति, न्यायिक जांच और जनता की नज़र में खरे उतर सकते हैं।
इस हफ्ते न्यायिक घटनाक्रम इसलिए भी अहम हैं क्योंकि तीन अलग-अलग कानूनी सवाल अब एक साथ आ गए हैं—1. ईसीआई और सीईसीका संवैधानिक दर्जा और सामूहिक कामकाजए, 2. नियुक्तियों से जुड़े 2023 के कानून की वैधता और 3. क्या एसआईआर के फैसले और वोटरों के नाम हटाने का काम असल में कानूनी तौर पर ज़रूरी संस्थागत प्रक्रिया के ज़रिए किया गया था। सुप्रीम कोर्ट इन्हीं सवालों की जांच करने के लिए सहमत हो गया है, जिसमें सीईसी ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग वाली याचिका भी शामिल है। सीईसीऔर ईसीकी नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून का मामला भी दूसरे न्यायिक चरण में पहुंच गया है, जिसमें 23 सितम्बर के बंटे हुए फैसले में एक नया मोड़ आया है। सुप्रीम कोर्ट में एक क्यूरेटिव याचिका दायर की गई है, जिसमें पीठ में शामिल दो जजों में से एक के बेटे की भूमिका का आरोप लगाया गया है।
वोटरों के नाम हटाने का मुद्दा अब और भी खास हो गया है। क्या ईसीआई ने वोटरों के नाम हटाते समय कानूनी प्रक्रिया और सुरक्षा उपायों का पालन किया? क्या ईसीआई ने अपने नियमों का पालन किया? क्या ईसीआई के फैसले असल में तीन-सदस्यीय आयोग के फैसले थे? ऐसे और भी सवाल हैं।
5 अक्तूबर को बॉम्बे उच्च न्यायालय की सुनवाई भी अहम है, क्योंकि इसमें इस सवाल की जांच की जाएगी कि महाराष्ट्र के एसआईआर में असल में क्या हुआ था और क्या ईसीआई के विवादित आदेश प्रक्रिया या कानून के हिसाब से सही थे? गोवा पीठ इस बात की जांच कर रही है कि क्या अलग-अलग वोटरों के नाम असल में कानूनी प्रक्रिया के ज़रिए हटाए गए थे? कलकत्ता, तेलंगाना और दूसरे हाई कोर्ट इस सवाल की जांच कर रहे हैं कि वोटर लिस्ट गलत होने पर किसी वोटर के पास क्या उपाय है? इन सभी मामलों के नतीजे सीईसी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़ी चर्चा पर और असर डालेंगे। (संवाद)

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