चुनाव आयोग द्वारा चुनावों के लिए तैयारी शुरू
देश में अगले वर्ष की शुरुआत में पांच राज्यों के होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए राजनीतिक गतिविधियां बहुत तेज़ हो गई हैं। अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों द्वारा अपनी-अपनी रणनीति बनाई जा रही है और उन मुद्दों की निशानदेही की जा रही है, जिनको लेकर उन्होंने चुनाव मैदान में उतरना है। राजनीतिक पार्टियों द्वारा अपने उम्मीदवारों का चयन करने के साथ-साथ राजनीतिक गठबंधन के बारे में भी चर्चा की जा रही है। उनके द्वारा अपने संगठित ढांचे को भी मजबूत और गतिशील बनाया जा रहा है। अगले वर्ष की शुरुआत में जिन पांच राज्यों में चुनाव होने हैं, उनमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा आदि शामिल हैं। उत्तर प्रदेश की विधानसभा का कार्यकाल 22 मई, 2027 को खत्म होने वाला है, जबकि पंजाब, मणिपुर, गोवा और उत्तराखंड की विधानसभाओं का कार्यकाल मार्च में खत्म होगा। इन राज्यों में एक साथ ही चुनाव होने की सम्भावनाएं बनी हुई हैं।
इसी दौरान चुनाव आयोग ने भी उपरोक्त राज्यों में चुनाव करवाने के लिए अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। चुनाव आयोग द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार उसकी टीमें उपचुनाव कमिश्नरों के नेतृत्व में चुनाव वाले राज्यों का निरीक्षण करेंगी। इस दौरे की शुरुआत अक्तूबर माह में गोवा से होगी। इसके बाद चुनाव आयोग की टीम उत्तराखंड पहुंचेगी और अक्तूबर के तीसरे सप्ताह पंजाब का दौरा करेगी। चुनाव आयोग का यह आम अभ्यास है कि चुनावों की तिथियों की घोषणा करने से पहले वह चुनाव वाले राज्यों में अपनी तैयारियों का निरीक्षण करता है। इन तैयारियों में जहां अलग-अलग स्तर पर प्रशासनिक नियुक्तियों को देखा जाता है, वहीं चुनाव आयोग के तकनीकी अधिकारी वोटिंग मशीनें (वी.वी.एम्स) का भी निरीक्षण करते हैं।
नि:संदेह 5 राज्यों के होने वाले ये चुनाव राजनीतिक तौर पर बड़ा महत्व रखते हैं। इनसे राजनीतिक पार्टियों को 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव के संदर्भ में देश के राजनीतिक माहौल को समझने में मदद मिलेगी। विशेषकर देश के बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के चुनाव सत्तारूढ़ भाजपा, समाजवादी पार्टी तथा कांग्रेस के लिए विशेष महत्व रखते हैं। दूसरी ओर ये चुनाव, चुनाव आयोग के लिए भी एक बड़ी परीक्षा की तरह होंगे, क्योंकि विगत समय में बिहार तथा पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों संबंधी कई विवाद पैदा हुए थे। विशेषकर मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण संबंधी मुद्दों के बारे में अभी भी देश में ज्वलंत चर्चा हो रही है। चुनाव आयोग को इस संबंध में जहां सुप्रीम कोर्ट में जवाब देना पड़ रहा है, वहीं विपक्षी राजनीतिक पार्टियों द्वारा भी उसकी भूमिका को लेकर लगातार प्रश्न उठाए जा रहे हैं। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में चुनाव और मतदाताओं के अधिकारों का क्या महत्व है, इसका अनुमान सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश उजल भूइयां द्वारा एक जनसमूह को सम्बोधित करते हुए दिए गए ताज़ा बयानों से भी लगाया जा सकता है। उन्होंने कहा है कि भारतीय संविधान में दो तरह के नागरिक नहीं हो सकते, अर्थात् एक मताधिकार वाले तथा एक मताधिकार के बिना। उन्होंने कहा कि यदि मतदाता सूचियां तैयार करते समय प्रत्येक योग्य नागरिक का मताधिकार सुरक्षित नहीं रहता तो मतदाता सूचियों के गहन संशोधन को किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता।
चल रहे इस पूरे घटनाक्रम के संदर्भ में चुनाव आयोग की यह बड़ी ज़िम्मेदारी है कि विधानसभाओं के आगामी चुनावों में किसी भी तरह की कमियां न रहें और विशेषकर मतदाता सूचियों के गहन संशोधन के बाद यदि किसी भी कारण कुछ मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों में शामिल नहीं हो सके तो उनके नाम पुन: मतदाता सूचियों में शामिल करने के लिए चुनाव आयोग को चुनावों की घोषणा करने से पहले पहले विशेष यत्न करने चाहिएं, जिस प्रकार कि पिछले दिनों उसकी ओर से घोषणा भी की गई थी। हमें पूरी उम्मीद है कि 5 राज्यों के चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे और सभी योग्य मतदाताओं को उनमें अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने का अधिकार मिलेगा।

