चीन-पाक रक्षा गठजोड़ और भारत की रणनीतिक विवशता

दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य में शक्ति संतुलन तेजी से करवट बदल रहा है। पिछले कुछ समय में चीन और पाकिस्तान के बीच रक्षा और सामरिक सहयोग जिस आक्रामकता के साथ आगे बढ़ा है, उसने नई दिल्ली के सुरक्षा गलियारों में खतरे की घंटी बजा दी है। हाल ही में चीन द्वारा पाकिस्तान को पांचवीं पीढ़ी के अत्याधुनिक स्टेल्थ लड़ाकू विमान, विशेष रूप से जे-35 और जे-31 की आपूर्ति करने की खबरें और पाकिस्तानी पायलटों की चीनी वायुसेना के साथ बढ़ती संयुक्त ट्रेनिंग महज एक द्विपक्षीय सैन्य सौदा नहीं है। यह भारत की संप्रभुता, हवाई श्रेष्ठता और दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए एक सीधी और गंभीर चुनौती है। भारतीय वायुसेना के नेतृत्व ने भी इस उभरते खतरे को खुले तौर पर स्वीकार किया है। आज भारत के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि वह एक तरफ  घटती हुई लड़ाकू विमानों की स्क्वाड्रन क्षमता और दूसरी तरफ  दो मोर्चों पर युद्ध की वास्तविक होती आशंका के बीच अपनी सैन्य संप्रभुता को कैसे अक्षुण्ण बनाए रखे। 
ऐतिहासिक रूप से भारत ने पारंपरिक सैन्य मोर्चे पर हमेशा पाकिस्तान के खिलाफ एक गुणात्मक और संख्यात्मक बढ़त बनाए रखी है। यहा तक कि हाल के वर्षों में फ्रांस से मिले 4.5 पीढ़ी के राफेल विमानों ने पाकिस्तान की वायुसेना के अमरीकी एफ.-16 विमानों पर भारत को एक स्पष्ट मनोवैज्ञानिक और तकनीकी बढ़त दे दी थी। लेकिन चीन द्वारा पाकिस्तान को पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट सौंपने की यह नई डील इस स्थापित संतुलन को पूरी तरह से बिगाड़ने की क्षमता रखती है।
पांचवीं पीढ़ी के विमानों की सबसे बड़ी खासियत उनका ‘स्टेल्थ’ होना होता है, यानी वे दुश्मन के रडार से बचकर बेहद करीब तक हमला करने में सक्षम होते हैं। यदि पाकिस्तान इन विमानों को अपनी वायुसेना में सफलतापूर्वक शामिल और संचालित कर लेता है, तो भारत की मौजूदा हवाई रक्षा प्रणालियों और राफेल जैसे विमानों की प्रभावशीलता पर एक गंभीर प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। चीन इस सौदे के जरिए न केवल भारत को पड़ोस में उलझा, रखना चाहता है, बल्कि वह भारतीय उपमहाद्वीप में अमरीकी प्रभाव और भारत की बढ़ती वैश्विक महत्वाकांक्षाओं को भी सीमित करना चाहता है। यह सौदा साफ  तौर पर दर्शाता है कि पाकिस्तान अब चीनी सेना के एक ‘प्रॉक्सी’ के रूप में काम कर रहा है, जिसका एकमात्र उद्देश्य भारत की सैन्य ऊर्जा को निरंतर सोखना है।
इस बाहरी खतरे के बीच भारत की सबसे बड़ी चिंता उसकी आंतरिक रक्षा तैयारियों की धीमी रफ्तार है। भारतीय वायुसेना को किसी भी दोहरे मोर्चे (चीन और पाकिस्तान) की चुनौती से निपटने के लिए कम से कम 42 लड़ाकू विमानों की स्क्वाड्रन की आवश्यकता स्वीकृत है। इसके विपरीत वर्तमान में यह संख्या खतरनाक रूप से घटकर महज 29 स्क्वाड्रन पर आ गई है। मिग-21 जैसे पुराने सोवियत कालीन विमानों के चरणबद्ध तरीके से बाहर होने और नए विमानों के शामिल होने की बेहद धीमी दर ने इस खाई को और चौड़ा कर दिया है।
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