विकास और विरासत की जंग लड़ रही पुस्तकें
बेघर होने के दर्द के एहसास से ही प्रत्येक की आंखें में आंसू आ जाते हैं, लेकिन उन खामोश पुस्तकों का क्या, जो दूसरों को ज्ञान देने का स्रोत तो हैं, लेकिन उनके पास अपना घर खोने की पीड़ा बयां करने के लिए कोई ज़ुबां नहीं हैं। यह पीड़ा है दिल्ली की 135 साल पुरानी केन्द्रीय सचिवालय पुस्तकालय की, जो अभी तक साढ़े आठ लाख से ज़्यादा पुस्तकों का सुरक्षित संरक्षक है और देश का दूसरा सबसे बड़ा पुस्तकालय है जो सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास प्रोजेक्ट के दायरे में आते शास्त्री भवन में स्थित है। इसी प्रोजेक्ट के तहत शास्त्री भवन को गिराया जाना तय हुआ है। जिसके कारण हाउसिंग एंड अर्बन मामलों के मंत्रालय ने सितम्बर के अंत तक सभी विभागों को शास्त्री भवन खाली करने का निर्देश दिया था। इसी कवायद के तहत अन्य सरकारी कार्यालर्यों को नए स्थानों पर स्थानांतरण कर दिया गया, लेकिन इस अमूल्य खज़ाने को स्थानांतरण करने के लिए कोई स्थायी जगह नहीं मिल रही, जिससे इन पुस्तकों के अस्तित्व, उनकी देख-रेख और भविष्य पर प्रश्च-चिन्ह लगे दिखाई रहे हैं। केन्द्रीय सचिवालय पुस्तकालय के ही क्षेत्रीय भाषाओं के अनुभाग (सैक्शन), जिसे तुलसी सदन पुस्तकालय कहा जाता है, के साथ पिछले डेढ़ दशक से चला आ रहा भेदभाव वाला रवैया अब भी जारी है। तुलसी सदन पुस्तकालय, मुख्य पुस्तकालय का ही हिस्सा है, जो मुख्य पुस्तकालय की तरह ही सांस्कृतिक मंत्रालय के अधीन आता है। तुलसी सदन पुस्तकालय में पंजाबी सहित 14 अन्य भाषाओं, जिनमें असमिया, बंगला, गुजराती, हिन्दी, कन्नड़, कश्मीरी, मलयालम, मराठी, उड़िया, संस्कृत, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं, की 2 लाख से ज़्यादा पुस्तकें हैं। इन भाषाओं की विरासत को संभाले हुए दो लाख से ज़्यादा पुस्तकें विगत 15 वर्षों से डिब्बों में बंद हैं।
तुलसी सदन पुस्तकालय को दिल्ली मेट्रो के मंडी हाउस स्टेशन के निर्माण हेतु वहां से हटाया गया था। क्षेत्रीय भाषाओं का यह अनुभाग 1972 में रामचरित मानस के 400 साल पूरे होने पर अस्तित्व में आया था और इसे भगवान दास रोड पर स्थित बहावलपुरी हाउस में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के परिसर में जगह दी गई थी। दिल्ली का मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन बनने के बाद तुलसी सदन पुस्तकालय का पता भी बदल गया और 2011 में पुस्तकालय बंद हो गया और विरासत का बोझ उठाने की ज़िम्मेदारी अब उन बंद डिब्बों के हिस्से आ गई, जो आर.के. पुरम की पहली मंज़िल स्थित एक कमरे में रखे गए हैं। एक अखबार के खुलासे के मुताबिक इन बंद बक्सों पर अब भी सामान एक जगह से दूसरी जगह ले जाने वाली कम्पनी का लोगो लगा हुआ है। उस कमरे (जहां क्षेत्रीय भाषाओं की पुस्तकें रखी गई हैं) तक पहुंचने के लिए भी सैंट्रल अडाप्शन रिसोर्स अथॉारिटी की अनुमति की ज़रूरत पड़ती है।
लगभग 15 वर्षों से डिब्बों में बंद पुस्तकों और तुलसी सदन पुस्तकालय की स्थिति बारे जवाबदेही के नाम पर सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा अलग-अलग वर्षों में अलग-अलग बयान दिए गए। मंत्रालय की 2011-12 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया कि मंडी हाउस में नए मेट्रो स्टेशन के निर्माण के लिए पुस्तकालय को अस्थायी रूप से अगस्त 2011 से बंद कर दिया गया। 2014-15 की वार्षिक रिपोर्ट में बदले हुए शब्दों में कहा गया कि मंडी हाउस में मेट्रो स्टेशन का निर्माण पूरा हो गया है, परन्तु इमारत के नवीनीकरण का काम चल रहा है। 2015-16 में स्थिति बारे बताते हुए मंत्रालय ने कहा कि पुस्तकालय जल्द ही खोला जाएगा क्योंकि नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा उसी परिसर में नई इमारत का निर्माण कर रहा है। लेकिन 2022-23 में क्षेत्रीय विरासत को बड़ा झटका तब लगा जब मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया कि दिल्ली मेट्रो के निर्माण की वजह से पुस्तकालय का यह हिस्सा 2010 से बंद ही है।
मिली जानकारी के मुताबिक असमिया और कन्नड़ भाषा का एक अनुभाग 25 दिसम्बर, 2023 को फिर से खोला गया था। पुस्तकों के एक हिस्से को पुन: उस समय बाहर निकाला गया था, जब संस्कृति बारे राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी ने इस अनुभाग का उद्घाटन किया था। ऐसे ही 11 मार्च, 2025 को शास्त्री भवन में स्थित केन्द्रीय सचिवालय पुस्तकालय में हिन्दी अनुभाग को आंशिक रूप से खोला गया था। सालों के अंतराल के बाद उठाए गए इन कदमों से उम्मीद जगी थी कि पुस्तकों का खज़ाना पूरी तरह भुलाया नहीं गया, लेकिन क्षेत्रीय भाषाओं की पुस्तकें अभी भी ‘आंशिक’ से ‘पूर्ण’ पुन: बहाल और स्थायी पते तक नहीं पहुंच पाई हैं। पहले इन तुलसी सदन की पुस्तकों को दिल्ली मेट्रो स्टेशन के निर्माम की वजह से पेटियों में बंद रखा गया, अब इन पुस्तकों समेत पूरे केन्द्रीय पुस्तकालय को दूसरे उजाड़े का सामना करना पड़ रहा है। केन्द्रीय सचिवालय पुस्तकालय शास्त्री भवन में चार मंज़िलों पर फैला हुआ है। 5500 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैली इमारत में साढ़े आठ लाख से ज़्यादा पुस्तकें हैं। मिली जानकारी के अनुसार आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के अधीन आने वाले एस्टेट निदेशालय ने कर्त्तव्य भवन-2 में केन्द्रीय सचिवालय पुस्तकालय के लिए सिर्फ 300 वर्ग मीटर के 2 कमरे अलॉट किए हैं, जिसे संस्कृति मंत्रालय ने यह कहते हुए रद्द कर दिया कि यह जगह ज़रूरत से बहुत कम है।
नि:संदेह मेट्रो प्रोजेक्ट और सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट विकास की ओर बढ़ते कदमों की निशानी हैं, लेकिन तुलसी सदन पुस्तकालय और केन्द्रीय सचिवालय पुस्तकालय विरासत को कायम रखने की परम्परा को ज़िंदा रखे हुए हैं। पुस्तकालय के लिए कोई वैकल्पिक निर्धारित जगह का अभी तक कोई प्रबंध नहीं हो सका। संस्कृति मंत्रालय, जिसके अधीन सरकारी पुस्तकालयों का रख-रखाव आता है, वर्षों से अलग-अलग बयान देने और उम्मीदें जगाने के बाद आखिरकार बेबस दिख रहा है। विकास और विरासत की जंग में पुस्तकें खामोश हैं और दृष्टिविगत हैं।
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