अभी भी अस्पष्ट है पंजाब की राजनीतिक स्थिति
सियासत ही क्या वो जो समझ ले हर कोई जिस को,
है इल्म-ए-छल, सियासत तो किसी ने नाम रख दिया।
वास्तव में आजकल ही नहीं, सदियों से ही छल एवं धोखा सियासत या राजनीति का हिस्सा रहे हैं। महाभारत और रामायण काल में भी राजाओं-महाराजाओं की लड़ाइयां तथा बातचीत छल एवं धोखे के सहारे चलती रही हैं। वर्तमान में भी विश्व की राजनीति में छल-बल तथा वल विशेष महत्व रखते हैं। हमारे सामने है कि विश्व के सबसे शक्तिशाली माने जाते देश अमरीका के राष्ट्रपति टम्प तो सरेआम सुबह कुछ कहते हैं, और शाम को कुछ और ही आदेश जारी तक देते हैं। यही हाल हमारे भारत देश की राजनीति का है और यही हाल पंजाब की राजनीति की भी है। ऐसा समय भी आता रहा है जब स्टेटसमैन शब्द को राजनेता का पर्यायवाची माना जाता रहा है। स्टेटसमैन की विशेषताओं में कूटनीति के साथ-साथ दूर-दर्शिता, उच्च नैतिक मूल्यों वाला तथा दलगत राजनीति से ऊपर उठा व्यक्ति ही शामिल हो सकता है। किसी सीमा तक महात्मा गांधी तथा लाल बहादुर शास्त्री ऐसे नेता थे, परन्तु अब विश्व में स्टेटसमैन के अर्थों वाला राजनेता मिलना बेहद मुश्किल प्रतीत होता है। ़खैर, मैं बात तो पंजाब की राजनीति की करना चाहता हूं। पंजाब की राजनीति इस समय पूरी तरह अस्पष्ट एवं असमंजस में पड़ी दिखाई दे रही है। इस समय यह कहना कि 2027 के विधानसभा चुनाव में अमुक पार्टी जीत सकती है, लगभग असंभव-सा ही प्रतीत हो रहा है। बेशक फिलहाल लाख मुश्किलों के बावजूद मुख्य मुकाबला आम आदमी पार्टी तथा कांग्रेस के बीच ही होता प्रतीत हो रहा है, परन्तु भाजपा को दृष्टिविगत नहीं किया जा सकता। अभी चुनाव में लगभग 5 महीने का समय शेष है और भाजपा जो साम, दाम, दंड, भेद के इस्तेमाल में सबसे माहिर और समर्थ पार्टी है, वह वास्तव में क्या करेगी, अभी किसी को नहीं पता। पहला सवाल तो यही है कि वह अकाली दल बादल से समझौता करती है या नहीं? क्या अकाली दल पुनर्सुरजीत से उसका समझौता पक्का है? परन्तु अकाली दल पुनर्सुरजीत अभी भी पार्टी के रूप में विशेष स्थापित नहीं हो सका। अकाली दल वारिस पंजाब दे की स्थिति भी अभी स्पष्ट नहीं जबकि कांग्रेस में नये अध्यक्ष परगट सिंह की नियुक्ति से फूट चाहे कम हुई है, परन्तु अभी भी खत्म नहीं हुई। इसके नेता अभी भी एक-दूसरे पर हावी होने के यत्नों में हैं, जबकि परगट सिंह के अध्यक्ष बनने से पहले ही मुख्यमंत्री बनने के दावेदारों की बड़ी संख्या में एक और की वृद्धि हो गई है। नि:संदेह ‘आप’ के नेताओं के खिलाफ सीबीआई द्वारा दर्ज मामले से एक बार तो ‘आप’ को काफी नुकसान हुआ है, परन्तु देखने वाली बात यह है कि क्या चुनावों से पहले उनको यदि इस मामले में कोई क्लीन चिट मिल गई तो यह नुकसान उनके फायदे में भी बदल सकता है। कुछ लोग यह समझते हैं कि भाजपा कांग्रेस को खत्म करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। वैसे राष्ट्रीय राजनीति में आम आदमी पार्टी ‘इंडिया’ गठबंधन से लगभग बाहर एवं अकेली पार्टी ही रह गई है। इसलिए समझा जाता है कि यदि भाजपा खुद जीतने के सामर्थ्य में नहीं आती तो उसके लिए कांग्रेस की बजाय ‘आप’ का जीतना अधिक लाभदायक होगा, परन्तु कुछ अन्य समझदार और राजनीति के जानकार यह भी समझते हैं कि भाजपा इस बार ऐसी स्थितियां बना रही है कि पंजाब में हंग असैम्बली (अर्थात किसी भी पार्टी को बहुमत न मिले) बने। इस प्रकार बाद में वह अन्य पार्टियों को तोड़ कर भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार बनाने में समर्थ हो सकती है। ़खैर, कुछ भी हो चाहे पंजाब की स्थिति अस्पष्ट है, परन्तु भाजपा केन्द्र सरकार, एजेंसियों की भूमिका, 2027 के विधानसभा चुनावों में नतीजों को बड़ी सीमा तक प्रभावित करेगी। मिज़र्ा ़गालिब के शब्दों में :
बक रहा हूं जुनं में क्या क्या कुछ,
कुछ ना समझे ़खुदा करे कोई।
समझ से बाहर की बात
कौमी इन्साफ मोर्चा के वकील जसपाल सिंह मंझपुर जो बंदी सिंहों की रिहाई तथा पैरोल आदि लेकर देने के मामलों पर काम कर रहे हैं, अपने साथी नेताओं सहित 5 अक्तूबर, 2026 को पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान को मिले। इस मुलाकात के बाद जो वीडियो उन्होंने जारी की और मुझ से निजी बातचीत में जो उन्होंने कहा, वह सचमुच मेरी समझ से बाहर है। शायद इसके अर्थ पाठक अधिक स्पष्टता से समझ सकें। एडवोकेट मंझपुर ने कहा कि जब उन्होंने मुख्यमंत्री मान से सिर्फ बंदी सिंहों की रिहाई या पैरोल देने बारे बात की, जो पंजाब की जेलों में बंद हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री से कहा कि इन बंदी सिंहों को पैरोल देना शुद्ध पंजाब सरकार तथा पंजाब के पुलिस अधिकारियों की मज़र्ी पर निर्भर है। आप इसके पूरी तरह समर्थ हो, परन्तु मंझपुर के अनुसार मुख्यमंत्री मान ने जवाब में कहा कि वह किसी भी सिख बंदी की रिहाई बारे या पैरोल बारे भारत के गृह मंत्री अमित शाह से बात करेंगे। मंझपुर का कहना है कि जब हमने कहा कि यह तो सिर्फ राजनीतिक बयानबाज़ी है, क्योंकि यदि किसी बंदी को पैरोल देने की सिफारिश कोई एसएसपी कर दे तो गृह मंत्री सहित कोई भी उसे रोक नहीं सकता। मंझपुर के अनुसार इस पर मुख्यमंत्री ने कहा कि हम पंजाब में केन्द्रीय गृह मंत्री की मज़र्ी के बिना सीवरेज का ढक्कन तक नहीं बदल सकते। यह ठीक है कि इस बात की बहुत चर्चा रही है कि मुख्यमंत्री मान तथा गृह मंत्री शाह में बहुत निकटता है, परन्तु यह बात जो एक ज़िम्मेदार वकील मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद कह रहा है, उसके अर्थ सचमुच ही मेरी समझ से बाहर हैं :
कुछ भी समझ आता नहीं कि है क्या मतलब इसका,
रौशनी में दिन की, सितारे भी नज़र आएं क्यों?
—लाल फिरोज़पुरी
राहुल तथा प्रियंका के रक्षक सांसद
हालांकि कांग्रेस के प्रमुख नेताओं राहुल गांधी तथा उनकी बहन प्रियंका गांधी के पास बड़ी सुरक्षा छतरियां हैं और बहुत बड़ी संख्या में सुरक्षा कर्मचारी उनके आसपास होते हैं, परन्तु आजकल जब राहुल गांधी तथा प्रियंका गांधी रोष प्रदर्शन कर रहे हैं तो यह बात बहुत चर्चा में है कि तीन पार्टी सांसदों जिनमें से दो पंजाब से तथा एक हरियाणा से है, सुरक्षा बलों से भी आगे होकर उनका ध्यान रख रहे हैं। इन दिनों में पंजाब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अमरिन्दर सिंह राजा वड़िंग तथा हरियाणा के दीपेन्द्र हुड्डा कांग्रेस के प्रत्येक प्रदर्शन में प्रियंका गांधी के आसपास दिखाई देते हैं, जबकि सांसद गुरजीत सिंह औजला राहुल गांधी के साथ सक्रिय दिखाई देते हैं। शायद यह भी एक कारण है कि यह चर्चा बहुत ज़ोरों पर है कि जल्दी ही राजा वड़िंग को कांग्रेस हाईकमान किसी बड़े पद से निवाज सकती है।
दिल्ली गुरुद्वारा चुनाव
हालांकि अभी दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के चुनावों की घोषणा नहीं हुई, परन्तु इसके लिए तैयारियां हो रही हैं और वोट बन रहे हैं। यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि मुख्य मुकाबला इस समय कमेटी पर काबिज़ भाजपा समर्थक कालका गुट जो वास्तव में भाजपा का मंत्री मनजिन्दर सिंह सिरसा का गुट माना जाता है और अकाली दल बादल जिसमें आजकल परमजीत सिंह सरना तथा मनजीत सिंह जी.के. के गुट भी शामिल हैं, के बीच ही होगा। चाहे पिछली बार के चुनावों में ‘आप’ समर्थक गुट भी काफी सक्रिय थे, परन्तु इस बार अभी तक उनकी कोई गतिविधि दिखाई नहीं दे रही। पूर्व जत्थेदार भाई रणजीत सिंह सक्रिय हैं, परन्तु वह किस गुट के साथ जाएंगे, अभी स्पष्ट नहीं है जबकि भाई बलदेव सिंह रागी का सद्भावना दल भी अभी इस बार दिल्ली में अधिक सक्रिय दिखाई नहीं दिया, परन्तु अकाली दल बादल तथा कालका गुट में सीधा मुकाबला होता है या फिर कोई समझौता, इसका फैसला पंजाब विधानसभा चुनावों में अकाली दल तथा भाजपा के समझौते की सम्भावनाओं पर भी निर्भर करेगा और इस बात पर भी निर्भर करेगा कि दिल्ली गुरुद्वारा चुनाव पंजाब विधानसभा से पहले होते हैं या बाद में।
इस समय दिल्ली तथा विश्व भर के सिखों के लिए सोचने की एक बात यह है कि वर्ष 2021 में जब पिछले दिल्ली गुरुद्वारा चुनाव हुए थे, उस समय दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी के कुल 3 लाख 42 हज़ार मतदाता थे, परन्तु अब इस बार अब तक काफी ज़ोर लगा कर अगस्त 2026 तक वोट एक लाख 59 हज़ार ही बने थे। इस बात की काफी चर्चा हुई है कि वोट बनाने के लिए बहुत ज़ोर भी लगा, परन्तु फिर भी 14 सितम्बर, 2026 तक कुल वोट 1 लाख 89 हज़ार ही क्यों बन सके हैं? यह पिछली बार से लगभग 45 प्रतिशत तथा डेढ़ लाख के करीब कम हैं। नि:संदेह अभी अंतिम मतदाता सूचियां प्रकाशित नहीं हुईं, परन्तु दिल्ली के 46 क्षेत्रों में इतनी बड़ी संख्या में सिख वोट का कम होना हैरानी की ही बात नहीं, चिन्ता की भी बात है कि ऐसे कौन-से हालात हैं कि इतनी बड़ी संख्या में गुरुद्वारा प्रबंध में से सिखों की दिलचस्पी कम हुई है या दिल्ली में सिखों की संख्या ही इतनी तेज़ी से कम हो रही है। यदि ऐसा है तो क्यों?
हर सोच में संगीन ़फज़ाओं का फसाना,
हर फिक्र में शामिल हुआ तहरीर का मातम।
—करामात भ़ुखारी
(संगीन ़फज़ाओं = भारी मौसम, तहरीर का मातम = लिखित का रोष)
-1044, गुरु नानक स्ट्रीट, समराला रोड, खन्ना
-मो. 92168-60000



