अभी भी अस्पष्ट है पंजाब की राजनीतिक स्थिति
पंजाब करां की स़िफत तेरी,
शानां दे सब सामान तेरे।
जल-पौण तेरा, हरिऔल तेरी,
दरिया परवत मैदान तेरे।
शिमला डल्हौजी मरी तेरे,
कश्मीर तेरा गुलमर्ग तेरा,
दिल्ली तेरी लाहौर तेरा,
अमृतसर सोहे स्वर्ग तेरा।
प्रसिद्ध पंजाबी कवि धनी राम चात्रिक की 1932 में छपी किताब ‘चंदनवाड़ी’ की यह कविता नई पीढ़ी के नौजवान पंजाबियों ने शायद ही पढ़ी हो, पर हमारी आयु के लगभग हर व्यक्ति ने यह पढ़ी होगी। जिस पंजाब की बात चात्रिक जी ने की, वह पंजाब फिर दोबारा कभी बन सकेगा, आज तो इस का सपना लेना भी मुश्किल लगता है। गौरतलब है कि 1858 में दिल्ली को पंजाब का हिस्सा बना दिया गया था क्योंकि जिन इलाकों की बात और जिस शान की बात चात्रिक जी ने की है, वह तो समय के दौर और राजनीति की भेंट चढ़ गई। जिन इलाकों का उन्होंने ज़िक्र किया है, उन में से अकेला अमृतसर ही अब पंजाब के पास बचा है। पंजाब के शरीर पर कितने घाव हुए, इसके कितने टुकड़े हुए, उनका अहसास तो कविता के उपरोक्त दो बंदों से ही हो जाता है। खैर, पुराने ज़ख्मों को कुरेदना दर्द की इंतिहा को सहने जैसे लगता है परन्तु आज का पंजाब उस समय के 3 लाख 57 हज़ार वर्ग किलोमीटर में फैले पंजाब का सिर्फ 7वां हिस्सा अभिप्राय यह कि लगभग 50,000 वर्ग किलोमीटर ही बचा है। इसकी हालत देखकर सिर्फ खेद ही प्रकट किया जा सकता है। ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि कोई ऐसा सामूहिक नेतृत्व या कोई चमत्कार पंजाब को जल्द मिल सकेगा, जो पंजाब की 1932 वाली शान न सही, फिर 1966 से 1978 तक वाली शान ही दोबारा बहाल कर सके।
इस समय पंजाब की राजनीतिक हालत तो बुरी तरह असमंजस वाली बनी हुई है। पंजाब के सिर पर कज़र् की प्रतिदिन भारी होती गठरी, नशा, माफिया और पुलिस राज तो जैसे प्रतिदिन की ज़िंदगी का हिस्सा ही बन गये हैं। हर पार्टी पंजाबियों को मुफ्त की सुविधाएं देकर या देने का लालच देकर चुनाव जीतने के काम में लगी हुई है। पंजाब के वास्तविक मामलों और उसके स्वाभिमान की किसी को कोई चिन्ता नहीं है।
खैर, बात तो पंजाब की राजनीति के असमंजस की ही करनी थी। पंजाब की राजनीति विधानसभा चुनाव सिर पर होने के बावजूद पूरी तरह अस्पष्ट स्थिति में है। कुछ माह पहले तक लगता था कि कांग्रेस इस बार पंजाब में स्पष्ट रूप में विजेता हो सकती है, परन्तु उसके नेताओं की आपसी फूट ने कांग्रेस का जितना नुकसान किया है, उसकी शायद पंजाब के कांग्रेस नेताओं के साथ-साथ हाईकमान को भी समझ नहीं आ रही। एक समय अकाली दल (बादल) का उत्थान भी धीरे-धीरे दोबारा शुरू होते प्रति हुआ था परन्तु अब फिर वह एक जड़ता वाली स्थिति में आ गया प्रतीत होता है एक बार ऐसा वृत्तांत भी बना था कि अकाली दल (पुनर सुरजीत) कामयाब हो सकता है परन्तु उनकी आपसी खींचतान और सुस्ती ने उसकी स्थिति भी खराब कर दी है। भाजपा या तो अभी तक फैसला ही नहीं सकी कि उसने पंजाब में क्या करना है या फिर यह उसकी रणनीति का हिस्सा ही है कि असमंजस कायम रखा जाए। क्योंकि केन्द्र में सत्ता में होने के बावजूद वह केन्द्र से संबंधित पंजाब की और सिखों की मांगें मानने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही, बल्कि उलटा कभी-कभी पंजाब को कोई नया झटका ज़रूर दे देती है। अब फिर शुरू हो रहा किसान आंदोलन और विद्यार्थी आंदोलन भी भाजपा के लिए नुकसानदेह ही साबित होंगे। पंजाब में सत्तारूढ़ ‘आप’ सरकार मुफ्त बिजली, 1000-1500 रुपये माह महिलाओं को देने की योजना के कारण और विपक्षी पार्टियों की असमंजस वाली स्थिति के कारण मास्टर स्ट्रोक मारने की कोशिश में है। परन्तु जिस तरह पुलिस राज और डर का माहौल इस सरकार ने बनाया है और जिस तरह पंजाब के ज्यादातर कर्मचारियों में सरकार के प्रति गुस्सा है, उसको देखते हुए उनकी भी पक्की जीत की गारंटी नहीं दी जा सकती। रही बात अकाली दल वारिस पंजाब दे की तो इसमें कोई शक नहीं कि यह दल उभार में है, परन्तु अभी वह पूरे पंजाब में नहीं बल्कि कुछ खास-खास हिस्सों में ही उभार में नज़र आ रहा है। बेशक यह हो सकता है 2022 की तरह 2027 के अंतिम माह में किसी भी पार्टी या ग्रुप की ओर पंजाब के लोगों का कोई स्वत: झुकाव हो जाए। परन्तु हाल की घड़ी तो 2027 के परिणामों के बारे में स्थिति पूरी तरह से अस्पष्ट ही नज़र आ रही है। हाल की घड़ी कोई भी भविष्यवाणी करना संभव नहीं लगता। यह हालत तो मुनीर नियाज़ी के इस शेयर जैसी ही है:-
मैं उसकी आंखों में देखता रहता हूं,
मगर मेरी समझ में कुछ नहीं आता।
नीट आंदोलन के खिलाफ एन.एस.ए. का प्रयोग
नीट पेपर लीक के बाद केन्द्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग का आंदोलन दिन प्रतिदिन तेज़ होता जा रहा है। चाहे इस मामले में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस आमने-सामने आ गए हैं और एक-दूसरे को भाजपा की बी टीम बता रहे हैं। परन्तु फिर भी यह प्रभाव ज़रूर है कि केन्द्र सरकार इस आंदोलन से कुछ कुछ डरी हुई है कि कहीं यह आंदोलन नज़दीकी देशों में हुए जेन-ज़ी आंदोनल जैसा रूप न धारण कर ले। यही कारण माना जाता है कि दिल्ली पुलिस के प्रमुख को 19 जुलाई से 18 अक्तूबर तक तीन माह के लिए एन.एस.ए. जैसे कानून के उपयोग के लिए अधिकार दे दिए गये हैं। इसके अन्तर्गत किसी को भी, बिना उस पर आरोप लगाए 12 दिनों से लेकर 12 माह तक हिरासत में रखा जा सकता है। याद रहे, यही एन.एस.ए. भाई अमृतपाल सिंह पर भी लगाया गया था। हम समझते हैं कि केन्द्र सरकार को जन-आधारित विरोध के खिलाफ ऐसा अंतिम कदम नहीं उठाना चाहिए, क्योंकि लोकराज में विरोध करने की इजाज़त देने के साथ-साथ विरोध को सुनने और समझने की भी ज़रूरत होती है। परन्तु एन.एस.ए. जैसे कानून तो लोकराज के दमन और जब्र के ही निशान हैं। कोई भी होशमंद व्यक्ति इसकी हिमायत नहीं कर सकता। याद रखो किसी भी जब्र की इंतिहा लोगों के सहर के खत्म होने तक ही होती है:
तुम भी करोगे जब्र शब-ओ-रोज़ इस कदर,
हम भी करेंगे सबर मगर इ़िख्तयार तक।
(मेला राम व़फा)
(शब-ओ-रोज़=दिन-रात, इ़िख्तयार=वश, हक)
पंजाब कांग्रेस में टूट-फूट का खतरा बढ़ा
हालांकि देशभर के मीडिया में कल पंजाब कांग्रेस हाईकमान के साथ हुई बैठक के बाद यह प्रचार किया जा रहा है कि कांग्रेस में अब सब कुछ अच्छा हो गया है परन्तु जिस तरह की ‘सरगोशियां’ हमें सुनाई दे रही हैं, उनके अनुसार यह तूफान के पहले की ़खामोशी ही है क्योंकि बताई जाती बैठक के बाद कुछ और बैठकों की भी चर्चा है, जिनमें कुछ प्रमुख नेताओं ने शामिल होना स्वीकार नहीं किया। हमारी जानकारी के अनुसार चाहे निचले स्तर पर पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के पक्ष में आवाज़ उठ रही है परन्तु कांग्रेस हाईकमान चन्नी पर पूरा विश्वास करने के लिए तैयार नहीं लगता। इसके कारणों में दी जा रही सच्ची झूठी दलीलों में से पहली दलील यह है कि जब चन्नी को पिछली बार मुख्यमंत्री बनाया गया था तो उस समय वह हाईकमान के साथ किए वायदे पूरे नहीं कर सके थे। दूसरा ़खदशा यह जताया जा रहा है कि चन्नी किसी समय भी ई.डी. या केन्द्रीय एजेंसियों के दबाव में आ सकते हैं जबकि दूसरी तरफ राजा वडिं़ग के विरोधी भी उन पर पंजाब सरकार के साथ कम्प्रोमाइज़्ड (समझौता कर चुके) होने के आरोप लगा रहे हैं। हमारी जानकारी के अनुसार यदि कांग्रेस सचमुच एक होकर चुनाव लड़ती है तो वह मुख्य मुकाबले में हो सकती है परन्तु अंदरूनी फूट के कारण उसकी हालत बहुत खराब है। यदि अगले कुछ सप्ताह में ही कांग्रेस हाईकमान कोई सख्त किन्तु सर्व-स्वीकार्य फैसला न कर सकी को पंजाब कांग्रेस के कई नेता अन्य पार्टियों में जाने को प्रथमिकता दे सकते हैं जिनमें से माझा के कुछ नेता अकाली दल वारिस पंजाब दे की ओर, लुधियाना, फाज़िल्का और गुरदासपुर के कुछ नेता भाजपा में और दोआबा के कुछ नेताओं के ‘आप’ में जाने की चर्चा है।
़खामोशी तूफान से पहले की तारी है,
टुकड़े टुकड़े हो न जाए तेरी बस्ती सोच।
(लाल फिरोज़पुरी)
1044, गुरु नानक स्ट्रीट, समराला रोड़ खन्ना।
-मो. 92168-60000



