ऊर्जा के क्षेत्र में नए बदलाव
चल रहे अमरीका-ईरान युद्ध के भयावह परिणाम सभी के सामने हैं। बड़ी चिन्ताजनक बात यह है कि इस युद्ध के और लम्बे होने जाने से विश्व भर पर इसके पड़ने वाले प्रभावों से इंकार नहीं किया जा सकता। भारत के लिए भी यह इसलिए बड़ी चिंता का कारण बना हुआ है, क्योंकि देश में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का यहां ज्यादातर आयात बाहर से ही होता है। इसमें ईरान और खाड़ी देशों का बड़ा योगदान है। सऊदी अरब भारत का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का सप्लायर है, जो स्वयं भी अन्य खाड़ी देशों से इस मामले पर बड़ी मुश्किल में फंस चुका है। ईरान ने पहले ही होर्मुज़ जलडमरू मार्ग पर कब्ज़ा किया हुआ है, जिस रास्ते से भारत को बड़ी मात्रा में तेल भेजा जाता है। अमरीका इस समुद्री मार्ग को प्रत्येक स्थिति में खुलवाने के लिए यत्नशील है, परन्तु अब तक ईरान के हठ के आगे वह बेबस हुआ दिखाई देता है। दोनों में युद्ध जारी रहने का यह एक बड़ा कारण है, जिसे लेकर अमरीका ने अब ईरान पर लगातार बमबारी करना शुरू कर दिया है।
पश्चिम एशिया के इस तनाव में अब लाल सागर के साथ जुड़े बाब-अल-मंदेब समुद्री मार्ग के भी बंद होने की चिंता पैदा हो गई है। ईरान के यमन के हूती विद्रोहियों के साथ लम्बे समय से संबंध रहे हैं। वह इज़रायल के साथ युद्ध में हमेशा ईरान को समर्थन देते हैं, यदि हूती विद्रोही लाल सागर के इस मार्ग पर भी गड़बड़ करने लगते हैं तो कच्चे तेल की सप्लाई पर और भी बुरा प्रभाव पड़ सकता है। होर्मुज़ मार्ग बंद होने के कारण सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों ने तेल के निर्यात के लिए लाल सागर का यह मार्ग चुन लिया था। यदि यहां भी गड़बड़ होती है तो भारत की मुश्किलों में और भी वृद्धि हो जाएगी। भारत ने पहले ही इस संकट को कम करने के लिए रूस, वेनेजुएला, ब्राज़ील और अमरीका से तेल का आयात शुरू किया हुआ है। रूस से प्रतिदिन 25 लाख बैरल से अधिक तेल यहां पहुंच रहा है। अरबों का यह आयात अंतर्राष्ट्रीय मंडी से जुड़ा हुआ है। यदि वहां तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो इसका सीधा प्रभाव भारत पर पड़ता है। ऊर्जा की इस पूर्ति के लिए भारत ने लगातार ऐसे यत्न शुरू किए हैं कि वह इसका विकल्प ढूंढ सके।
अब तक इन यत्नों में ज्यादातर सफलता भी प्राप्त की जा चुकी है। विशेष रूप से इलैक्ट्रानिक स्कूटर, कारें, बसें और ट्रक बड़ी मात्रा में देश में ही तैयार किए जाने को प्राथमिकता दी जा रही है। इसके साथ ही एथेनॉल को भी पेट्रोल में मिला कर वाहनों में उपयोग किया जाने लगा है। हाइड्रोजन से रेलगाड़ियां चलाने की पहले भी की गई है। प्रधानमंत्री ने विगत दिवस हरियाणा में एक हाइड्रोजन से चलने वाली रेलगाड़ी को भी हरी झंडी दी है। इसके साथ ही एथेनॉल का भी इस्तेमाल अधिक करने को प्राथमिकता दी जा रही है। एथेनॉल के वाहनों में इस्तेमाल से इस क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव आ सकता है। इसके इस्तेमाल से प्रदूषण के कम होने और किसानों की आय बढ़ने की और भी संभावनाएं बन गई हैं। एथेनॉल एक ऐसा तेल है जो मुख्य रूप से गन्ने के रस, मक्की और सीरे से तैयार होता है। भारत में एक अनुमान के अनुसार इस समय लगभग 30 करोड़ दोपहिया वाहन हैं और लगभग 8 करोड़ कारें हैं। पेट्रोल के साथ 20 प्रतिशत तक एथेनॉल का इस्तेमाल एक बड़ी राहत बन गया है। इस संबंधी समय-समय पर कई संदेह भी प्रकट किए जाते रहे हैं परन्तु यह बात सुनिश्चित रूप से जांच की गई है कि इससे वाहन के इंजन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसे उपयोग में लाने से पहले दशकों तक इस संबंध में अनुसंधान किया जाता रहा है।
ब्राज़ील जैसे देश में 1970 से ही वाहनों के लिए 100 प्रतिशत एथेनॉल का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह इस्तेमाल टोयोटा, होंडा, सुज़ुकी आदि बेहतरीन गाड़ियों में भी होता है। भारत में वर्ष 2004 से इसका इस्तेमाल किया जा रहा है और पूरे वैज्ञानिक तुजुर्बों से अब इसे 20 प्रतिशत तक बढ़ाया गया है। इस संबंध में पैट्रोलियम और प्राकृतिक गैस संबंधी राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने सोमवार को राज्यसभा में यह बताया था कि भविष्य में वाहनों में एथेनॉल की मात्रा में कोई भी वृद्धि वैज्ञानिक अध्ययनों और उद्योगों के साथ विचार-विमर्श के बाद ही की जाएगी। इसलिए ऑटोमोबाइल निर्माताओं, तेल कम्पनियों और अनुसंधान संस्थाओं को भी विस्तारपूर्वक विचार-विमर्श में शामिल किया जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि भारत ने पिछले 5 वर्ष में वाहनों में पेट्रोल के साथ मिला कर 20 प्रतिशत तक एथेनॉल के इस्तेमाल का लक्ष्य प्राप्त कर लिया है। इस योजना के तहत दशकों से भी अधिक चरणों में इसे लागू किया गया है। औसतन एथेनॉल मिश्रण 2013-14 में लगभग 1.53 प्रतिशत से बढ़ा कर अब 20 प्रतिशत तक हो गया है। इस क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिकों ने भी लगातार यह स्पष्ट किया है कि इससे वाहनों के इंजन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसके इस्तेमाल संबंधी उठाई गई सभी आशंकाओं को निर्मूल बताया गया है। इसके लिए और भी अधिक से अधिक यत्न किये जाने ज़रूरी हैं।
यदि देश में ऐसे जैविक उत्पादन को बढ़ाया जाता है तो इससे आर्थिकता पर बोझ कम करने में सहायता मिल सकती है, जिन विकसित देशों में भी ऐसे तुजुर्बे हुए हैं, उन्हें ऊर्जा के क्षेत्र में इससे बड़ी राहत मिली है। भारत को भी आत्म-निर्भरता के लिए लगातार इन क्षेत्रों में बड़ी उपलब्धियों के लिए कदम बढ़ाने पड़ेंगे।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

