पुलिस सुधार के केन्द्र में क्यों ज़रूरी है भलाई ?
कुछ पल चुपचाप विकल्प मुहैया करते हैं कि कोई व्यक्ति एक संस्था को कैसे देखता है। कुछ महीने पहले मैंने अपनी बेटी की शादी के लिए एक बैंक्यूइट हाल बुक करने संबंधी पूछताछ की तो सिर्फ जगह (वैन्यू) के लिए 20 लाख रुपए मांगे गए। मैंने तुरंत सोचा कि यदि एक पुलिस डायरैक्टर जनरल (डी.जी.पी.) इतना खर्च करने से झिझकता है तो एक कांस्टेबल या ए.एस.आई. को कितना दबाव सहन करना पड़ता होगा, जब वह अपनी बेटी की शादी के लिए बचत करने के लिए संघर्ष करता हो। उस पल यह मामला प्रशासनिक न रह कर निजी बन गया कि प्रत्येक वर्दी में एक परिवार खड़ा है जो अदृश्य बोझ को उठाता है। उस पल ने प्रेरित करते हुए हरियाणा पुलिस की ‘शगुन योजना’ को जन्म दिया, जो विश्वास दिलाती है कि ज़िन्दगी के सबसे अहम पलों के अवसर पर यह संस्था उनके साथ खड़ी होगी।
मकसद वाली योजना : हरियाणा के डी.जी.पी. के तहत अपने पहले दिन मैंने इस योजना की घोषणा की कि एक अप्रैल, 2026 से सबसे निचले पद से लेकर सबसे उच्च अधिकारी तक प्रत्येक पुलिस कर्मचारी को अपनी बेटी की शादी के लिए पुलिस भलाई फंड से 2.5 लाख रुपये मिलेंगे। सभी पुलिस कर्मचारी इच्छानुसार इस फंड में योगदान डालते हैं, जो हरियाणा पुलिस परिवार की एकता को दर्शाता है। पुलिस कर्मचारी बड़ी मेहनत के उपरांत अच्छा वेतन पाते हैं, परन्तु यह वेतन अक्सर शादी के खर्च के लिए काफी न होने के कारण वे कज़र् लेते हैं या सम्पत्ति बेचते हैं। हरियाणा पुलिस ने शगुन योजना की वचनबद्धता को आगे ले जाते हुए प्रदेश भर की पुलिस लाइनों के अंदर कम्यूनिटी हाल को बैंक्यूइट हाल में बदल दिया है, यह स्थान शादी व अन्य सामाजिक समारोहों के लिए पुलिस परिवारों के लिए नाममात्र कीमत पर उपलब्ध है। नि:संदेह यह सामाजिक ज़मीर वाली भलाई है।
देखभाल का व्यापक ढांचा : शगुन योजना सिर्फ एक भलाई पहलकदमी नहीं है, अपितु ‘हमारी फोर्स, हमारा परिवार’ के एक व्यापक फलसफे और विश्वास पर केन्द्रित है। यदि समाज अपने पुलिस कर्मचारियों से बचाव की पहली पंक्ति में खड़े होने की उम्मीद रखता है, तो संस्था को ज़रूरत, ख्वाहिश और नुकसान के पलों में उनके साथ खड़े होना चाहिए। हम कई ढंग-तरीकों से भलाई करते हैं, 2002 से अब तक 19,000 से अधिक कर्मचारियों की नियमित स्वास्थ्य जांच हुई है। मानसिक स्वास्थ्य सहायता, कौंसलिंग, नशा-मुक्ति, योगा, फिटनैस और स्वास्थ्य कार्यक्रम पुलिसिंग की मानसिक और शारीरिक ज़रूरतों से निपटने में सहायता करते हैं। हम सेवा के दौरान मरने वाले कर्मचारियों के परिवारों को 1.5 करोड़ रुपये तक का बीमा देते हैं; जिसके लिए एच.डी.एफ.सी. बैंक द्वारा पहले ही 188 करोड़ रुपये से अधिक की अदायगी की जा चुकी है। हमारी भलाई कार्यों में हमदर्दी आधारित नौकरियां, एक्स ग्रेशिया, शहीदी लाभ और मृत्यु उपरांत राहत-राशि भी शामिल है।
शिक्षा भलाई भी अहम स्तम्भ बन कर उभरी है। हरियाणा पुलिस के 22 डी.ए.वी. पुलिस-पब्लिक स्कूलों में पुलिस कर्मचारियों के 23,000 से अधिक बच्चे पढ़ते हैं, जिन्हें फीस की छूट, प्रतिभा विकास पहलकदमी और करियर मार्ग-दर्शन कार्यक्रमों का सहारा मिलता है। होस्टल सहायता योजना के तहत पुलिस कर्मचारियों को 50,000 रुपये तक की वित्तीय सहायता दी जाती है, जिनके बच्चे घरों से दूर उच्च शिक्षा हासिल करते हैं। हमने सप्ताह में आराम के दिन, बाल-देखभाल छूटी, शिकायत प्रणालियां, पदोन्नति और दम्पतियों को इकट्ठे या महिलाओं को उनके घरेलू ज़िलों के नज़दीक तैनात करने का यत्न किया है। हरियाणा पुलिस भलाई के लिए ग्रांट देने वाला देश का एकमात्र प्रदेश है। मुख्यमंत्री की ओर से इस हेतु मौजूदा वर्ष के लिए 16 करोड़ रुपये की ग्रांट की घोषणा की गई है।
पुलिस सुधार में गुम पहलू
पुलिस सुधार के तहत बातचीत के नए कानून, जवाबदेही, टैक्नोलॉजी, फोरैंसिक और तेज़ जांच कार्रवाइयों पर केन्द्रित होती है। ये सब ज़रूरी हैं, परन्तु हम अक्सर पुलिस कर्मचारियों की भलाई और स्वास्थ्य जैसे अहम क्षेत्रों को दृष्टिविगत कर देते हैं। पुलिस फोर्स की प्रभावशीलता सिर्फ इसकी प्रणालियों पर निर्भर नहीं करती, पुलिस कर्मचारियों का मनोबल, प्रतिष्ठता और भलाई भी ज़रूरी हैं, जो उन्हें बेहतर कारगुज़ारी के लिए प्रेरित करते हैं। इंटरनैशनल एसोसिएशन ऑफ चीफ्स ऑफ पुलिस ने नोटिस लिया है कि अधिकारियों की शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और वित्तीय भलाई प्रत्यक्ष रूप से पेशेवर व्यवहार, संस्थागत ईमानदारी और जनतंत्र के विश्वास को प्रभावित करती हैं। इसी तरह भारत के पुलिस अनुसंधान और विकास ब्यूरो के अध्ययनों ने कर्मचारियों में असन्तोष को जनता-पुलिस संबंधों को प्रभावित करने वाले अहम कार्य के रूप में उजागर किया है।
सीधी बात यह है कि वित्तीय चिन्ताओं, पारिवारिक चिंता या तनाव के बोझ में दबे पुलिस अधिकारियों व कर्मचारियों से पूरी एकाग्रता से और संतुलित काम करने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। घर से काम के स्थान तक लाई गई चिंता जवाबदेही को प्रभावित करती है तथा तनाव एवं निराशा मनोबल को गिराते हैं। विश्व भर में पुलिस, अर्द्ध-सैनिक और सैन्य बलों का तजुर्बा एक प्रत्यक्ष सच्चाई को दर्शाता है : कर्मचारियों की भलाई फोर्स की प्रभावशीलता से अलग नहीं की जा सकती है। कोई भी कर्मचारी स्वयं को पूरी तरह फज़र् के प्रति तभी समर्पित कर सकता है, जब उसे विश्वास हो कि उनकी संस्था उसकी और उनके परिवारों की देखभाल और भलाई की चिंता करती है और उनके साथ खड़ी है।
-पुलिस डायरैक्टर जनरल, हरियाणा
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